ईश्वर मुझे इतना शक्ति दें कि मैं जीवन पर्यंत इस संगठन में कार्य करता रहूँ

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भूपेन्द्र सिंह

लखनऊ। UGC गाइडलाइन कोई कानून नहीं है, यह लागू भी नहीं हुआ है, इसका ज़मीन कर कोई भी अस्तित्व जीरो है। लेकिन अचानक सवर्ण समाज के ऊपर अत्याचार बढ़ चुका है, वह समाप्त होने के कगार पर पहुँच चुके हैं, देश में बाक़ी जातियां उनके विनाश के लिए लालायित हो उठी हैं। उनका ओपिनियन मेकिंग और डिसिजन मेकिंग में अस्तित्व समाप्त हो चुका है। ये सब चार सप्ताह में हो चुका है, पता नहीं अगले चार सप्ताह में क्या होगा। बच बचाकर रहिए, ऐसे कई कहानी मार्केट में आने वाला है जो “भेड़िया आया” के तर्ज़ पर होगा।

नरेन्द्र मोदी से लगाये, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ तक सब सवर्ण विरोधी हो चुके हैं। कहीं दूर दूर तक सवर्ण समाज को पूछने वाला नहीं है, ऐसा कब हो गया, कैसे हो गया, किसी को पता नहीं चल पा रहा है। हिंदुत्व अब तमाम लोगों को चूरन लग रहा है। कुछ लोगों को राम मंदिर में अब दिव्यता नहीं दिखाई पड़ रही है। कुछ लोगों को राष्ट्रवाद अब अफीम नज़र आ रहा है। लगातार भाजपा, मोदी, अमित शाह, योगी, संघ सबके ख़िलाफ़ खड़े हैं। इनको पता है कांग्रेस, सपा, राजद सबकी सच्चाई, लेकिन इनको लग रहा है कि मंडल के बाद राजनीति ने जो करवट ली है उसे हम लगातार विरोध करके पलट देंगे। संघ, मोदी, योगी, शाह, भाजपा को वापस मंडल से पहले वाले मोड में रिसेट कर देंगे। किसी को यदि कांस्टीपेशन भी हो गया तो अब गलती मोदी की है। जो वामपंथी और कांग्रेस कर रहे हैं उसकी गलती मोदी जी की है, इसलिए ये नाराज़ है और बदले में वामपंथ और कांग्रेस की वापसी करायेंगे।

जातियों में प्रेम इस कदर है कि पूछिये नहीं, ठाकुर को ब्राह्मण नहीं पच रहा, भूमिहार को ब्राह्मण ठाकुर नहीं पच रहे, ठाकुर को ब्राह्मण नहीं पच रहा। हद तो उत्तर प्रदेश में देखने को मिली कि कुर्मी को प्रदेश अध्यक्ष बना दिया गया तो समकक्ष लोधी बिरादरी के नेता लखनऊ में जमावड़ा किए और प्रत्यक्ष अप्रत्यक्ष नाराज़गी दिखा रहे हैं। कुर्मी कोइरी लोधी तीनों यादवों को नहीं देखना चाहते। अभी एक साल तक तमाम जातियां एक के बाद एक कष्ट में आती रहेंगी। उत्तर प्रदेश चुनाव से पहले यह कष्ट जारी रहेगा।

सच बात ये है की इस देश में हिंदुत्व के अतिरिक्त सब कुछ फ्रॉड है, सब केवल तोड़ने वाली, लड़ाने वाली पहचान है। मूर्ख आदमी, असफल आदमी जिसकी अपनी कोई पहचान नहीं, जिसकी अपनी कोई उपलब्धि नहीं, वह पुरानी कहानियाँ सुन सुनकर उसी कहानियों में जी रहा है। अपनी वास्तविक स्थिति से इतर एक कल्पना लोक में जी रहा है। मानसिक रोगियों जैसी स्थिति बनी हुई है। मैंने एक रील देखा जिसमें ब्रजेश पाठक जी राजनाथ सिंह जी का पैर छूते नज़र आ रहे हैं, मैंने उसे अपने मित्र ऋषिकांत पांडे जी को भेजा। उसमें नए नए बीस बीस साल के लड़के ब्रजेश पाठक जी को गाली दे रहे हैं कि ब्राह्मण होकर ठाकुर का पैर छू रहे हैं। राजनाथ जी उम्र मे, अनुभव में हर प्रकार से श्रेष्ठ हैं लेकिन ये बीस बीस साल के लड़के जो दस बीस हज़ार के नौकरी के मोहताज हैं, वह दुखी हैं कि पाठक जी ने सिंह साहब का पैर क्यों छुआ?

कुछ दिन पहले कुर्मी समाज में पैदा हुए रीलबाज़ों के बारे में लिखा तो कई लोग दुखी हो गए। कहने लगे कि समाज में कुछ लोग तेज तर्रार निकल रहे हैं तो आप अनावश्यक उनका विरोध क्यों कर रहे हैं? अब मैं कैसे समझाउ कि ये जो बीस बीस गाड़ी लेकर अनावश्यक रील बना रहे हो, फ़र्ज़ी साउंड इफ़ेक्ट्स डाल रहे हो, यह सब कम आईक्यू वालो के लिए ठीक है लेकिन एक औसत आदमी ये पूछेगा की भाई तुम समाज का नेतृत्व करना चाहते हो तो तुम्हारा काम लोगों को शांत, सहज और समझदार बनाना है या फिर ये सब बेवक़ूफ़ी सिखाना है? दूसरे तुमसे क्या सीखें? खेत बेचकर ब्लैक स्कॉर्पियो ख़रीदो?

मनोरोगियों की संख्या बढ़ रही है, व्यक्ति केवल दूसरे से गंदगी सीख रहा है। घर घर मनोरोगी पैदा करने की फैक्ट्री लगी हुई है। ब्राह्मण ही ब्राह्मणवाद से आज़ादी के नारे लगा और लगवा रहे हैं। उन्हीं से भरे संस्थानों में ब्राह्मणों को यूरेशिया भेजा जा रहा है। यादव समाज के नेता गाय गोबर जैसे हमारे सभ्यता के आधारभूत पूंजी से घृणा फैलाते नज़र आ रहे हैं। इन सबके पीछे एकमात्र मनोरोग है जाति। लोग मुझसे कहते हैं कि इसके आधार पर गौरव का भाव जाग्रत हो, यह मार्ग निकालना चाहिए। मुझे यह फ्रॉड समझ में आता है। इससे गौरव का बोध तो पनपता मुझे नहीं दिखता, केवल एक दूसरे को नीचा दिखाने का भाव ही दिखाई पड़ता है। इसलिए मैं बार बार लिखता हूँ कि अपने जातीय पहचान को लेकर सहज रहना चाहिए और हिंदुत्व को लेकर गौरव का भाव उत्पन्न करना चाहिए। जाति के नाते न हमारी नैतिकता तय होती है, न हमारा चिंतन, यह दोनों और सबसे महत्वपूर्ण बात स्वतंत्र चिंतन की प्रक्रिया, यह दुनिया की सबसे बड़ी थाती है, जो हिंदुत्व के नाते हमारे पास है। इसी पर गर्व करना होगा।

ऐसे में जब मैं सुदूर से सुदूर क्षेत्रों में संघ के कार्यकर्ताओं को काम करते देखता हूँ, छोटे से लेकर बड़े तक, तमाम लोगों को बिना प्रतिक्रिया भाव के समाज के प्रति सकारात्मक होकर काम करते देखता हूँ तो इस संगठन के प्रति विश्वास बढ़ता जाता है। ये वो लोग हैं जो हवा के झोके के साथ बहते नहीं हैं, इनका वैचारिक आधार मज़बूत है। ये वो लोग नहीं है जो दस साल पहले तक बाबरी के पक्ष में थे, सेक्युलरज़ीम की अफ़ीम पिला रहे थे और आज़ अचानक हवा बदली तो हिंदुत्व के साथ खड़े हो गए। फिर कोई मुद्दा आया तो भावनाओं में बह गए। वह स्थिर चित्त हैं, विचार को लेकर दृढ़ हैं, नेतृत्व को लेकर विश्वास है। मैं चाहता हूँ कि ईश्वर मुझे इतना शक्ति दें कि मैं इस संगठन में जीवन पर्यंत कार्य करता रहूँ ताकि इस धारा में जुड़कर शांत मन, स्थिर चित्त, गहरी समझ, सकारात्मक ऊर्जा और वास्तविक जमीनी कार्य कर सकूँ। मेरे मन में किसी भी हिंदू जाति, समाज, परिवार के प्रति ख़राब विचार कभी न आए।

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