आकृति
दिल्ली । हम यदि संख्या-बल या चुनाव आदि को ध्यान में रखकर अनुचित के विरोध में मुँह नहीं खोलेंगें तो समाज में ऐसी विभाजनकारी प्रवृत्तियाँ बढ़ेंगीं। इससे विभाजन की खाई और चौड़ी होगी। “सर्व समाज को लिए साथ में आगे है बढ़ते जाना – यही हमारा ध्येय होना चाहिए। जातीय घृणा की हर घटना हिंदू समाज, समरस हिंदू समाज को कमजोर करेगा। उस घृणा के शिकार अगड़े हों, पिछड़े हों, दलित हों, आदिवासी हों, सबके साथ न्याय हो, बराबर न्याय हो! सब अपने हैं, सहोदर हैं।
मुझे यह पोस्ट फेसबुक पर मिला, थोड़ा संतुलित है।
मुझे लगता है कि हमें ऐसी घटनाओं पर मौन रहने या इनकी उपेक्षा करने के स्थान पर इन्हें संबोधित करना चाहिए। अन्यथा क्रिया-प्रतिक्रिया होगी, पक्ष-विपक्ष बनेंगें और हिंदू समाज के विरोधी हमें और बाँटेंगें। समूह के सम्मानित सदस्यों के क्या मत हैं?
फेसबुक पोस्ट 👇
दिल्ली विश्वविद्यालय के परिसर में पत्रकार रुचि तिवारी के साथ जो हुआ, वह केवल एक शारीरिक हमला नहीं था, बल्कि वह उस नैरेटिव की जीत है जो “सामाजिक न्याय” के नाम पर प्रतिशोध और घृणा को पाल रहा है। जब भीड़ किसी लड़की को उसके उपनाम (सरनेम) और जाति के आधार पर निशाना बनाती है, उसके कपड़े फाड़ने की कोशिश करती है और अपमानजनक टिप्पणी करती है, तो यह स्पष्ट हो जाता है कि हम एक सभ्य समाज से पीछे हटकर ‘भीड़तंत्र’ की ओर बढ़ रहे हैं।
1. सुरक्षा का चश्मा और जातिगत भेदभाव
विडंबना देखिए कि आज के दौर में अपराध की गंभीरता अपराधी और पीड़ित की जाति देखकर तय की जा रही है। यदि पीड़ित ब्राह्मण या सामान्य वर्ग से है, तो अक्सर बौद्धिक गलियारों में सन्नाटा पसर जाता है। क्या किसी महिला की गरिमा उसकी जाति से तय होगी? UGC गाइडलाइंस पर सवाल पूछना एक पत्रकार का संवैधानिक अधिकार है, लेकिन बदले में उसे शारीरिक और यौन उत्पीड़न (Sex#ual Harassment) का सामना करना पड़े, यह लोकतंत्र के लिए शर्मनाक है।
2. क्या कानून में ‘जातिवादी घृणा’ केवल एक तरफा है?
लेख में उठाए गए कानूनी विकल्प के मुद्दे पर बात करें तो भारतीय दंड संहिता (अब भारतीय न्याय संहिता) और विशेष कानूनों के बीच एक बड़ी खाई दिखती है:
SC/ST एक्ट बनाम सामान्य कानून: जहाँ एक तरफ विशेष कानून सुरक्षा प्रदान करते हैं, वहीं सामान्य वर्ग की महिलाओं के पास केवल IPC/BNS की धाराएँ (जैसे छेड़छाड़ के लिए धारा 354) बचती हैं।
हृेट स्पीच और हेट क्राइम: यदि किसी को ‘ब्राह्मण’ होने के कारण निशाना बनाया गया, तो यह स्पष्ट रूप से ‘Targeted Violence’ है। अदालत में यह साबित करना चुनौतीपूर्ण हो सकता है क्योंकि हमारी कानूनी और सामाजिक व्यवस्था में यह मान लिया गया है कि “विशेषाधिकार प्राप्त” वर्ग पीड़ित नहीं हो सकता। यह सोच बदलनी होगी।
3. सत्ता की जवाबदेही और समाज की चुप्पी
जब राजनीति “एक हैं तो सेफ हैं” जैसे नारों के इर्द-गिर्द घूमती है, तो जमीनी हकीकत इन दावों की पोल खोल देती है। अगर राजधानी के सबसे प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय में पुलिस के सामने एक बेटी सुरक्षित नहीं है, तो वह सुरक्षा का दावा खोखला है।
“अपराध का कोई धर्म या जाति नहीं होती, लेकिन जब अपराध का ‘कारण’ जातिगत घृणा बन जाए, तो शासन को कठोरतम कदम उठाने ही चाहिए ताकि यह संदेश जाए कि कोई भी वर्ग कानून से ऊपर नहीं है।”
निष्कर्ष: अब जागने का समय है
यह हमला केवल रुचि तिवारी पर नहीं, बल्कि हर उस व्यक्ति पर है जो अपनी योग्यता और पहचान के साथ सिर उठाकर जीना चाहता है। यदि आज समाज ने इस ‘जातिवादी कट्टरता’ के खिलाफ आवाज नहीं उठाई, तो कल यह आग हर घर तक पहुँचेगी। न्याय की मांग किसी एक जाति की नहीं, बल्कि मानवता और संविधान की रक्षा की मांग है,जेएनयू में हाल ही में कुछ छात्रों को रस्टिकेट किया गया, जो एक अच्छा उदाहरण है, पर आगे क्या? कैम्पस में एक छात्रा के कपड़े फाड़ने के प्रयास करने वाले को जेल होनी चाहिए।
आज रुचि तिवारी के पास कौन से विधिक विकल्प हैं? क्या वह कोर्ट में ‘जातिवादी घृणा’ का आधार बना सकती है? नहीं, क्योंकि वो जिस समाज से आती है, उसके पास ऐसा कोई विकल्प नहीं। उसे कोर्ट में यह बताना होगा कि उस पर हुए अपराध की जड़ में जातिवादी घृणा है, पर प्रतिवादी वकील कहेगा कि ब्राह्मणों के साथ कैसा जातिवाद?
यह विषाक्त वातावरण नरेन्द्र मोदी और भाजपा की ही देन है। नाम उसी का लिया जाएगा जो ई-रिक्शा से वंदे भारत तक हर उपलब्धि का क्रेडिट लेता है। यह क्रेडिट भी मोदी जी का ही है।



