पिछले पंद्रह दिनों से मैं पश्चिम बंगाल में रहा और उसके उपरांत बिहार के विभिन्न क्षेत्रों में निरंतर प्रवासरत हूँ। प्रातः 7 बजे से रात्रि 11 बजे तक प्रतिदिन औसतन 50 से 100 लोगों से संवाद हो रहा है। इनमें सर्वाधिक संख्या 20 से 25 वर्ष आयु वर्ग के युवाओं की है।
इन युवाओं के मन में उठ रही चिंताएँ, आशंकाएँ और प्रश्न यदि समय रहते संवेदनशीलता एवं गंभीरता के साथ संबोधित नहीं किए गए, तो इसका दुष्प्रभाव केवल वर्तमान तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि समाज के ताने-बाने और सामाजिक समरसता को दीर्घकाल तक क्षति पहुँचा सकता है।
मैं केवल नगरों तक सीमित नहीं हूँ, बल्कि संपर्कित गाँवों में जाकर हर वर्ग और हर समाज के लोगों से निरंतर संवाद कर रहा हूँ। सोशल मीडिया से उपजा यह विषय अब घर-परिवार के सामान्य विमर्श का हिस्सा बन चुका है। जिस वर्ग को लाभ पहुँचाने की मंशा से यह रेगुलेशन लाया गया, उसी वर्ग के अनेक लोग स्वयं कह रहे हैं कि उन्हें इसकी आवश्यकता नहीं थी। समाज धीरे-धीरे एक-दूसरे के निकट आ रहा था, दूरियाँ मिट रही थीं। इन दूरियों को पाटने में स्वयं भाजपा और संघ की कई पीढ़ियों का त्याग, परिश्रम और साधना लगी है; किंतु इस एक निर्णय ने समाज को गहराई से विभाजित कर दिया है और यह आशंका निरंतर प्रबल हो रही है कि यह विभाजन आगे और व्यापक होगा।
मेरा जलपान, दोपहर एवं रात्रि भोजन प्रतिदिन भिन्न-भिन्न परिवारों के यहाँ होता है। भोजन के दौरान 10 से 20 लोग सहज रूप से एकत्रित हो जाते हैं और लगभग हर बार यह प्रश्न उठता है, सरकार को ऐसा निर्णय लाने की आवश्यकता आखिर कहाँ थी? क्या इसकी कहीं से कोई ठोस, व्यापक और वास्तविक माँग थी? यह अत्यंत चिंताजनक है कि जो राजनीतिक दल दशकों तक सामाजिक समरसता और एकात्मता का संदेश देता रहा, वही आज ऐसी नीतियाँ लेकर सामने आ रहा है, जो सामाजिक ताने-बाने को कमजोर करती प्रतीत होती हैं। परिणामस्वरूप समाज में उसके प्रति भरोसा डगमगाया है। लोग इसे विश्वासघात के रूप में देखने लगे हैं ; न केवल वह वर्ग जो सीधे प्रभावित है, बल्कि सामान्य जनमानस के बीच भी यह धारणा बनती जा रही है कि जो दल अपने लिए जीवन अर्पित करने वालों, खून-पसीना बहाने वालों के हितों को भी दाँव पर लगा सकता है, वह अन्य वर्गों के हितों की रक्षा कैसे करेगा।
विभाजन की इस विषबेल को अब तक वामपंथी विचारधारा खाद-पानी देती रही है; किंतु भाजपा भी इसी राह पर चलेगी, इसकी किसी ने कल्पना नहीं की थी। वर्षों की साधना और निरंतर प्रयासों के पश्चात हिंदू समाज एक संगठित शक्ति के रूप में एकजुट हुआ था। सनातन संस्कृति से गहरे जुड़े लोगों का एक ऐसा मतदाता वर्ग विकसित हुआ था, जो जाति से ऊपर उठकर सांस्कृतिक और राष्ट्रीय सरोकारों के लिए जीता-मरता था और तन-मन-धन से समर्पित था। किंतु इस प्रकार के विभाजनकारी निर्णयों ने उस संगठित सामाजिक शक्ति को गहरा आघात पहुँचाया है।
आज आवश्यकता इस बात की है कि सरकार और नीति-निर्माता समाज की जमीनी भावनाओं को समझें, युवाओं की आशंकाओं को गंभीरता से सुनें और उन निर्णयों पर पुनर्विचार करें, जो सामाजिक एकता को कमजोर करते हों। सत्ता का धर्म समाज को जोड़ना है, बाँटना नहीं, और यही अपेक्षा आज देश का जागरूक, संवेदनशील और चिंतित नागरिक कर रहा है।



