इजराइल-ईरान युद्ध का वो पहलू जो किसी को नहीं दिखा

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अनुराग पुनेठा
दिल्ली । फरवरी 2026 के मध्य में, अमेरिका और इजराइल ने ईरान के सामने एक सख्त शर्त रखी थी। यह डेडलाइन मुख्य रूप से ईरान के परमाणु कार्यक्रम से जुड़ी थी। अमेरिका राष्ट्रपति और इजराइल ने मांग की थी कि ईरान को 24 से 48 घंटों के भीतर एक ऐसा विस्तृत प्रस्ताव देना होगा जिसमें वह Uranium Enrichment को पूरी तरह बंद करने और अपने मुख्य परमाणु केंद्रों (जैसे फोर्डो और नतांज़) को निष्क्रिय करने पर सहमत हो। 22-23 फरवरी के आसपास यह स्पष्ट कर दिया गया था कि यदि ईरान 48 घंटों के भीतर ठोस प्रस्ताव नहीं देता, तो जिनेवा में होने वाली वार्ता का तीसरा दौर रद्द कर दिया जाएगा और Military Option सक्रिय हो जाएगा। यह डेडलाइन 25 फरवरी को समाप्त हो रही थी—ठीक उसी दिन जब प्रधानमंत्री मोदी इजराइल की धरती पर थे।
लेकिन इसमें एक दिलचस्प पेंच है, यह डेडलाइन के बारे में नहीं है। यह जिनेवा वार्ता या समंदर में तैनात विमान वाहक पोतों के बारे में भी नहीं है। जब 25 फरवरी को भारत के प्रधानमंत्री तेल अवीव की धरती पर उतरे। उन्होंने नेतन्याहू से हाथ मिलाया। शाम 4:30 बजे इजराइली संसद को संबोधित किया, ‘याद वाशेम’ में श्रद्धांजलि अर्पित की।
गौर कीजिए—48 घंटे की वह बहुचर्चित समयसीमा ठीक उसी दिन खत्म हुई, जिस दिन मोदी का विमान इजराइल पहुँचा। रणनीति के जानकारों को पता है- आप ईरान पर हमला तब नहीं करते, जब दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र का नेता आपकी संसद में खड़ा हो। आप ऐसी स्थिति पैदा नहीं करते जहाँ ईरान की जवाबी बैलिस्टिक मिसाइलें या ड्रोन उस वक्त इजराइल की ओर आएं जब एक हाई-प्रोफाइल राजकीय अतिथि वहाँ मौजूद हो। दोनों देशों की खुफिया एजेंसियां और सीक्रेट सर्विस ऐसा कभी होने नहीं देंती है, यह तकाज़ा है .
अगर नेतन्याहू इस समय हमला करते, तो वह उस कूटनीतिक गठबंधन को ही राख कर देते जिसे वह बनाने की कोशिश कर रहे हैं। उन्होंने मोदी की इस यात्रा को ईरान जैसे ‘कट्टरपंथी धुरों’ के खिलाफ एक Hexagon of Alliances बनाने जैसा बताया था। कोई भी अपना किला बनाते समय उसमें खुद विस्फोट नहीं करता। इसका सीधा सा मतलब है: हमले की खिड़की 26 फरवरी की शाम को खुली, मोदी के प्रस्थान के ठीक बाद। और उसी दिन जिनेवा में बातचीत शुरू हुई। यह एक सोची-समझी चाल थी। अगर ईरान बिना किसी ठोस प्रस्ताव के आता है, तो पूरी दुनिया के सामने उसकी ‘कूटनीतिक विफलता’ का दस्तावेजीकरण हो जाता। दुनिया कहती कि इजराइल ने बचने का रास्ता दिया था, जिसे ईरान ने ठुकरा दिया। सैन्य कार्रवाई के लिए ‘नैतिक और कानूनी आधार’ अंतरराष्ट्रीय मीडिया के सामने तैयार हो गया। 2 मार्च पुरिम है , यह इजराइली त्योहार है जो फारसी (Persian) साजिश से यहूदियों की रक्षा का जश्न मनाता है। श्रीलंका गार्डियन जैसे विश्लेषकों ने इसे ‘हमले की संभावित तारीख’ बताया है। इस दिन हमला करना सिर्फ सैन्य नहीं, बल्कि एक गहरा प्रतीकात्मक संदेश होगा।
यह सात दिनों का एक घातक क्रम है। मंगलवार को डेडलाइन। बुधवार तक मोदी का कूटनीतिक कवच। बुधवार रात जिनेवा में आधिकारिक विफलता। गुरुवार से रविवार तक युद्ध की अंतिम तैयारी। और सोमवार, 2 मार्च को—पुरिम।
अब उस सुराग पर गौर करें जिसे अक्सर नजरअंदाज कर दिया जाता है। भारत ने अपने नागरिकों को ईरान छोड़ने के लिए एक सख्त एडवाइजरी जारी की। उन्होंने “सावधानी” बरतने को नहीं कहा। उन्होंने “यात्रा टालने” की सलाह नहीं दी। उन्होंने कहा—निकल जाओ just Leave।

भारत जानता था कि उसके प्रधानमंत्री का विमान कब इजराइली हवाई क्षेत्र से बाहर निकलेगा, और वह यह भी जानता था कि उसके तुरंत बाद आसमान का रंग कैसा होने वाला है। मोदी संकट के बावजूद इजराइल नहीं गए; मोदी संकट की वजह से इजराइल गए। नेतन्याहू इस ऐतिहासिक दस्तावेज पर कार्रवाई करने से पहले दुनिया के बड़े खिलाड़ियों के हस्ताक्षर जुटा रहे हैं। जब धमाके होंगे, जो हो गये, तो नेतन्याहू दुनिया को दिखा सकेंगे कि दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के नेता उनके साथ खड़े थे। यह महज एक दौरा नहीं था। यह हमले से पहले की वैधता हासिल करने का एक मास्टरस्ट्रोक है। शानका एंस्लेम परेरा( चर्चित पुस्तक “The Ascent Begins: The World Beyond Empire — Sovereignty in the Age of Collapse के लेखक)

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