जिन ब्राह्मणों ने भारत को भारत बनाए रखने के लिए अपना सर्वस्‍व होम कर दिया, उनसे इतनी नफरत!

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– डॉ. मयंक चतुर्वेदी

भोपाल । भारत की पहचान एक जीवंत, बहुलतावादी और हजारों वर्षों से विकसित होती आई सांस्कृतिक धारा के रूप में रही है। इस दीर्घ यात्रा में अनेक समुदायों, जातियों, विचारधाराओं और परंपराओं ने अपना विशिष्‍ट योगदान दिया है। इन्हीं में ब्राह्मण समुदाय का स्थान भी उल्लेखित है, खासकर ज्ञान-संरक्षण, वैदिक परंपरा, दर्शन, शिक्षा और सांस्कृतिक संरचनाओं के विकास में उनके समर्पण की कोई भी बराबरी नहीं कर सकता है। वस्‍तुत: कल भी यही स्‍थ‍िति रही, देवयोग से आज भी यही हाल है। किन्तु विडंबना यह है कि जिस समुदाय ने भारत की बौद्धिक और आध्यात्मिक नींव को संरक्षित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, आज उसी के प्रति कई क्षेत्रों में विरोध, दूरी और राजनीतिक उपेक्षा का भाव देखने को मिलता है।

भारतीय सभ्यता में ब्राह्मण

जैसा कि हम सभी जातने हैं कि भारतीय सभ्यता का विकास बहुस्तरीय और बहुसांस्कृतिक प्रक्रिया का परिणाम है। इसमें ब्राह्मणों का योगदान मुख्यतः ज्ञान और परंपरा के संरक्षण में रहा। वैदिक साहित्य में ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद के संकलन, संरक्षण और मौखिक परंपरा के माध्यम से पीढ़ी-दर-पीढ़ी हस्तांतरण का कार्य अत्यंत जटिल और अनुशासित है, जिसे ये ब्राह्मण आज भी अपना उत्‍तरदायित्‍व मानकर करते आ रहे हैं। ब्राह्मण ग्रंथ, आरण्यक और उपनिषद कर्मकाण्ड की व्याख्या तो करते ही हैं, वे हर युग की बौद्धिक चेतना के दर्पण भी हैं। उपनिषदों के माध्यम से आत्मा, ब्रह्म, कर्म और मोक्ष जैसे गूढ़ दार्शनिक सिद्धांत विकसित हुए, जिनका प्रभाव भारत के हर कोने पर पड़ा ही है साथ में कहें कि विश्व दर्शन पर भी पड़ा। भगवद्गीता जैसे ग्रंथ आज भी जीवन के नैतिक और दार्शनिक प्रश्नों का समाधान प्रस्तुत करते हैं।

इसी तरह से प्राचीन भारत की गुरुकुल व्यवस्था, जो आज भी आदर्श शिक्षा प्रणाली के रूप में देखी जाती है, मुख्यतः ब्राह्मणों द्वारा संचालित रहती आई है। इस व्यवस्था में केवल धार्मिक शिक्षा ही नहीं, बल्कि गणित, खगोलशास्त्र, आयुर्वेद, व्याकरण, राजनीति और शिल्पकला जैसे विषयों का भी अध्ययन कराया जाता था। वस्‍तुत: संस्कृत भाषा का विकास और संरक्षण भी इसी समुदाय के माध्यम से हुआ। व्याकरणाचार्य पाणिनि जैसे विद्वानों ने भाषा को वैज्ञानिक स्वरूप दिया। महाकाव्य रामायण और महाभारत के माध्यम से भारतीय समाज को नैतिकता, कर्तव्य और धर्म का बोध कराया गया।यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि भारत को “ज्ञान-प्रधान सभ्यता” बनाने में ब्राह्मणों की केंद्रीय भूमिका रही है।

धार्मिक और सामाजिक संरचना में भूमिका

ब्राह्मणों ने यज्ञ, संस्कार और अनुष्ठानों के माध्यम से भारतीय समाज को एक संरचित रूप प्रदान किया। विवाह, नामकरण, उपनयन जैसे संस्कारों ने सामाजिक जीवन को एक निश्चित दिशा दी। अत: इन सभी कारणों से इतना तो स्पष्ट होता ही है कि भारतीय सभ्यता का विकास हर दिशा में ब्राह्मणों के द्वारा प्रर्याप्‍त स्‍तर पर किया गया और जा रहा है। लेकिन हाल में हो रहे चुनावों ने जिस तरह से ब्राह्मणों को हाशिए पर डाला है, वह आज अनेक प्रश्‍न खड़े करता है।

तमिलनाडु की राजनीति: एक नया परिदृश्य

तमिलनाडु में ब्राह्मण समुदाय, जोकि कभी प्रशासन और राजनीति में प्रभावशाली था, आज लगभग पूरी तरह हाशिए पर चला गया है। 2026 के विधानसभा चुनावों में प्रमुख राजनीतिक दलों द्वारा एक भी ब्राह्मण उम्मीदवार को टिकट न देना इस बदलाव का स्पष्ट संकेत है। जबकि कहना होगा कि आज तमिलनाडु की राजनीति में जातीय समीकरण अत्यंत महत्वपूर्ण हो गए हैं। सबसे अधिक आश्‍चर्य तो यह देखकर होता है कि वे दल भी, जिन्हें पारंपरिक रूप से उनका समर्थक माना जाता है, आज यहां उनसे दूरी बनाते दिखे हैं। वास्‍तव में इसी को कहते हैं एक खास नैरेटिव को स्‍थापित कर देना।

क्या यह एक चेतावनी है?

तमिलनाडु का यह मॉडल भारत के अन्य राज्यों के लिए एक महत्वपूर्ण संकेत भी हो सकता है। कोई बड़ी बात नहीं कि ये प्रयोग अन्‍य राज्‍यों में भी हो, ब्राह्मण विहीन राजनीति, क्‍योंकि इनके अनुसार वह तो शोषणकर्ता है। लगता है अब किसी को विकास, योग्यता और नीति जैसे मुद्दों की आवश्‍यकता नहीं रही है, इसलिए देश से योग्‍यता विदेश में पलायन कर रही है। आश्‍चर्य यह भी देखकर होता है कि जो पलायन कर दूसरे देश की अर्थव्‍यवस्‍था को ऊपर पहुंचा रहे हैं, अक्‍सर उनको ही कहा जाता है कि अरे, आप भारतवंशी हैं, भारत के विकास में योगदान दें, निवेश के लिए भारत आएं!

निश्‍चित ही कहना होगा कि यह लोकतंत्र के लिए एक बड़ी चुनौती है, क्योंकि किसी भी समुदाय का पूर्ण राजनीतिक बहिष्कार दीर्घकाल में सामाजिक संतुलन को प्रभावित करे बिना नहीं रहनेवाला है। कई बार कहा जाता है कि ब्राह्णों ने शोषण किया, किंतु कई ब्राह्ण परिवार हैं जिन्‍होंने सभी समाज बन्‍धुओं को आगे ही बढ़ाया है। अब जब उनके बच्‍चे पूछते हैं कि जब मेरे परिवार ने कभी शोषण नहीं किया और मैंने भी किसी का शोषण नहीं किया, तब जाति के आधार पर या ब्राह्मण होने के कारण मुझे किस बात की सजा दी जा रही है? किंतु ऐसे प्रश्‍नों पर उसे चुप रहने के लिए बोल दिया जाता है, ज्‍यादा मुखर हो तो उसके मुंह पर ही पट्टी बांधने तक का प्रयास होता है।

ध्‍यान रहे, यह स्पष्ट है कि ब्राह्मणों ने भारत की सभ्यता और संस्कृति के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है, फिर भी भारत का स्‍वाधीनता आन्‍दोलन हो, इससे पूर्व राजा-महाराजाओं का काल रहा हो या वर्तमान भारत का समय ही क्‍यों न हो, विशेष रूप से ज्ञान, दर्शन और परंपरा के क्षेत्र में आज भी उनका कोई मुकाबला नहीं है। हालांकि यह सच है कि भारत का निर्माण सामूहिक ऐतिहासिक प्रक्रिया का परिणाम है, जिसमें से कोई भी ब्राह्मणों के योगदान को कितना भी नकारना चाहे, वह नकार नहीं सकता है।

अतः भारत को “भारत” बनाए रखने का मार्ग यही है, जिसमें सभी समुदायों को समान सम्मान, अवसर और प्रतिनिधित्व मिले, क्योंकि यही इस सभ्यता की सबसे बड़ी विशेषता और शक्ति है। आज यदि नफरत सिर्फ ब्राह्मण के साथ की जाएगी तो समय का चक्र ऐसा न हो कि फिर घूम जाए, फिर नफरत का तो कोई अंत नहीं है, अच्‍छा हो कि इस बात को सभी राजनीतिक पार्टियां समझें, निश्‍चित ही इसी में समग्रता से भारत का हित है और अपने राष्‍ट्र का सर्वांगीण विकास है।

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