हिन्दू राष्ट्र पर श्री अरविन्द के विचार

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प्रो. रामेश्वर मिश्र पंकज
दिल्ली । हिन्दू राष्ट्र पर श्री अरविन्द के विचार विस्तार से उनके अनेक निबंधों में दिये है। जिज्ञासुओं को इसके लिए उनके लिखें निबंधों के संकलन ‘‘फाउंडेशन आफ इंडियन कल्चर’ तथा ‘भारत का पुनर्जन्म’ एवं ‘आर्य’ पत्र में लिखें गये अनेक लेखों को स्वयं पढ़ना होगा। हम यहां केवल उसका सार ही दे सकते है अन्यथा इस विषय पर एक स्वतंत्र और नई पुस्तक ही बन जायेगी। एक प्रसिद्ध फ्रेंच लेखक द्वारा ‘भारत का पुनर्जन्म’ पुस्तक लिखित है और हिन्दी में प्रकाशित है तथा लेखक ने प्रकाशन से पूर्व हमारा अभिमत भी उस पुस्तक पर लिया था। नई दिल्ली में हम लोग आदरणीय श्री रामस्वरूप जी के कहने पर कई बार मिले थे।
श्री अरविन्द का कहना है कि ‘‘सनातन धर्म ही हिन्दुत्व है। उसका संबंध केवल भारतीय क्षेत्र से नहीं है अपितु सम्पूर्ण विश्वर और सम्पूर्ण मानव जाति से है। भारत में हजारों वर्षों से उसका पूरी व्यापकता से निरंतर पालन होता रहा है और ऐसा पालन करने वाले को इन दिनों हिन्दू कहा जाता है। परन्तु सत्य यह है कि संसार के किसी भी मनुष्य को सनातन धर्म का निषेध करने का कोई अधिकार नहीं है। क्योंकि सनातन धर्म का अर्थ है सार्वभौम मानव मूल्य – सत्य, अंहिसा, संयम, अस्तेय, अपरिग्रह, आंतरिक और बाहरी पवित्रता, संतोष, श्रेयस्कर जीवन और धर्म के लिए कष्ट सहन (तप), आध्यात्मिक सत्य के प्रतिपादक शास्त्रों का पठन-पाठन और मनन तथा विमर्श एवं सर्वव्यापी परम सत्ता की भक्ति। यह सम्पूर्ण विश्वं के सभी मनुष्यों का कर्तव्य है। इन कर्तव्यों का पालन नहीं करने वाले मनुष्य को दंडित करना राजधर्म है। ऐसे राजधर्म का पालन करने वाला राजा ही सनातन धर्म के पालक हिन्दू समाज का राजा कहा जा सकता है। हिन्दू धर्म का उत्थान ही, भारत का उत्थान है।’’
जहां तक इस्लाम की बात है, श्री अरविंद का स्पष्ट कथन है कि ‘‘इस्लाम का भारत के राष्ट्रीय जीवन में कोई भी श्रेयस्कर योगदान नहीं है। पैगंबर मुहम्मद ने परम सत्ता के समक्ष स्वयं को अर्पित किया, यह संभवतः योग की किसी अरब क्षेत्र में व्याप्त परम्परा का ही अनुसरण था। परन्तु उनके उपदेश केवल रेगिस्तान में रहने वाले घुमंन्तू बद्दुओं के लिए ही थे। शेष विश्वन के लिए उनका कोई उपयोग नहीं है। सभ्य समाज के लिए सुसंस्कृत जीवन और राज्य व्यवस्था का उनके उपदेश में कोई अवसर ही नहीं है। भारत में इस्लाम एक बर्बर और क्रूर व्यवहार की तरह ही देखा गया है। यहां उसका वहीं रूप प्रकट हुआ है। उसका कोई श्रेयस्कर रूप प्रकट होना बाकी है।’’
‘‘सनातन धर्म का प्रतिपादन वेदों में, सनातन के धर्म शास्त्रों में, उपनिषदों में, रामायण और महाभारत में, महान काव्य ग्रंथों और पुराणों में, चित्रकला, मूर्तिकला और साहित्य, संगीत तथा नाट्य में एवं विविध शिल्पों में हुआ है। भारत की सभ्यता का यह स्वरूप निर्विवाद है। वह दैहिक, मानसिक, बौद्धिक और आध्यात्मिक जीवन की समन्वित एकता है। उसके सभी सिद्धांत, विचार, जीवन रूप और व्यवहार रूप सृष्टि में सामंजस्य को सदा बनाये रखने और गतिशील रखने वाले है। ऐसे सामंजस्य को ही धर्म कहा गया है। अन्य संस्कृतियों में ऐसा सामंजस्य नहीं मिलता। वे अन्य राष्ट्र भी परम शक्ति के ही किसी न किसी रूप की अभिव्यक्ति हैं। परन्तु भारत राष्ट्र की शक्ति है ‘भारत शक्ति’। सनातन धर्म के प्रति निष्ठा ही ‘भारत शक्ति’ की अभिव्यक्ति है। यूरोप ने संघर्ष की जिस भौतिक शक्ति को अर्जित किया है वह उसे एशिया के सभी देशों के लिए आक्रामक बनाता है और उसमें एशिया को जीतने, अधीनस्थ बनाने और निगल लेने या पचा लेने का ही प्रयास किया है। इस प्रकार यूरोप की यह गति सनातन धर्म की विरोधी है। अपनी भौतिकवादिता और हिंसक आक्रामकता में यूरोप ने जीवन का आंतरिक सामंजस्य खो दिया है। भौतिक प्रगति और दक्षता ही उसके आराध्य देवता है जो उसे अन्यों से युद्ध के लिए निरंतर प्रेरित और उत्तेजित करते है। यूरोप ने भारत पर भौतिक विजय प्राप्त कर उस पर अपनी संस्कृति आरोपित करने का निरंतर प्रयास किया है। परन्तु संतोष की बात यही है कि ब्रिटिश शासन ने भारत को उसकी अपनी पहचान बनाये रखने के लिए भी कुछ अनुकूलता पैदा की है। इसका लाभ उठाकर भारत को अपनी धर्म सत्ता और सांस्कृतिक सत्ता पुनः प्रतिष्ठित करनी चाहिए और विजातीय ‘पेनेट्रेशन’ ( बलपूर्ण प्रवेश ) को समाप्त कर देना चाहिए ।’’
कुछ लोग प्रश्ना कर सकते है कि यह तो सुरक्षा और आक्रमण की भावना है। इसमें सामंजस्य और आदान-प्रदान की वृत्ति कहां है? क्या एक विश्वइव्यापी मानव संस्कृति के उभार के लिए काम नहीं करना चाहिए ? परन्तु तर्थ्य यह है कि भारत से जो कुछ छीना गया है, उसे फिर से पाना होगा और आक्रामक सभ्यताओं को रोकना ही होगा। ताकि सनातन धर्म के मूल जीवन रूप अखण्ड और पूर्णतः सुरक्षित रहे। इसमें पहले चरण में टकराव अनिवार्य है। इसके साथ ही यूरोप की अच्छाइयों से प्रतिस्पर्धा भी करनी होगी। यूरोपीय आक्रमण के स्थूल भौतिक रूप समाप्त होने पर भी संस्कृति की रक्षा का संघर्ष महत्वपूर्ण बना रहेगा। बल्कि उसका महत्व और अधिक बढ़ जायेगा। दूसरे चरण में सामंजस्य का प्रयास करना होगा और तीसरे चरण में उच्चतर चेतना में आरोहण के लिए अपेक्षित त्याग की वृत्ति आवश्याक होगी। यूरोप की भौतिकतावादी संस्कृति मानवता की मृत्यु का कारण बन रही है। इसके स्थान पर सनातन की साधना से सम्पूर्ण विश्वत ईश्वारीय राज्य का निवासी बनेगा और सबके जीवन में अखण्ड आनंद और सामंजस्य साकार होगा।’’
गांधी जी के विषय में श्री अरविंद ने यह लगातार कहा कि ‘वे झूठ को बढ़ावा देते है। भारत में इस्लाम झूठ और जहालत की ताकत से बढ़ा है। इस्लाम के जो मानवीय पक्ष बताये जाते है, उनका भारत में मुसलमानों ने एक तरह से उपहास ही उड़ाया है। मुसलमानों का राजनैतिक आचरण घोर असहिष्णु और भाईचारे का पूर्ण विरोधी रहा है। सच्चा भाईचारा तो एक उच्च आदर्श है। वह किसी भी रूप में असहिष्णुता का आधार नहीं बनता। गांधी जी जिस हिन्दू -मुस्लिम एकता की बात करते है वह झूठ से भरी कूटनीति है। लखनऊ पेक्ट और खिलाफ़त आंदोलन भयंकर राजनैतिक भूले रहीं है, जिन्होंने केवल अलगाववादी और हिंसक शक्तियों को बढ़ाया है और भारत का विभाजन इसी कारण हुआ है। अतः उस नीति को आगे ले जाना झूठ और अधंकार को ही बढ़ायेगा। इस्लाम की बर्बरता और क्रूरता के समक्ष समर्पण से न तो हिन्दू-मुस्लिम एकता संभव है और न ही शांति। गांधी की राजनैतिक पैतरेबाजी हिन्दुओं को कमजोर करती रही है और आगे भी वह नीति वही परिणाम लायेगी।’’

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