प्रशांत पोळ
नागपुर : पचास के दशक मे, अमेरिका के राष्ट्रपती जॉन कॅनेडी ने Food for Peace (शांती के लिये भोजन) यह कार्यक्रम जारी किया। इसे कानून संमत करवाया गया, जो Public Law 480 (सार्वजनिक कानून क्रमांक 480) अर्थात ‘पी एल 480’ नाम से प्रसिद्ध हुआ। जवाहरलाल नेहरू के प्रधानमंत्री रहते हुए भारत की आर्थिक स्थिती कुछ ठीक नही थी। साठ के दशक मे हमारे यहां अनाज की भारी कमी थी। इसलिये भारत ने अमेरिका से, पी एल 480 के अंतर्गत अनाज की मदत मांगी। अमेरिका ने इसे 1960 मे स्वीकृती दी और भारत मे गेहू का आयात प्रारंभ हुआ।
अमेरिका से आयातित यह गेहू अच्छी गुणवत्ता का नही था। निकृष्ट था। किंतु हमारे पास कोई विकल्प ना होने के कारण, अमेरिका की दया पर निर्भर हम, वही गेहू खाते रहे। अगले वर्ष 1961 मे, अमेरिका ने पाकिस्तान के लिए गेहू के निर्यात को स्वीकृती दी।
कुछ राजनेता, उन दिनों खुश होकर वक्तव्य दे रहे थे की ‘देखिये, अमेरिका ने पाकिस्तान से पहले हमे गेंहू दिया।’
हम लाचारी की पराकाष्ठा पर जी रहे थे..!
*गेहू के आयात का यह क्रम अगले चार-पाच वर्ष चलता रहा। किंतु 1965 में, जब लालबहादुर शास्त्री प्रधानमंत्री थे तब, पाकिस्तान से युद्ध का वातावरण बन रहा था। अमेरिका हम पर युद्ध न करने का दवाब डाल रहा था। गेहू की आपुर्ती रोकने की धमकी दे रहा था। अमेरिका के एक मंत्री ने तो भारत को ‘भिखमंगो का देश’ तक कह डाला। शास्त्रीजी स्वाभिमानी थे। उन्होने गेहू लेने से इंकार किया। ‘जय जवान – जय किसान’ का नारा दिया। पुरे देश को इस अन्न संकट में, सप्ताह मे एक दिन उपवास करने का आवाहन किया।*
दुर्भाग्य से शास्त्री जी के स्वाभिमान का दौर ज्यादा चल न सका।
उन दिनो सारा विश्व भारत को किस दृष्टिकोन से देखता था, इसका प्रातिनिधिक चित्रण करने वाली एक हॉलीवुड की मूवी आई थी – ‘द पार्टी’
मेट्रो-गोल्डविन-मेयर के बॅनर तले बनी इस फिल्म मे मुख्य भूमिका मे थे, उस समय के प्रसिद्ध अभिनेता पीटर सेलर्स। 4 अप्रैल 1968 मे रिलीज इस मूवी मे पीटर सेलर्स ने एक ऐसे भारतीय अभिनेता की भूमिका कि थी, जो हॉलीवुड के एक बडे निर्माता ने दिये हुए पार्टी मे, गलतीसे निमंत्रित किया जाता हैं। वस्तूतः वो उस निर्माता की, युद्ध पर बन रही एक मूवी मे छोटीसी भूमिका निभा रहा होता है। किंतू गलतीवश, वह उस युद्धभूमी पर लगे सेट को नष्ट कर देता हैं। अत्याधिक गुस्सा होकर उस मूवी का दिग्दर्शक, उसे मूवी से निकालने के लिए अपने निर्माता को फोन करता हैं। निर्माता गुस्से मे पीटर सेलर्स का नाम (मूवी में हृदी बक्षी) लिखता है, उस पार्टी के आमंत्रितो की सूची मे !
निर्माता की सचिव, इस अभिनेता, हृदी बक्षी के नाम निमंत्रण भेजती है। और इस प्रकार यह भारतीय अभिनेता, हॉलीवुड की अत्यंत उच्चस्तरीय पार्टी मे पहुंच जाता है।
और फिर शुरू होती हैं, बक्षी के मूर्खता पूर्ण करतूतों की शृंखला। एक के बाद एक, बेवकूफी भरे काम करते करते बक्षी, उस हाय क्लास पार्टी की धज्जियां उडा देता है।
पीटर सेलर्स को भारतीय दिखाने के लिए उसे काला रंग पोता गया है। उसे बार-बार नमस्कार करते हुए दिखाया गया है। उसे राम-राम बोलते हुए दिखाया गया है। यह सब इसलिये की दर्शकों के मनमस्तिष्क पर यह पक्के रूप से अंकित हो जाएं, की यह मूर्खता पूर्ण काम करने वाला भारतीय है।
संक्षेप मे, मूवी यह दिखाना चाहती थी कि भारतीय यह अनपढ होते है, गवार होते है, असभ्य होते है, समाज के तौर-तरिके उनको नही आते हैं।
इस फिल्म की भारत के मात्र कुछ लोगो ने ही निंदा की। तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने भी इस मूवी को लेकर अपना रोष प्रकट किया। किंतु यह मूवी हिट रही। इसने अपनी लागत से दुगुनी रक्कम वसूल की।
उन दिनों भारत की, दुनिया मे यह छबी थी..!
– प्रशांत पोळ
_(सोमवार, दिनांक 16 फरवरी को प्रकाशित होने जा रही ‘इडिया से भारत : एक प्रवास’ इस पुस्तक के अंश।)_



