हिन्दू राष्ट्र पर श्री गोलवलकर गुरू जी के विचार

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प्रो. रामेश्वर मिश्र पंकज
दिल्ली : राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के द्वितीय सरसंघचालक परम पूजनीय माधवराव सदाशिवराव गोलवलकर गुरू जी के हिन्दू राष्ट्र से संबंधित विचार उनके भाषणों में स्पष्ट है, जो ‘‘विचार नवनीत’’ नामक संकलन में दिये गये है। ‘‘विचार नवनीत’’ के अध्याय-9 एवं 10 में इस विषय पर अधिक स्पष्टता से प्रकाश डाला गया है। उनका कहना है कि ‘‘अनादिकाल से एक महान एवं सुसंस्कृत समाज यहां भारत भूमि की संतति के रूप में निवास कर रहा है। उसे ही हिन्दू कहते है। कुछ लोग हिन्दू के स्थान पर आर्य अथवा भारतीय नाम का सुझाव देते है। निस्सन्देह ‘‘आर्य’’ एक स्वाभिमान पूर्ण प्राचीन नाम है। परन्तु इसका प्रयोग विगत एक हजार वर्षों में अधिक प्रचलन में नहीं रहा। 19वीं शताब्दी में अंग्रेजों तथा अन्य यूरोपीय द्वारा ऐतिहासिक शोध की झूठी आड में आर्य द्रविड के नस्लवादी विभाजन खड़े कर दिये गये। अतः अब इन दिनों ‘‘आर्य’’ नाम का प्रयोग उद्देश्य की सिद्धि में बाधक होगा। क्योंकि हमें हिमालय से कन्याकुमारी तक फैले हुए सम्पूर्ण समाज का साक्षात् करना है। ‘‘भारतीय’’ भी प्राचीन नाम है। वेदों और पुराणों में ‘‘भारत’’ नाम का प्रयोग हुआ है। यहां के निवासियों को पुराणों में ‘‘भारती’’ कहा गया है। किन्तु आज इस नाम को लेकर समस्या यह आ गई है कि भारत के मुसलमान, ईसाई, पारसी आदि सभी भारतीय शब्द से ही संबोधित होते है। अतः यह शब्द वर्तमान में हिन्दुओं के लिए अपर्याप्त है। वर्तमान में हम प्राचीन काल से चले आ रहे भारत भूमि की संततियों के समाज को हिन्दू कहे, तो ही स्पष्टता होगी। पृथ्वीराज चौहान के दिनों से इस नाम का प्रयोग प्रचुरता से मिलता है। यद्यपि वृहस्पति आगम में तो बहुत पहले कहा गया है :-
हिमालयं समारभ्य यावदिन्दु सरोवरम्।
तं देव निर्मितं देश हिदुस्थानं प्रचक्ष्यते।।
गुरू गोविन्द सिंह, स्वामी विद्यारण्य और छत्रपति शिवाजी महाराज आदि महान पराक्रमी महापुरूषों का लक्ष्य ‘हिन्दू स्वराज’ की स्थापना करना ही था। हमारे वेदों का एक प्रिय उद्घोष है – पृथिव्यायै समुद्रपर्यंताया एकराष्ट्र’। अर्थात समुद्र पर्यंत फैली हुई पृथ्वी हमारा एक राष्ट्र है। इसे हम विष्णुपुराण और ब्रह्म पुराण के उद्धरणों से समझ सकते है –
उत्तरं यत्समुद्रस्य हिमाद्रेष्चैव दक्षिणम् ।
वर्षं तद् भारतं नाम भारती यत्र सन्ततिः ।।
उत्तर, दक्षिण, पूर्व और पश्चिम में अपनी शाखाओं प्रशाखाओं के साथ फैला हुआ हिमालय और इन महती शाखाओं के अंतर्गत प्रदेशों के साथ यह हमारा भारत वर्ष है। कोई भी शक्तिशाली और बुद्धिमान राष्ट्र पर्वतों की चोटियों को अपनी सीमा नहीं बनाता। क्योंकि ऐसा करना आत्मघाती होता है। अतः पर्वत चोटियों से उत्तर, पूर्व और पश्चिम तक फैला हुआ यह हमारा भारत राष्ट्र है। महामति चाणक्य ने कहा है :-
‘‘हिमवत्समुद्रान्तरमुदीचीनं योजनसह्स्त्रपरिमाणाम्।’’
समुद्र से उत्तर एक सहस्र योजन तक विस्तृत भारत है। महाकवि कालीदास ने भी हिमालय को पूर्व और पश्चिम में फैली हुई भुजाओं वाला तथा पृथ्वी के मानदंड की तरह कहा है जो भुजाएं समुद्र को पूर्व और पश्चिम में छूती है। अतः यह विराट क्षेत्र भारत राष्ट्र है। महाराज रघु की विजय यात्रा में इस क्षेत्र का वर्णन हुआ है। हिमालय के पश्चिम में आर्यान (इरान) और पूर्व में श्रृंगपुर (सिंगापुर) की ओर फैली दोनों भुजाओं द्वारा पर्वत राज समुद्र का अवगाहन करते है। हिन्दू महासागर में कमल की पंखुडी के समान विद्यमान लंका मानों भारत माता के चरणों में चढ़ाई गई पंखुडी है। अपनी मातृभूमि का यह चित्र। सहस्त्रों वर्षों से हिन्दू जनमानस में देदीप्यमान है।

हमारे लिए यह सम्पूर्ण भूमि तपो भूमि है। इस पवित्र तपो भूमि के प्रत्येक कण के स्वातंत्र्य और सम्मान की रक्षा के लिए अपना सर्वस्व अर्पण करने की भावना ही इस महान राष्ट्र की भक्ति है। ऐसा राष्ट्र भक्त कभी अपनी मातृभूमि की किसी प्रकार की अवज्ञा सहन नहीं कर सकता। यह विजिगीषु वृत्ति ही हमारी राष्ट्र भक्ति का प्रमाण है।

यह हमारा राष्ट्र हिमालय की समस्त शाखाओं प्रशाखाओं के साथ समुद्र तक फैली भूमि के सभी प्रदेशों और हिन्दु महासागर स्थित समस्त द्वीप समूहों के साथ एक नैसर्गिक राष्ट्र है। इस तथ्य का साक्षी हमारा हजारों वर्षों का इतिहास है। हिन्दू ही इस भूमि की संतति के रूप में रहते आये है।
इसके स्थान पर अंग्रेजों और बाद में कांग्रेस ने प्रादेशिक राष्ट्रवाद को बढ़ावा दिया। परन्तु इसका परिणाम विघातक और पतनकारी ही सिद्ध हुआ। हमारे राष्ट्रीय नेताओं को युद्धप्रिय, उपद्रवी मुसलमानों से यह कहने का साहस होना चाहिए था कि आप सब के पूर्वज भी हिन्दू ही थे और इसलिए एक स्वाभिमानी समुदाय के समान आपको पुनः हिन्दू समाज में लौट आना चाहिए। उसके लिए आक्रामक वृत्ति का त्याग कर देना चाहिए और राष्ट्र जीवन की राष्ट्रीय धारा में स्वयं को विलीन कर देना चाहिए। परन्तु यह कहने के लिए सत्य की परम महत्ता में अविचल निष्ठा आवश्यक है और परिस्थिति के कठोर सत्य का सामना करने का अदम्य साहस अपेक्षित है। परन्तु हमारे उस समय के अनेक अग्रणी व्यक्तियों में सत्य के प्रति दृढ़ आग्रह का अभाव था और निर्भयता का भी अभाव था। मुसलमानों के दुराग्रह का सामना करने की उनमें न तो इच्छा थी और न ही निष्ठा। वे मुसलमानों से कभी यह कहने का साहस नहीं कर सके कि अपनी विघटनकारी वृत्ति को अब आप लोगों को त्यागना होगा। उसके स्थान पर वे हिन्दुओं से कहने लगे कि मुसलमानों के द्वारा किये गये ध्वंस और अत्याचारों को भूल जाओं। यदि वे तुम्हारी पूजा और शोभा यात्रा से कुपित होते है, तो पूजा मत करो और शोभा यात्रा मत निकालो। यदि वे तुम्हारी पत्नी और बेटियों को ले जाते है, तो ले जाने दें। उन्हें बाधा मत दो। जब हिन्दुओं को अपमानित करने के लिए मुसलमानों ने गाय काटी, तब हिन्दुओं से कहा गया कि वह मुसलमानों का धार्मिक अधिकार है। एक प्रसिद्ध हिन्दू राजनेता ने तो यह तक कह दिया कि स्वराज पाने के लिए हिन्दू-मुस्लिम एकता आवश्यक है और इसका सरलतम मार्ग यह है कि सभी हिन्दू अब मुसलमान बन जाये। उन्होंने इतना तक नहीं समझने का प्रयास किया कि ऐसा होने पर वह हिन्दू-मुस्लिम एकता किस प्रकार कही जायेगी? वह तो केवल मुस्लिम एकता कहलायेगी।
इन विचित्र बातों के द्वारा हिन्दुओं को बार-बार यह समझाया गया कि तुम अशक्त हो और निर्जीव हो। तुममें मुस्लिम रक्त प्रविष्ट होगा तभी तुम मातृभूमि के लिए लड़ सकोगें।

(इसी बात को भांति-भांति से कहा गया। यह कहा गया कि हमें मुस्लिम शरीर में हिन्दू मन चाहिए। अर्थात सभी हिन्दू मुसलमानों से एकाकार हो जाये कोष्ठक में ये तीन वाक्य लेखक की ओर से अर्थात मेरी ओर से है।)

वस्तुतः ऐसी विचित्र घोषणा करने वाले लोगों ने हिन्दू समाज के प्रति सबसे बड़े द्रोह का अपराध किया है। उन्होंने एक महान प्राचीन समाज को हतोत्साह करने का जघन्य पाप किया है। समाज को नंपुसक्ता का उपदेश देना और महावीर्य सम्पन्न हिन्दू समाज के आत्म विश्वास एवं चैतन्य को भंग करना संसार का सबसे बड़ा विश्वासघात है जो इस प्रकार के विचित्र हिन्दुओं ने किया है। ऐसे लोगों ने मानों हिन्दू समाज के समस्त पौरूष का क्षय करने की प्रतिज्ञा की है। इन्हें केवल धिक्कारा जा सकता है। ऐसे ही विश्वासघातियों के कारण भारत का विभाजन हुआ, और लाखों परिवार अपने पैतृक गृहों से उन्मूलित हो गये। अनेक प्रांत रक्त की नदियों के बहने से लाल हो गये और चारों ओर मृत्यु, विनाश तथा अपकीर्ति का ही प्रसार हुआ।

उन्माद से भरपूर मजहबी लोग राष्ट्र की सुरक्षा के लिए संकट है। ऐसे लोग भारत पर मानो सतत आक्रमण कर रहे समुदाय है। वे भारत वर्ष को पूरी तरह मुसलमान राज्य बना डालना चाहते है। यह बात विख्यात इतिहासज्ञ अर्नाल्ड टायनबी ने दो बार भारत देश की यात्रा कर और राष्ट्रीय गतिविधियों का निकट से अध्ययन कर लिखें गये अपने निबंध में कही है।

ऐसे उन्मादी लोगों ने देश में जगह-जगह अगणित छोटे-छोटे पाकिस्तान बना डाले है। अपने इलाके को ये अपना स्वतंत्र प्रदेश ही मान बैठते है। इसी प्रकार का आंतरिक संकट ईसाई मिशनरी भी भारत के लिए बनते है। वे अंतर्राष्ट्रीय ईसाई आंदोलन के एजेंट बन जाते है। कम्युनिज्म तो राष्ट्र के लिए विघातक सभी कार्यों में आग में घी का काम करता ही है। ऐसी स्थिति में राष्ट्र की प्रतिभा को पुनरूज्जीवित करना ही एक मात्र वरण योग्य मार्ग है।

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