राजीव मिश्रा
दिल्ली । दोबारा. इस बार बच्चों के साथ.
बच्चे हिन्दी फिल्में बर्दाश्त नहीं कर पाते. मुझे भी गले से मुश्किल से ही उतरती हैं, पर बच्चे बिल्कुल बर्दाश्त नहीं कर पाते. लेकिन पहले घर पर प्रोजेक्टर पर लगा कर साढ़े तीन घंटे धुरंधर-1 देखी, फिर उठकर पार्ट 2 देखने गए. और खूब पसंद आई, बेटे ने कहा…इंडिया का टेस्ट सुधर रहा है लगता है.
उसके एक दिन पहले मैंने “बारामुला” भी देखी. अभी तक नहीं देखी थी, क्योंकि कुछ खास एक्सपेक्टेशन नहीं थी. फिल्म देख कर सोचा, दस वर्ष पहले कोई सोचता भी था कि ऐसी फिल्में हिंदी में बना करेंगी? पांच वर्ष पहले जब काश्मीर फाइल जैसी फिल्में बननी शुरू हुई थी तो उनकी सिनेमैटिक गुणवत्ता मुश्किल से बर्दाश्त करने लायक थी. तब लगता था कि अनुराग कश्यप या विशाल भारद्वाज जैसे डायरेक्टर हमारे साइड की फिल्में क्यों नहीं बनाते? हमारे बीच कोई अपना भी खड़ा हो सकता है यह ख्याल भी नहीं आता था.
लेकिन यह अंतर अपने आप नहीं आया. आज से दस साल पहले जब मोदी बॉलीवुड के लोगों से मिला करते थे तब लोग सवाल खड़े करते थे और उनके पिछले ट्वीट की स्क्रीनशॉट टांग दिया करते थे कि मोदी सेकुलर हो गए.
लेकिन धीरे धीरे एक एक कर लोग बदलते गए और अपना इकोसिस्टम खड़ा होता दिखाई देने लगा. हमारी कहानी कहती फिल्में बनने लगीं. सिर्फ फिल्में ही नहीं, तीन चौथाई मीडिया अपने पक्ष में खड़ा हो गया. ज्यूडिशियरी से अपने पक्ष में फैसले आने लगे.
आज जो लोग दो इलेक्शन में बंगाल नहीं जीत पाने पर मोदी शाह को कोस रहे हैं उन्हें शायद पता नहीं हो कि अधिक पुरानी बात नहीं है जब किसी को बंगाल जीतने के सपने भी नहीं आते थे. अजी, बंगाल तो छोड़िए.. यूपी में चौथे नंबर की पार्टी हुआ करते थे. तब किस किस ने सोचा था कि एक दिन योगी जैसे मुख्यमंत्री आयेंगे और अतीक अहमद और मुख्तार अंसारी जैसों के माफिया राज से छुटकारा मिलेगा. आसाम में जीत मिलेगी और ऐसा मुख्यमंत्री आयेगा जो घुसपैठ और अलगाववाद को लगाम लगाएगा, नॉर्थ ईस्ट मुख्यधारा से जुडेगा, देश से नक्सलवाद खत्म हो जायेगा.
यह सब हुआ है तो एक एक ईंट जोड़ कर हुआ है. आसानी से और फटाफट कुछ नहीं हो जाता. फटाफट सिर्फ सपने आते हैं, कुर्सी पर बैठे बैठे खयाल आते हैं कि मोदी ने बारह साल बर्बाद कर दिए. लेकिन यह बात समझ में नहीं आती कि मोदी ने हमें बारह साल दिए जिसे हमने बर्बाद कर दिया. मोदी ने बारह साल नहीं बर्बाद किए. मोदी ने बारह साल में जितना करके दिया उतना किसी और ने किसी और बारह साल में नहीं कर के दिया है.
नहीं, हमें तो बैक सीट ड्राइविंग करनी है..सलाह देनी है. अपनी दूरदर्शिता और बुद्धिमता का लाभ मोदी को देना है. लेकिन मेरी दूरदर्शिता तो इतनी है कि यूजीसी पर आग लगा देनी है…मोदी और शाह तुगलक, खिलजी, तैमूर और नादिरशाह से अधिक खतरनाक दिखाई देने लगते है. उनको सबक सिखाने की हुड़क अपने सर्वाइवल से अधिक बड़ा और महत्व का प्रश्न दिखाई देने लगता है. फिर सोचते हैं कि आखिर मेरी इस दूरदृष्टि और बुद्धिमता का लाभ उठाने वाला कोई क्यों नहीं मिलता…



