निलेश देसाई
भोपाल । भारतीय कृषि आज एक ऐसे मोड़ पर है जहाँ उत्पादकता बढ़ाने के दबाव और पर्यावरणीय सुरक्षा के बीच संतुलन बनाना अनिवार्य हो गया है। 1968 के पुराने ‘कीटनाशक अधिनियम’ को प्रतिस्थापित करने के लिए प्रस्तावित ‘कीटनाशक प्रबंधन विधेयक 2025’ (PMB 2025) इसी दिशा में एक बड़ा कदम है। हालांकि, यह विधेयक केवल रसायनों के नियंत्रण तक सीमित नहीं है, बल्कि यह हमारे भविष्य की खेती, बीजों की तकनीक और किसानों की आर्थिक सुरक्षा को भी गहरे स्तर पर प्रभावित करने वाला है। विशेष रूप से जीएम (GM) बीजों का कीटनाशक के रूप में वर्गीकरण और कॉर्पोरेट जवाबदेही जैसे मुद्दे इस बहस के केंद्र में हैं।
जीएम (GM) बीजों पर प्रभाव: एक नई कानूनी परिभाषा
विधेयक की सबसे महत्वपूर्ण और चर्चा वाली बात इसकी व्यापक परिभाषा है। दस्तावेज़ों के अनुसार, “टॉक्सिन-संबंधित जीन संशोधन” (Toxin-related gene modification) को भी इसके दायरे में लाने का प्रस्ताव है। इसका सीधा असर बीटी (Bt) कपास या बीटी बैंगन जैसी फसलों पर पड़ेगा।
1. कीटनाशक के रूप में वर्गीकरण: वर्तमान में, जीएम बीजों को मुख्य रूप से ‘पर्यावरण संरक्षण अधिनियम’ और बीज नियमों के तहत विनियमित किया जाता है। लेकिन PMB 2025 के तहत, यदि कोई बीज स्वयं कीटों से लड़ने वाला ‘जहर’ (Toxin) पैदा करता है, तो उसे एक ‘कीटनाशक उपकरण’ या स्वयं कीटनाशक के रूप में माना जा सकता है। इसका मतलब यह है कि बीज कंपनियों को अब न केवल बीज मानकों का पालन करना होगा, बल्कि कीटनाशक पंजीकरण समिति (Registration Committee) से भी कड़े सुरक्षा प्रमाणपत्र लेने होंगे।
2. जवाबदेही और नियामक जांच: यदि किसी जीएम फसल के कीटनाशकीय गुणों के कारण मिट्टी के मित्र कीटों (जैसे केंचुए या मधुमक्खियां) को नुकसान पहुँचता है या मनुष्यों के स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है, तो कंपनी को सीधे तौर पर जिम्मेदार ठहराया जा सकेगा। यह ‘कॉर्पोरेट लायबिलिटी’ (Corporate Liability) के सिद्धांत को मजबूत करता है, जहाँ अब कंपनियां केवल यह कहकर नहीं बच सकतीं कि उन्होंने केवल बीज बेचा है।
किसान हित: मूल्य नियंत्रण और आर्थिक सुरक्षा
भारत में छोटे और सीमांत किसानों के लिए खेती की लागत का एक बड़ा हिस्सा कीटनाशकों और उर्वरकों पर खर्च होता है। विधेयक में ‘मूल्य नियंत्रण’ (Price Regulation) को शामिल करने की मांग किसानों के अस्तित्व से जुड़ी है।
कीटनाशक जहर राहत कोष: मानवीय संवेदना और न्याय
खेती के दौरान कीटनाशकों के संपर्क में आने से हर साल हजारों किसान और मजदूर बीमार होते हैं या अपनी जान गंवा देते हैं। प्रस्तावित धारा 44A के तहत एक ‘कीटनाशक जहर राहत कोष’ (Pesticide Poisoning Relief Fund) बनाने का सुझाव दिया गया है।
पारदर्शिता और सार्वजनिक परामर्श
विधेयक में सबसे बड़ी कमी पारदर्शिता की मानी गई है। वर्तमान में, कीटनाशकों के पंजीकरण की प्रक्रिया बंद कमरों में होती है, जहाँ केवल सरकारी अधिकारी और कंपनी के प्रतिनिधि होते हैं।
पर्यावरण-मित्र खेती की ओर कदम
विधेयक का एक मुख्य उद्देश्य “पर्यावरण-मित्र” (Paryamitra) कृषि को बढ़ावा देना होना चाहिए। इसके लिए सुझाव दिया गया है कि:
अंततःकीटनाशक प्रबंधन विधेयक 2025 भारत की खाद्य सुरक्षा और स्वास्थ्य सुरक्षा के बीच एक सेतु बन सकता है। जीएम बीजों की सख्त निगरानी, कीटनाशकों के मूल्यों पर लगाम, और पीड़ितों के लिए तत्काल राहत कोष जैसे प्रावधान इस कानून को वास्तव में ‘किसान-हितैषी’ बनाएंगे। संसद को चाहिए कि वह प्रस्तावित 54 संशोधनों पर गंभीरता से विचार करे ताकि यह विधेयक केवल कागजों पर न रहे, बल्कि खेतों में हरियाली और किसान के जीवन में खुशहाली सुनिश्चित करे। यदि हम आज एक पारदर्शी और जवाबदेह ढांचा तैयार नहीं करते, तो भविष्य की पीढ़ियों को जहरीली मिट्टी और असुरक्षित भोजन विरासत में मिलेगा।



