भुवनेश्वर : ओडिशा की राजधानी भुवनेश्वर से कुछ किलोमीटर दूर हीरापुर में स्थित 64 योगिनी मंदिर भारत की तांत्रिक परंपरा का एक जीवित, रहस्यमय और अत्यंत दुर्लभ अवशेष है। 9वीं -10वीं शताब्दी में बना यह मंदिर उन थोड़े से शाक्त-तांत्रिक केंद्रों में गिना जाता है जहाँ योगिनी उपासना अपने सबसे गूढ़ स्वरूप में की जाती थी। इसकी सबसे विशेष बात इसका खुला होना है, इस मंदिर की कोई छत नहीं है। तांत्रिक मान्यता है कि योगिनी-ऊर्जा सीधे आकाश-तत्त्व से जुड़कर साधक में शक्ति, साहस और चेतना का प्रसार करती है।



मंदिर की पूरी संरचना एक पूर्ण वृत्त में बनाई गई है, जो शक्ति-चक्र का प्रतीक है। इसी वृत्त में 64 योगिनियों की अत्यंत सूक्ष्म, रहस्यमयी और विशिष्ट मूर्तियाँ स्थापित हैं। हर योगिनी की मुद्रा, आयुध और भाव अलग है, मानो वे मनुष्य के भीतर छिपे 64 चेतना-स्तरों को दर्शाती हों। केंद्रीय गर्भगृह में महाशक्ति का रूप स्थापित है, जो सम्पूर्ण मंडल को ऊर्जा प्रदान करता है।
यह मंदिर केवल स्थापत्य का चमत्कार नहीं, बल्कि एक ऊर्जा-स्थल है। वृत्ताकार निर्माण, खुला आकाश और योगिनी-मंडल मिलकर एक ऐसा स्पंदन-क्षेत्र बनाते हैं जिसमें खड़े होकर साधक सहज रूप से एक विशेष शांत-उदात्त कंपन का अनुभव करता है। प्राचीन काल में यह स्थान कौल-पूजा, योगिनी साधना, रात्रि-चक्र और विभिन्न तांत्रिक प्रयोगों के लिए अत्यंत प्रतिष्ठित था।
हीरापुर का यह योगिनी मंदिर हमें याद दिलाता है कि भारतीय परंपरा में स्त्री-ऊर्जा, चेतना और तंत्र-साधना कितनी गहरी, वैज्ञानिक और विकसित थीं। आज भी यह स्थल एक अलौकिक शांतिपुंज जैसा अनुभव देता है , जहाँ आकाश, शक्ति और साधना एक साथ उपस्थित लगते हैं। यह केवल एक ऐतिहासिक धरोहर नहीं, बल्कि महाशक्ति के प्राचीन मंडल का जीवित साक्षात्कार है।
(लेखिका तंत्र साधक और तंत्र विषय की शोधार्थी हैं)



