हिन्दी पट्टी का भेड़िया-धसान

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पटना। सबसे पहले तो शायद “भेड़िया-धसान” शब्द ही बताना होगा। क्या होता है कि एक स्थान से दूसरे स्थान की ओर जाते भेड़िये हमेशा एक ही कतार में चलते हैं। कतार कायम रहेगी, झुण्ड का सबसे आगे चल रहा भेड़िया जिधर से गया है, उससे कोई जरा भी दाएँ-बाएँ नहीं खिसकेगा। आगे वाले ने जरा भी गलत मार्ग चुन लिया, किसी गड्ढे-टीले से गुजरा, कहीं छलाँग लगानी पड़ी तो पीछे वाले बिलकुल भी बुद्धि नहीं लगायेंगे। अवरोध के किनारे से कतरा कर नहीं निकलेंगे, वही मुश्किल रास्ता अपनाएंगे। मोटे, सपाट शब्दों में कहें तो किसी ने कह दिया कि कौवा कान लेकर उड़ गया तो पहले अपना कान टटोलने के बदले, सभी को कौवे के पीछे दौड़ पड़ना है। हाल में ऐसा होते देखना है तो भोपाल के एक तथाकथित साहित्योत्सव में किसी सत्र के नाम पर उठे बवाल में देख लीजिये।

बात एक लेख से शुरू हुई थी जिसमें असल में प्रश्न बाबर को महिमामंडित किये जाने पर कम था और सत्रों के नाम में जबरन उर्दू-फारसी शब्द क्यों घुसाए जा रहे हैं, इसपर था। पता नहीं कैसे उससे बाबर को महिमामंडित किये जाने की बात उठी। चलिए उठ भी गयी थी तो कोई बात नहीं, एक बार जिस लेखक का सत्र था, उसकी पुस्तक देख लेते। इसका उचित तरीका ये होता है कि किसी अकादमिक व्यक्ति को वह पुस्तक पढ़ा दी जाए और उससे पूछ लें कि समझा दो इसमें लिखा क्या है? अब इसपर कुछ लोग कहेंगे कि हमें क्या शब्दों के अर्थ समझ नहीं आते? तो भाई ऐसा है कि अकादमिक जगत में “आलोचना” का अर्थ कुछ और होता है, आम बोलचाल की भाषा जैसा “निन्दात्मक” अर्थ नही होता। पुस्तकों की आलोचना होती है, उसमें सिर्फ किताब की खराबी बताते हैं क्या? अदालती-अकादमिक भाषा समझ नहीं आती इसलिए वकील रखते हैं।

जो सत्र का नाम था, उसमें “क्वेस्ट” लिखा देखकर हिन्दी बोलने-पढ़ने वाला कोई आम आदमी उसका अर्थ “क्वेश्चन” जैसा लगाने लगे, केवल खोज या अन्वेषण समझ बैठे ऐसा हो सकता है। अकादमिक जगत वाला तुरंत बता देगा ये लैटिन से पुराने फ्रेंच में आया शब्द है। ये तो जरूर है कि “क्वेश्चन” उसी मूल से बनता है जिससे “क्वेस्ट” बना है लेकिन “क्वेस्ट” कोई “भारत एक खोज” जैसा “खोज” बिलकुल नहीं होता। ये शुरू में तो न्यायिक जाँच जैसे अर्थ में प्रयुक्त होता था लेकिन अंग्रेजी में आते-आते इस शब्द का अर्थ किसी कीमती वस्तु की ऐसी जोखिम भरी तलाश हो गया था जिसके लिए योद्धा (नाईट) निकलते थे। रास्ते में आने वाली विघ्न-बाधाओं को मिटाते हुए कीमती चीज (जैसे होली ग्रेल) लेकर लौटने की मंशा स्पष्ट होती है “क्वेस्ट” में।

अगर अंग्रेजी में अकादमिक स्तर पर लिखी गयी कोई पुस्तक होगी और उसमें बाबर को लुटेरे की तरह, सोने की चिड़िया (यानि भारत) की रक्षा करने वालों को निपटाकर सोने की चिड़िया लूटने आया बताने की मंशा होगी तो बाबर के भारत आने को सभ्य अकादमिक भाषा में “क्वेस्ट” ही लिखेंगे। शब्दों के उल्टे या बिलकुल असंगत अर्थ कर डालना कोई नयी बात भी नहीं है। समय-समय पर आत्मा को “सोल”, धर्म को “रिलिजन”, या ईमानदारी-शहीद जैसे शब्दों के प्रचलित अर्थ तक पर बहसें होती रही हैं। जिस लेख के आधार पर बहसें शुरू हुई उसमें भी आदिशंकराचार्य पर कहीं आयोजित किसी सत्र का नाम “दास्तान” रखने पर बात होती दिखेगी। बात सही भी है, आदिशंकराचार्य की कथा होगी, दास्तान क्यों होगी? पति के साथ पत्नी होती है, बेगम नहीं होती।

ये सीधी सी बात है कि कंप्यूटर इंजिनियर से किसान के हल के सात पुर्जों के नाम पूछ लिए जाएँ तो उसे नहीं पता होगा, ऐसे ही किसान को कंप्यूटर के कल-पुर्जों से कोई लेना-देना नहीं, तो वो उनके काम या नाम नहीं जानेगा। हर व्यक्ति हर विषय का विशेषज्ञ नहीं होता। आभास मलदहियार की पुस्तक का प्रयोग अकादमिक जगत में बाबर के महिमामंडन की धज्जियाँ उड़ा देने के लिए हो सकता है। एक आयातित विचारधारा के गढ़े कथानक में बाबर को महान धर्मनिरपेक्ष घोषित करने के लिए तथाकथित बुद्धिजीवी “भोपाल वसीयतनामा” का नाम उछालते हुए कभी भी दिख जायेंगे। ये “भोपाल वसीयतनामा” फर्जी है, इसे सिद्ध करने में किसी भी अकादमिक या सार्वजनिक मंच पर आभास की पुस्तक या उसके भाषण का प्रयोग हो सकता है।

ये कोई भी लिखने-पढ़ने में रूचि रखने वाला बता सकता है कि सन्दर्भ (पुस्तकों के अंत में पाया जाने वाला रिफरेन्स) कैसी पुस्तकों का दिया जाता है। बाबर के हमले के कारण चंदेरी की स्त्रियों को जौहर करना पड़ा था। इसका सन्दर्भ किस पुस्तक से देंगे? आयातित विचारधारा वाले तो जौहर-साका की बात करने से रहे! चंदेरी के जौहर पर आभास की पुस्तक तो है, दूसरी राष्ट्रवादी पुस्तकें ढूंढना लगभग असंभव है। ध्यान दीजिये शब्दों पर तो दिख जायेगा, पुस्तकें लिखा, उपन्यास नही लिखा है। आश्चर्यजनक है कि मध्यप्रदेश साहित्य अकादमी भी लेखक या सत्र के बारे में चुप रही। क्या उनके पास चार ऐसे लोग भी नही जो उन्हें पुस्तक पढ़कर बता देते कि इसमें क्या लिखा है, या विवाद उठा है तो इसके बारे में क्या बताना है? ऐसे लोगों को साहित्य अकादमी के पद-प्रतिष्ठा की मलाई की कटोरी वापस रख देनी चाहिए।

हिन्दी पट्टी के “गैरों पे करम, अपनों पे सितम…” की परिपाटी कोई नयी भी नहीं है। हाल में दूसरे पक्ष के एक लेखक के पक्ष में हुआ-हुआ करते लोग दिखे थे। काफी पहले एक लेखक-पत्रकार महोदय की अयोध्या (राम जन्मभूमि आन्दोलन) पर लिखी पुस्तक का विमोचन तो संघ प्रमुख और अमित शाह से करवा दिया था। पिछले उत्तर प्रदेश चुनावों के बाद तथाकथित लेखक-पत्रकार का क्या हुआ ये बताने की आवश्यकता नहीं। स्वबोध और शत्रुबोध दोनों से हीन लोग समाज को जैसी दिशा देंगे, उसके बारे में तो सोचने से ही डर लगता है। हिन्दी में कथेतर साहित्य की कमी, शोध करके लिखने वालों का न होना, काफी हद तक शोधपरक लेखकों को खदेड़े जाने के कारण है। हमारे पास जब पाठकों के “ये पुस्तक हिन्दी में आती है क्या?” वाले प्रश्न का उत्तर नहीं होता, तो उसके पीछे बड़ा कारण “अपनों पे सितम…” ही है!

बार-बार अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी मारने के बाद भी हिन्दी पट्टी अकादमिक लेखन और आम जनता के लिए लेखन में अंतर समझे, शोध को आम जन की भाषा में उनतक पहुँचाने जैसे प्रयास करेगी, इसकी उम्मीद हमें तो नगण्य लगती है। हाँ, शायद नए लोगों के हिंदी लेखन में आने के बाद एक-आध दशक में स्थितियाँ बदलें, तबतक तो प्रतीक्षा ही करनी होगी।

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आनंद कुमार

आनंद कुमार

विपणन और मीडिया में स्नातकोत्तर आनंद, पेशेवर तौर पर डेटा के एल्गोरिदम से खेलते हैं, लेकिन उनका मन संस्कृत की ऋचाओं में रमता है। शास्त्री और आचार्य होने के बावजूद वे स्वयं को संस्कृत का एक जिज्ञासु छात्र ही मानते हैं। डेटा एनालिटिक्स और सामाजिक शोध के पेशेवर अनुभवों को वे अपनी यात्राओं के दर्शन के साथ पिरोते हैं। वे पर्यटन नहीं, यात्रा करते हैं और इसी 'यायावरी' को अपनी लेखनी का आधार बनाते हैं। संयुक्त परिवार के संस्कारों के साथ वे वर्तमान में पटना में रहते हैं।

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