जब एक बयान आईना बन जाए, सुबह की दो तस्वीरें, एक देश

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आगरा ज़िले के एक गाँव में सुबह होते ही गृह लक्ष्मी की आँख खुल जाती है। सूरज निकलते ही सबके लिए चाय बनानी है, फिर पंप चलाके पानी भरना, भैंस को चारा डालना, बच्चों के कपड़े धोना और ससुराल के लिए खाना बनाना। सिर पर दुपट्टा ठीक करते हुए वह दिन की फेहरिस्त मन ही मन दोहरा लेती है, खेत का काम, दोपहर का खाना, और शाम तक थकान से भरा एक और दिन। लक्ष्मी के लिए सुबह का मतलब सपनों की शुरुआत नहीं, ज़िम्मेदारियों की कतार है। स्कूल की किताबें कभी थीं, पर आठवीं के बाद वे अलमारी में नहीं, यादों में बंद हो गईं।

उसी वक़्त, चेन्नई के पास एक छोटे से क़स्बे में नागम्मा भी उठती है। वह जल्दी में है, मगर बेबसी में नहीं। नहाकर वह अपनी साड़ी संभालती है, मोबाइल पर बस का टाइम देखती है और माँ के हाथ की इडली खाकर दुकान के लिए निकल पड़ती है। वह एक रेडीमेड कपड़ों की दुकान में सहायक है। तनख़्वाह बहुत बड़ी नहीं, मगर अपनी है। शाम को उसे अकाउंट्स का छोटा सा कोर्स भी करना है। नागम्मा की सुबह में मेहनत है, मगर एक उम्मीद भी है, आगे बढ़ने की चाहत भी।

ये दो औरतें किसी टीवी बहस का हिस्सा नहीं हैं, न ही किसी सियासी बयान का हवाला। फिर भी, इन्हीं दो सुबहों के बीच वह फ़ासला छुपा है, जिसने हाल ही में देश की राजनीति को गरमा दिया। यह फ़ासला उत्तर और दक्षिण के बीच किसी दुश्मनी का नहीं, बल्कि सोच, मौक़ों और प्राथमिकताओं का है।

चेन्नई के एक कॉलेज में दिया गया एक बयान और पूरा देश बेचैन हो उठा। डीएमके सांसद दयानिधि मारन की बातों को “अपमानजनक”, “विभाजनकारी” और “देश तोड़ने वाली” कहा गया। टीवी स्टूडियो गरम हो गए, सियासी बयानबाज़ी तेज़ हो गई। लेकिन इस शोर-शराबे के पीछे एक कड़वी हक़ीक़त छिपी थी, जिसे भारत बरसों से कालीन के नीचे दबाता आया है, हमारे देश में औरतों की हालत हर जगह एक जैसी नहीं है।

बात कहने का तरीका भले सख़्त था, लेकिन नाराज़गी इस बात की ज़्यादा थी कि आईना बहुत पास रख दिया गया। क्योंकि अगर भावनाओं को एक तरफ़ रखकर आँकड़ों को देखा जाए, तो सच साफ़ नज़र आता है, दक्षिण भारत की औरतें, औसतन, ज़्यादा पढ़ी-लिखी हैं, ज़्यादा कामकाजी हैं, और कुछ हद तक स्वतंत्र भी हैं, जबकि उत्तर भारत के बड़े हिस्सों में हालात अब भी पीछे हैं।

यह उत्तर बनाम दक्षिण की लड़ाई नहीं है। यह इतिहास, नीतियों और राजनीतिक नीयत का सवाल है।

सबसे पहले तालीम की बात करें, औरतों की मज़बूती की पहली सीढ़ी। देश में महिला साक्षरता बढ़कर करीब 75 फ़ीसदी हो चुकी है, लेकिन इलाक़ाई फ़ासला अब भी बहुत बड़ा है। केरल में महिला साक्षरता करीब 94 फ़ीसदी है। यह यूँ ही नहीं हुआ, सालों की समाज सुधार मुहिम, सरकारी निवेश और शिक्षा को प्राथमिकता देने का नतीजा है। तमिलनाडु में भी लड़कियों के लिए छात्रवृत्ति, मुफ़्त साइकिल, लैपटॉप जैसी योजनाओं ने पढ़ाई को सपना नहीं, हक़ बनाया।

इसके मुक़ाबले उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे राज्यों में महिला साक्षरता अब भी 55 से 63 फ़ीसदी के बीच अटकी हुई है। कम उम्र में शादी, घर का बोझ, सुरक्षा की चिंता और स्कूलों की कमी, ये सब मिलकर लड़कियों को जल्दी पढ़ाई छोड़ने पर मजबूर करते हैं। दक्षिण में जहाँ लड़कों-लड़कियों के बीच पढ़ाई का फ़ासला कम है, वहीं उत्तर में यह खाई बहुत गहरी है। यह महज़ इत्तेफ़ाक़ नहीं, बल्कि सोच और सियासत का नतीजा है।

पढ़ाई से रोज़गार का रास्ता निकलता है। यहाँ भी दक्षिण आगे है। तमिलनाडु, कर्नाटक और आंध्र प्रदेश में औरतों के लिए काम के मौके ज़्यादा हैं, फ़ैक्ट्रियाँ, कपड़ा उद्योग, स्वास्थ्य, शिक्षा। तमिलनाडु में तो देश की लगभग आधी महिला मैन्युफैक्चरिंग मज़दूर काम करती हैं। क्रेच, हॉस्टल और अपेक्षाकृत सुरक्षित माहौल ने औरतों को घर से बाहर निकलने का हौसला दिया।

उत्तर भारत में हालात बदल रहे हैं, यह सच है। उत्तर प्रदेश में महिलाओं की कामकाजी हिस्सेदारी हाल के सालों में बढ़ी है, ख़ासकर स्वयं सहायता समूहों के ज़रिये। लेकिन ज़्यादातर काम अब भी असंगठित है, बिना तनख़्वाह, बिना सुरक्षा, बिना पहचान। मजबूरी में किया गया काम सशक्तिकरण नहीं, बस गुज़ारा है।

असल आज़ादी तो वहाँ से शुरू होती है जहाँ औरत ख़ुद तय करे, कब शादी करनी है, कितने बच्चे हों, अकेले बाहर जाना है या नहीं, घर में उसकी बात सुनी जाएगी या नहीं। इन पैमानों पर भी दक्षिण बेहतर नज़र आता है। वहाँ शादी की उम्र ज़्यादा है, बच्चे कम हैं और फैसलों में औरतों की भागीदारी भी ज़्यादा है। उत्तर भारत के कई हिस्सों में आज भी कम उम्र की शादी, ज़्यादा बच्चे और “इज़्ज़त” के नाम पर पाबंदियाँ आम हैं। हिंसा को भी कई बार चुपचाप जायज़ ठहरा दिया जाता है।

यह कहना उत्तर की औरतों का अपमान नहीं है। उल्टा, यह मानना है कि उनके पैरों में ज़्यादा बेड़ियाँ हैं और उन्हें तोड़ने के औज़ार कम दिए गए हैं।
अफ़सोस यह है कि पूरी बहस उत्तर-दक्षिण की सियासी तकरार बनकर रह गई। जबकि सच्चाई यह है कि लैंगिक समानता में भारत दुनिया में 131वें नंबर पर है, यह हम सबके लिए शर्म की बात है। सवाल यह नहीं कि दयानिधि मारन माफ़ी माँगें या नहीं। असली सवाल यह है कि उत्तर भारत अपनी बेटियों से कब माफ़ी माँगेगा?

अब उत्तर भारत में तेज़ सामाजिक सुधार की ज़रूरत है, और वह टाली नहीं जा सकती। लड़कियों की पढ़ाई में बड़ा निवेश, बाल विवाह पर सख़्ती, सुरक्षित यातायात, महिलाओं के लिए रोज़गार, और साफ़ सियासी पैग़ाम कि लड़की की जगह सिर्फ़ रसोई या गोद नहीं है।

दक्षिण भारत कोई नैतिक सर्टिफ़िकेट नहीं दिखा रहा, बस एक कामयाब मॉडल पेश कर रहा है। यह साबित करता है कि जब सरकार लगातार औरतों के साथ खड़ी होती है, तो समाज भी धीरे-धीरे बदलता है।

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Brij Khandelwal

Brij Khandelwal

Brij Khandelwal of Agra is a well known journalist and environmentalist. Khandelwal became a journalist after his course from the Indian Institute of Mass Communication in New Delhi in 1972. He has worked for various newspapers and agencies including the Times of India. He has also worked with UNI, NPA, Gemini News London, India Abroad, Everyman's Weekly (Indian Express), and India Today. Khandelwal edited Jan Saptahik of Lohia Trust, reporter of George Fernandes's Pratipaksh, correspondent in Agra for Swatantra Bharat, Pioneer, Hindustan Times, and Dainik Bhaskar until 2004). He wrote mostly on developmental subjects and environment and edited Samiksha Bharti, and Newspress Weekly. He has worked in many parts of India.

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