जातीय उन्माद का चश्मा हटाकर भी देखिए

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रंगनाथ सिंह

बनारस। कुछ घनघोर जातिवादी लोगों को लग रहा है कि भारत के कॉलेजों में यूजीसी द्वारा कास्ट विजलांटे ग्रुप तैयार करने से उनकी जाति का झण्डा लहराने लगेगा! कुछ लोग ऐसा भी सोच रहे हैं कि ऐसे आरोप केवल सवर्णों पर लगेंगे! क्योंकि मोदी सरकार ने डिफाल्ट रूप से मान लिया है कि जनरल वर्ग (जीसी) जातियों के संग भेदभाव नहीं हो सकता वो अजर-अमर हैं भले ही सरकारी जेएनयू से लेकर प्राइवेट असोका यूनिवर्सिटी तक में ब्राह्मण-बनिया को जूते मारने और देश से निकालने वाले छात्र पढ़ते हों। मोदी जी को उनकी चिन्ता भला क्यों हो! वो वोटबैंक थोड़े ही हैं।

एनसीआरबी के डेटा के अनुसार एससी-एसटी एक्ट के मामलों में ओबीसी कही जाने वाली जातियाँ ज्यादा आरोपी हैं। यह प्रतिशत उनकी आबादी से ज्यादा है। बहुत से मोटी बुद्धि लोगों को इतनी सी बात नहीं समझ आ रही है कि जब किसी परिसर में छात्रों के बीच मनमुटाव में कास्ट एंगल को कानूनी तरजीह दी जाने लगेगी तो केवल सवर्ण छात्रों पर आरोप नहीं लगेगा बल्कि एससी ओबीसी पर भी ऐसा आरोप लगाएगा।

नए प्रावधान को जहाँ तक मैंने पढ़ा है ओबीसी भी अब एससी-एसटी पर ऐसा आरोप लगा सकता है! क्योंकि प्रावधान में यह नहीं कहा गया है कि एससी और एसटी पर ऐसा आरोप नहीं लगाया जा सकता। सरकार की नजर में केवल जीसी जातियों को जातिगत भेदभाव को मोदी जी का फरमान समझकर स्वीकार करना होगा। इस प्रावधान में यह भी स्पष्ट नहीं है कि “ब्राह्मण की बेटी” के लिए उन्मादी समूहों से इन बेटियों को बचाने के लिए क्या उपचार है। आईएएस अफसर तक ब्राह्मण की बेटी को ‘वार बाउंटी’ की तरह ट्रीट करते नजर आ चुके हैं।
चूँकि मोदी सरकार ने झूठे आरोप लगाने पर शिकायत-कर्ता पर कार्रवाई करने का विकल्प हटा दिया है तो फिर बेखौफ इसका दुरुपयोग किया जा सकता है। छात्र ही नहीं टीचरों की आपसी राजनीति में भी इसके दुरुपयोग की जमीन तैयार हो चुकी है।

मुझे लगता है कि जिस तरह कांग्रेसी सरकारों ने यूनिवर्सिटों-कॉलेजों को मुसलमान घोषित किया उसी तरह आगे जाकर मोदी सरकार उन्हें एससी-एसटी और ओबीसी ने घोषित कर सकती है! कुछ लोगों को यह दूर की कौड़ी लगेगी मगर 2005 में शायद ही किसी ने सोचा होगा कि 60-70 प्रतिशत मुस्लिम टीचर और छात्र वाली जामिया मिल्लिया इस्लामिया को 2011 में मुसलमान घोषत कर दिया जाएगा!

भारत विभाजन से पहले विभिन्न समुदायों ने अपने समाज में शिक्षा का विकास करने के लिए कॉलेज यूनिवर्सिटी बनाए क्योंकि तब देश में ब्रिटिश सरकार थी। मगर भारत के संविधान निर्माताओं ने कभी नहीं सोचा होगा कि भारत की सेकुलर सरकार यूनिवर्सिटियों को मुसलमान घोषित करेगी। उसी तरह आज लोगों को अजीब लगेगा मगर आगे जाकर कोई जातिवाद-विरोधी सरकार यूनिवर्सिटियों को दलित या पिछड़ा या अगड़ा घोषित करने लगे तो मुझे हैरत नहीं होगी।

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