अस्सी के दशक में भारत के एक छोटे शहर के चर्च में फादर जॉन (काल्पनिक नाम) रहते थे। उनका जीवन त्याग और तप का जीता-जागता उदाहरण था। सुबह चार बजे उठते, प्रार्थना करते, फिर पूरे दिन समाज सेवा में जुट जाते। चर्च के दरवाजे चौबीसों घंटे खुले रहते। कोई भी आ सकता था-भूखा, बीमार, परेशान। रात के दो बजे भी कोई दस्तक देता, तो फादर खुद उठकर दरवाजा खोलते। चाय बनाते, रोटी परोसते, बात सुनते। उनके हाथों में कभी बीमार की देखभाल, कभी अनपढ़ बच्चे को पढ़ाने की स्लेट।
चर्च के नीचे चलने वाले अस्पताल और स्कूल गरीबों के लिए वरदान थे। नर्सें, डॉक्टर, टीचर-सब फादर की सादगी से प्रेरित। आम हिंदू परिवार बिना किसी हिचकिचाहट के वहां इलाज करवाते, बच्चे पढ़ाते। चर्च की इमारत देखकर किसी को अजीब नहीं लगता था। क्योंकि सामने था त्याग का जीता उदाहरण। लोग कहते, फादर ने अपना जीवन ईश्वर और समाज को सौंप दिया। गांव-गांव घूमकर दवा बांटी, स्कूल खोले, अनाथों को सहारा दिया। कई परिवारों ने कहा-हमारे घर में रोशनी आई। कुछ ने फैसला किया कि वे भी इसी रास्ते पर चलेंगे, इसी विश्वास को अपनाएंगे। संख्या बढ़ी। विदेश से मदद आने लगी-पहले थोड़ी, फिर भरपूर।
फादर ने कहा, यह धन सेवा के लिए है, और औरों तक संदेश पहुंचाने के लिए भी। बड़े प्रोजेक्ट शुरू हुए। लेकिन 2000 के आसपास आते-आते चीजें बदल गईं। फादर जैसे पादरियों का जीवन अब सादगी से दूर हो चुका था। चर्च की इमारतें अब भव्य महलों जैसी-करोड़ों की लागत से बनीं, चमचमातीं। पहले जहां कोई भी सीधे फादर के कमरे तक पहुंच जाता था, अब चौकीदार बैठे। नाम-पता लिखवाओ, समय लो। दिन में भी घंटों इंतजार। रात का कोई सवाल नहीं। फादर अब व्यस्त-मीटिंग्स, बड़े लोगों से बातें, सरकारी अफसरों के साथ चर्चा।
उनकी बात अब सरकार तक पहुंचती। सरकारी फैसलों में सलाह, कुछ जगह हस्तक्षेप। चर्च को लगता-हम सत्ता के करीब हैं, हमारा प्रभाव है। अस्पतालों में पहले जैसा अपनत्व नहीं रहा। स्कूलों में फीस बढ़ी, गरीब बच्चे कम आने लगे। लेकिन इमारतें और गाड़ियां लग्जरी वाली बढ़ती गईं। फादर अब मंचों पर खड़े होकर बोलते-राष्ट्र की एकता, संस्कृति की रक्षा, समाज में नैतिक मूल्यों की स्थापना। लोग सुनते, तालियां बजाते। लेकिन पुराने लोग चुपचाप याद करते-वो फादर जो रात को भी दरवाजा खोलकर खड़े रहते थे, वो कहां गए?
धीरे-धीरे समाज में चर्चा फैली। जो ताकत आम आदमी के दम पर बनी थी, वही अब आम आदमी से कट गई। पहले जो सेवा और त्याग की मिसाल था, अब वही रसूख और पहुंच की मिसाल बन गया। जब कोई संस्था जनता के बीच से निकलकर शीर्ष पर पहुंचती है और फिर जनता को ही भूल जाती है, तो उसका पतन शुरू हो जाता है।
फादर जॉन अब बड़े कमरे में बैठे हैं। एसी चल रहा है। बाहर चौकीदार है। अंदर फाइलें, फोन, मीटिंग्स। बाहर जो लोग इंतजार कर रहे हैं, उनमें कई वही हैं जिनके लिए कभी रात-दिन एक कर देते थे। अब वे सिर्फ नाम लिखवा रहे हैं। शायद कभी उनकी बारी आए। शायद नहीं।
यह कहानी सिर्फ एक पादरी या एक चर्च की नहीं। यह हर उस संगठन की कहानी है जो जनता के बीच से ताकत बनाता है, फिर सत्ता के नशे में जनता से दूर हो जाता है। जब सेवा खत्म होती है, मूल से कटाव आता है, तो असली शक्ति भी कमजोर पड़ने लगती है। और नीचे गिरने का रास्ता शुरू हो चुका होता है-चाहे वह कोई भी दौर क्यों न हो।



