जयपुर। भारतीय समाज में जाति को लेकर सदियों से चली आ रही दीवारों को तोड़ने वाली अनगिनत घटनाएं मौजूद हैं, लेकिन उन्हें अक्सर अनदेखा कर दिया जाता है। कुछ ताकतें जानबूझकर समाज को जाति के आधार पर बांटने में लगी रहती हैं, जबकि मजहब की ‘सच्चाई’ इससे कहीं बड़ी है।
कांग्रेस जैसी पार्टियों ने दशकों तक अपनी राजनीति में हिंदुओं को जाति के नाम पर बांटने का काम किया और साथ ही धार्मिक एकता का नारा देकर असल मुद्दों को ढकने की कोशिश की। उनका इकोसिस्टम भी इसी दिशा में काम करता रहा—हिंदू-मुस्लिम एकता की चुनिंदा कहानियों को इतना बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया जाता है, जैसे हिंदू समाज सिर्फ अगड़े-पिछड़े की लड़ाई में उलझा हो, लेकिन मुसलमानों से भाईचारा निभा रहा हो।
सवाल यह है— कोई समाज जब खुद अपने भीतर एकजुट नहीं होता, तो दूसरे के साथ एकता का दावा कैसे कर सकता है? देश में लाखों ऐसी अनकही कहानियां हैं जहां अगड़े-पिछड़े का भेद मिटाकर लोग एक-दूसरे के साथ खड़े हुए, लेकिन मीडिया और राजनीतिक हलकों ने उन्हें कभी प्रमुखता नहीं दी।
वामपंथी विचारधारा में जाति का जहर बचपन से ही पिलाया जाता है। इसलिए कई प्रगतिशील दिखने वाले लोग प्रेम-विवाह तो करते हैं, लेकिन लड़की अपनी ही जाति की चुनते हैं। जैसे अजीत अंजुम सिंह और अविनाश पांडेय अनार्य वहीं, संजीव और कवयित्री स्वाति तिवारी जैसे असंख्य जोड़े बिना किसी लेबल के, सिर्फ हिंदू होने के नाते एक-दूसरे से बंधे। उन्होंने अंतरजातीय विवाह नहीं किया—क्योंकि उसमें जाति का ढांचा बरकरार रह जाता है—बल्कि हिंदू होकर हिंदू से विवाह किया, जहां जाति गौण हो जाती है।
हाल ही में राजस्थान के सीकर में एक ऐसी घटना हुई जिसने छुआछूत को सीधा चुनौती दी। सवर्ण और अनुसूचित जाति के लोगों ने मिलकर सामूहिक भोजन का आयोजन किया। यह सिर्फ भोजन नहीं था—यह जातिगत भेदभाव पर एक तगड़ा थप्पड़ था। जब राज्य के कुछ हिस्सों में जातीय तनाव की खबरें आ रही थीं, तब सीकर के इस प्रयास ने दिखाया कि दोनों समुदाय सम्मान और सहयोग के साथ साथ बैठ सकते हैं। लोगों ने इसे ‘हिंदुत्व का असली मर्म’ करार दिया, क्योंकि यहां मदद और आदर दोनों तरफ से था।
एक और दिल छू लेने वाली घटना राजस्थान के पाली जिले से जुड़ी है, जहां सुकड़ी नदी के तेज बहाव में फंसे सात लोगों (चार महिलाएं, एक बच्चा और दो पुरुष) को मेघवाल समाज (अनुसूचित जाति) के तीन युवकों—मदन मेघवाल, बबलू मेघवाल और प्रकाश मेघवाल—ने अपनी जान जोखिम में डालकर बचाया। उन्होंने नदी में छलांग लगाई और सभी को सुरक्षित बाहर निकाला। यहां जाति का कोई विचार नहीं था—सिर्फ इंसानियत थी। बहुजन समाज ने सवर्ण समुदाय के लिए हाथ बढ़ाया और साबित किया कि मुश्किल में इंसान इंसान के काम आता है।
ऐसी घटनाएं स्पष्ट संदेश देती हैं कि समाज में हिंदू-मुस्लिम विभाजन फैलाने वाले तत्वों के बावजूद, जमीनी स्तर पर सवर्ण और बहुजन एक-दूसरे के दुख-दर्द में शामिल होते हैं—चाहे वह शादी में सहयोग हो, आपदा में बचाव हो या सामूहिक भोज में साथ बैठना हो। यही सच्ची सामाजिक समरसता है, जो धीरे-धीरे मजबूत हो रही है।
ऐसे प्रयासों को समाज में और बढ़ावा मिलना चाहिए। जब तक हिंदू समाज अपने भीतर एकजुट नहीं होगा, तब तक हिंदू-मुस्लिम एकता की बातें सिर्फ धोखे का जाल बुनती रहेंगी। पहले अपना घर मजबूत बनाइए, अपनी एकता को अटूट कीजिए—तभी सच्ची दोस्ती और भाईचारे का हाथ आगे बढ़ सकता है।
यही वह राह है जो समाज को वास्तविक सद्भाव की ओर ले जाएगी।



