कोई सुनता क्यों नहीं ट्रंप चचे की!!

donald-trump_large_1133_23.webp

दिल्ली । क्यों ठंडा पड़ गया वो जोश? जो डोनाल्ड ट्रंप 24 घंटे में अमन का वादा करता था, उसके पास दूसरे साल में अल्फ़ाज़ क्यों कम पड़ गए? क्या शोर-शराबा ही नीति था, अकड़ को ही कूटनीति समझ लिया गया, या बिना नक़्शे की तोड़-फोड़ ही सब कुछ थी? और सबसे बड़ा सवाल, क्या दुनिया अब प्रभावित होना बंद कर चुकी है?

जनवरी 2026 की सुबह में, दुनिया का स्कोरबोर्ड कुछ और ही कहानी सुना रहा है। ट्रंप का दूसरा कार्यकाल टी-20 की पारी जैसा शुरू हुआ, चौके-छक्के, तालियाँ, विरोधियों में खलबली। 2025 की शुरुआत में ट्रंप ऐसे उभरे जैसे हर झगड़े के मसीहा हों। भारत-पाक तनाव, पश्चिम एशिया, थाईलैंड-कंबोडिया सीमा, यहाँ तक कि यूक्रेन-रूस, हर जगह शांति का श्रेय उन्होंने खुद ले लिया। पैग़ाम साफ़ था, सिर्फ़ मैं ही ठीक कर सकता हूँ।
वो हर टकराव में कूद पड़े, कूटनीति की तहज़ीब को किनारे किया, दोस्तों को डाँटा, दुश्मनों को गले लगाया, और खुद को सबसे बड़ा सौदेबाज़ बताया। नर्मी गई, नज़ाकत गई। यह थी सीधी-सादी, लेन-देन वाली राजनीति, नए अमीर की तरह, हर हाथ मिलाने पर दाम चिपका हुआ। “अमेरिका फ़र्स्ट” नारा नहीं, चेतावनी बन गया।

2025 टैरिफ़ के तमाशों का साल बना। ट्रंप ने टैक्स ऐसे लगाए जैसे चालान, दोस्त, दुश्मन, पड़ोसी, सब बराबर। नाम लिए गए, दिल दुखे, रिश्ते बिगड़े। जे.डी. वेंस जैसे वफ़ादार, ट्रंप के साथ ” डॉन किहोते” (Don Quixote) बनकर काल्पनिक पवनचक्कियों पर टूट पड़े, जबकि असली आग कहीं और लगी थी। बयानबाज़ी बढ़ी, ज़ुबान फिसली, और ग़लतियाँ जमा होती गईं। तब तक ट्रंप बेपरवाह रहे, जब तक रन बनना बंद नहीं हो गया।
2025 के आख़िरी महीनों में फुसफुसाहट तेज़ हुई। क्या ट्रंप ठीक हैं? ग़ाज़ा जल रहा है, यूक्रेन खून बहा रहा है, और ट्रंप वेनेज़ुएला पर तंज कस रहे हैं, ये कैसी राजनीति है? नोबेल शांति पुरस्कार का सपना कहाँ गया? जो बल्लेबाज़ कभी हर गेंद को सीमा के पार भेजता था, अब वही क्रीज़ पर अटका, डरा-डरा सा खेल रहा है।

रणनीतिक जानकार कहते हैं कि ट्रंप की उथल-पुथल ने अमेरिका को मज़बूत नहीं, कमज़ोर किया। भरोसा घटा, असर कम हुआ। एकध्रुवीय दुनिया बहुध्रुवीय बन गई। वादा की गई शांति प्रेस नोट बनी रही, नीति नहीं। यूक्रेन सुलगता रहा। ग़ाज़ा रोता रहा। और ट्रंप की सबसे बड़ी भूल? भारत।
कभी नरेंद्र मोदी के साथ दोस्ती पर फ़ख़्र करने वाले ट्रंप ने भारत को बुरी तरह ग़लत पढ़ा। भारतीय डायस्पोरा, जो अमेरिका-भारत रिश्तों की मज़बूत कड़ी है, नाराज़ हो गया, गुस्से में है, समय का इंतेज़ार कर रहा है। वीज़ा की बातें हों या व्यापार की धमकियाँ, सद्भावना उड़ गई। यहाँ तक कि अमेरिकी कंजरवेटिव तबक़ा भी व्हाइट हाउस के किरायेदार की संजीदगी पर सवाल उठाने लगा है। ताक़त के साथ तमीज़ भी चाहिए।

यह सब नया नहीं था। ट्रंप की विदेश नीति का पैटर्न पुराना है, शोरदार एंट्री, चमकदार तस्वीरें, और फिर सन्नाटा। उत्तर कोरिया याद है? किम जोंग उन के साथ ऐतिहासिक मुलाक़ातें, बड़े वादे, और नतीजा? मिसाइल परीक्षण। ईरान? परमाणु समझौता तोड़कर बिना विकल्प के “अधिकतम दबाव”, जिससे हालात और बिगड़े।

चीन के साथ व्यापार युद्ध से उद्योग लौटाने का दावा था। हक़ीक़त में महँगाई बढ़ी, सप्लाई चेन टूटी, नौकरियाँ कम ही बढ़ीं। अफ़ग़ानिस्तान? तालिबान से कमज़ोर सौदे ने उग्रवाद को ताक़त दी। सीरिया? अचानक सेना हटाने से कुर्द साथी असहाय हुए। नाटो को धमकियाँ दी गईं, सुधार नहीं हुए। वेनेज़ुएला में सत्ता बदलने का ख़्वाब टूट गया।

दूसरे कार्यकाल में भी कहानी वही रही। यूक्रेन में शांति वार्ता अटकी रही। ग़ाज़ा में युद्धविराम लागू न हो सका। यमन में हमले हुए, लेकिन समुद्री रास्ते नहीं खुले। ईरान से बातचीत आगे नहीं बढ़ी। पाकिस्तान के फ़ौजी सरदार से खनिज सौदों की नज़दीकी, आम लोगों को दरकिनार कर, अमेरिका के लोकतंत्र उपदेश खोखले हो गए हैं।

क्या ट्रंप ने कुछ सीखा? या उनके पास अब नए ख़याल ही नहीं बचे हैं?
आलोचक कहते हैं, ऊर्जा घट गई है, बुढ़ाय गए हैं, सोच कुंठित है। मगर यह सिर्फ़ ट्रंप की नाकामी नहीं, अमेरिका की थकान भी है। इराक़ के झूठे हथियार, लीबिया की अधूरी जंग, अफ़ग़ानिस्तान से अव्यवस्थित वापसी, पेरिस समझौते से दूरी, कोविड का कुप्रबंधन, 2008 की मंदी, ग्वांतानामो का दाग़, इन सबने भरोसा खोखला किया।

हर ग़लती ने साख कम की। हर विरोधाभास ने असर घटाया। ट्रंप ने गिरावट शुरू नहीं की, उसे तेज़ कर दिया।

अफ़सोस यह कि इससे अमेरिका को भी फ़ायदा नहीं हुआ। एकतरफ़ा फैसलों ने उसे अलग-थलग किया। अस्थिरता ने उसे बेनक़ाब किया। पाखंड ने उसे शर्मिंदा किया। दोस्त संभल गए, विरोधी इंतज़ार करने लगे, और दुनिया आगे बढ़ गई।

ट्रंप की दूसरी पारी अब घमंड का सबक लगती है, आतिशबाज़ी बहुत, दिशा कम। शुरुआत का शोर अब बचाव में बदल गया है। 2026 के साथ एक सवाल हवा में तैर रहा है: क्या डोनाल्ड ट्रंप ने दुनिया बदली है या दुनिया ही उनसे आगे निकल चुकी है?

Share this post

Brij Khandelwal

Brij Khandelwal

Brij Khandelwal of Agra is a well known journalist and environmentalist. Khandelwal became a journalist after his course from the Indian Institute of Mass Communication in New Delhi in 1972. He has worked for various newspapers and agencies including the Times of India. He has also worked with UNI, NPA, Gemini News London, India Abroad, Everyman's Weekly (Indian Express), and India Today. Khandelwal edited Jan Saptahik of Lohia Trust, reporter of George Fernandes's Pratipaksh, correspondent in Agra for Swatantra Bharat, Pioneer, Hindustan Times, and Dainik Bhaskar until 2004). He wrote mostly on developmental subjects and environment and edited Samiksha Bharti, and Newspress Weekly. He has worked in many parts of India.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

scroll to top