अखिलेश चौधरी
दिल्ली । मकर संक्रांति आज के शहरी जीवन में केवल पतंगबाजी, सोशल मीडिया पोस्ट और बाज़ार की गूँज तक सिमट गई है। लेकिन ग्रामीण भारत की स्मृतियों में झाँकें, तो यह पर्व समाज-निर्माण का एक वार्षिक महायज्ञ हुआ करता था। संक्रांति केवल एक दिन का त्यौहार नहीं, बल्कि पूरे गाँव की सामूहिक चेतना का उत्सवकाल थी। यह वह समय था जब व्यक्ति, समाज, प्रकृति और राष्ट्र—चारों को एक ही संस्कार-सूत्र में बाँधा जाता था।
🌑 *मकर संक्रांति: क्या, कब और क्यों?* (खगोलीय एवं आध्यात्मिक आधार)
भारतीय संस्कृति में किसी भी पर्व का आधार केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि गहरा विज्ञान होता है। मकर संक्रांति वह खगोलीय क्षण है जब सूर्य धनु राशि से निकलकर *मकर राशि* में प्रवेश करता है। इसी के साथ सूर्य की यात्रा ‘दक्षिणायन’ (अंधकार की ओर) समाप्त होकर *’उत्तरायण’* (प्रकाश की ओर) शुरू होती है।
भारत के विभिन्न कोनों में इसे अलग-अलग नामों से पुकारा जाता है, जो इसकी व्यापकता को दर्शाता है। *बिहार के मिथिलांचल में इसे ‘तिला-संक्रांति’* कहा जाता है, तो *बिहार और उत्तर प्रदेश (पूर्वांचल) के अन्य हिस्सों में इसे लोकभाषा में ‘खिचड़ी’* ही कह दिया जाता है। *पंजाब में इसे ‘लोहड़ी’* के रूप में अग्नि को समर्पित किया जाता है, तो *महाराष्ट्र में ‘तिल-गुल’* कहकर मिठास बाँटी जाती है। दक्षिण में इसे *’पोंगल’* तो असम में *’बिहू’* के नाम से नई फसल का स्वागत माना जाता है।
आध्यात्मिक दृष्टि से उत्तरायण को ‘देवताओं का दिन’ कहा जाता है। महाभारत काल में भीष्म पितामह ने स्वेच्छा से अपना शरीर त्यागने के लिए इसी पुण्य काल की प्रतीक्षा की थी, क्योंकि यह समय मोक्ष और चेतना के ऊर्ध्वगमन का प्रतीक है।
❄️ *कड़कड़ाती ठंड और सामूहिक उत्साह की ऊष्मा*
पौष मास की वह ठिठुरन, जहाँ हाथ-पाँव सुन्न हो जाते थे, वहाँ भी गाँव का उत्साह कभी ठंडा नहीं पड़ा। संक्रांति की तैयारियाँ हफ़्तों पहले शुरू हो जाती थीं। घर-घर में मिट्टी के बड़े बर्तनों में दही जमाया जाता था। माँ, दादी, चाची और बुआ मिलकर चूड़ा, मुरही (परमल) और तिल को साफ करतीं और गुड़ की चाशनी की खुशबू पूरे घर में महकने लगती।
इस उत्सव का एक अनिवार्य हिस्सा था *“बाँझ डाल” की खोज*। गाँव के युवा आम के बगीचों में घूमकर ऐसी टहनियों को चिह्नित करते थे जिनमें फल नहीं आते थे। धूनी जलाने के लिए केवल वही डाल काटी जाती थी जो अनुपयोगी हो। फलदार शाखा को छूना भी वर्जित था, क्योंकि वह केवल लकड़ी नहीं, बल्कि धरती की उर्वर कोख थी। यहाँ पर्यावरण संरक्षण कोई लिखित कानून नहीं, बल्कि संस्कार के रूप में रचा-बसा धर्म था।
🌞 *“जितनी डुबकी, उतना लाई” : आत्मशुद्धि का जीवन दर्शन*
संक्रांति की भोर में जब गाँव की पवित्र नदियों, तालाबों या कुएँ पर भीड़ उमड़ती थी, तो बुजुर्ग बच्चों को एक ही मंत्र देते थे: *“जितनी डुबकी, उतना लाई मिलेगा।”* यह वाक्य केवल बच्चों का मन बहलाने के लिए नहीं था, बल्कि इसके पीछे एक गहरा जीवन-दर्शन था। ‘डुबकी’ का अर्थ था – आलस्य, प्रमाद और अहंकार को धोना। पुराने वर्ष के दोषों को विसर्जित कर नए संकल्पों के साथ आगे बढ़ना। ‘लाई’ उस साधना के फल का प्रतीक थी। यह संदेश दिया जाता था कि जो व्यक्ति स्वयं को जितना तपाएगा (डुबकी लगाएगा), वह समाज की मिठास (लाई) का उतना ही बड़ा अधिकारी होगा।
🔥 *धूनी : सामाजिक चेतना की अखंड अग्नि*
स्नान के बाद गाँव के सामूहिक चौक पर जलाई गई ‘धूनी’ केवल शरीर तपाने का साधन नहीं थी, बल्कि वह समाज की आत्मा की अग्नि थी। धूनी के चारों ओर पूरा गाँव इकट्ठा होता था – जहाँ पीढ़ियों का अनूठा संगम होता। बच्चे वहाँ बड़ों से संस्कार और मर्यादा सीखते, बुजुर्ग अनुभवों की पोटली खोलते और युवा अपने सामाजिक उत्तरदायित्वों को समझते। यह धूनी ‘अखंड भारत’ के एक लघु प्रतिरूप जैसी थी, जहाँ जाति और वर्ग के भेद आग में जलकर भस्म हो जाते थे।
🍘 *संगठन का शास्त्र और “खिचड़ी के चार यार”*
लाई (चूड़ा-गुड़, तिल-गुड़) और खिचड़ी केवल भोजन नहीं, सामाजिक संगठन के अद्भुत शास्त्र हैं। तिल अकेला हो तो बिखरा हुआ होता है, लेकिन जब वह गुड़ की आत्मीयता के साथ जुड़ता है, तो एक शक्तिशाली लड्डू बन जाता है। यही राष्ट्र निर्माण का सूत्र है।
खिचड़ी के संदर्भ में ग्रामीण इलाकों में एक प्रसिद्ध कहावत है—
*“खिचड़ी के चार यार : दही, पापड़, घी और अचार।”* यह कहावत केवल स्वाद के लिए नहीं है, बल्कि यह जीवन में *’सहयोग’* और *’पूरकता’* का दर्शन है। खिचड़ी सिखाती है कि अलग-अलग अस्तित्व (चावल, दाल, मसाले) होने के बावजूद जब सब एक साथ मिलते हैं, तो एक ‘पूर्ण आहार’ बनते हैं। जैसे खिचड़ी इन चार सहयोगियों (दही, पापड़, घी, अचार) के बिना अधूरी है, वैसे ही एक सशक्त समाज भी हर वर्ग के सहयोग के बिना अधूरा है। स्वास्थ्य की दृष्टि से भी, यह संतुलित आहार शीत ऋतु में शरीर को आवश्यक ऊर्जा और संतुलन प्रदान करता है।
🏡 *“तिलकूट भरोगे न?” आत्मीयता की दीक्षा*
संक्रांति का सबसे भावुक क्षण वह होता था जब घर की ज्येष्ठ महिलाएँ तिल-गुड़ लेकर बच्चों के पास आतीं और तीन बार पूछतीं -“तिलकूट भरोगे न?” यह एक प्रकार की सांस्कृतिक दीक्षा थी। जैसे ही बच्चा विनम्रतापूर्वक “हाँ” कहता, उसकी हथेली मिठास से भर दी जाती। यह सिखाता था कि जीवन में प्रेम और सम्मान अधिकार से नहीं, बल्कि ‘विनम्र स्वीकृति’ और ‘आत्मीयता’ से प्राप्त होता है।
🌾 *पशु-धन, दान और पितृ-तर्पण*
ग्राम्य भारत में यह पर्व *’कृतज्ञता’* का महापर्व था। खेती की रीढ़ कहे जाने वाले गायों और बैलों को तिलक लगाकर उन्हें विशेष खिचड़ी खिलाई जाती थी। घर की देहरी पर आए हर जरूरतमंद को ‘सिद्धा’ (कच्चा अन्न) दान करना यह सुनिश्चित करता था कि उत्तरायण के प्रकाश में समाज का कोई भी कोना भूखा न रहे। इस दिन पूर्वजों को याद करना और उनके नाम पर तर्पण करना हमें हमारी जड़ों से जोड़ता था।
🌳 *जड़ों की ओर वापसी का संकल्प*
आज जब समाज व्यक्तिवाद के अंधेरे में खो रहा है, हमें फिर से उसी धूनी, उसी डुबकी और उसी ‘तिला-संक्रांति’ के मर्म को समझने की जरूरत है। मकर संक्रांति हमें सिखाती है कि:
• *सूर्य* की तरह परोपकारी बनें।
• *गुड़* की तरह अपनी वाणी में मधुरता लाएं।
• *तिल* की तरह संगठित होकर राष्ट्र की शक्ति बनें।
• खिचड़ी की तरह समरस होकर समाज को एक करें।
जो समाज को जोड़ना जानता है, वही वास्तव में राष्ट्र बनाना जानता है। आइए, इस मकर संक्रांति पर हम अपनी जड़ों की ओर लौटने का संकल्प लें और भारत को पुनः सांस्कृतिक वैभव के शिखर पर प्रतिष्ठित करें।
लोकाः समस्ताः सुखिनो भवन्तु।
भारत माता की जय।
शुभ मकर संक्रांति।



