कोलकाता : संस्कृति मंत्रालय का स्वायत्त संस्थान इन्दिरा गांधी राष्ट्रीय कला केन्द्र (आईजीएनसीए) कोलकाता में अपने प्रमुख वार्षिक कार्यक्रम ‘नदी उत्सव’ का एक विशेष खंड आयोजित कर रहा है। आईजीएनसीए की नदी संस्कृति परियोजना के अंतर्गत परिकल्पित ‘नदी उत्सव’ एक राष्ट्रीय स्तर पर प्रशंसित पहल है। इसका उद्देश्य भारत की नदियों को जीवंत सांस्कृतिक इकाइयों के रूप में समझना और प्रस्तुत करना है। बीते वर्षों में इस कार्यक्रम के माध्यम से गोदावरी, कृष्णा, गंगा और यमुना जैसी प्रमुख नदियों के तटों पर आयोजित संगोष्ठियों, प्रदर्शनियों और सार्वजनिक संवादों के जरिए विद्वानों, कलाकारों, संस्कृतिकर्मियों और स्थानीय समुदायों को एक साझा मंच मिला है।
हुगली नदी के तट पर स्थित होने के कारण, कोलकाता इस संस्करण के लिए एक विशिष्ट और ऐतिहासिक रूप से समृद्ध पृष्ठभूमि प्रदान करता है। सदियों से यह नदी विविध समुदायों, जैसे- आर्मेनियाई, पुर्तगाली, फ्रांसीसी, डच और ब्रिटिश बस्तियों के निवासियों के आपसी संपर्क का महत्वपूर्ण मार्ग रही है। इन समुदायों की उपस्थिति ने बंगाल की वास्तुकला, शिक्षा, व्यापार, भाषा, खान-पान, जीवनशैली और कलात्मक परम्पराओं को गहराई से प्रभावित किया है।
कोलकाता में नदी उत्सव के अंतर्गत, 31 जनवरी से 1 फरवरी 2026 तक ब्रिटिश डिप्टी हाई कमीशन (ब्रिटिश क्लब) में दो-दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया जा रहा है। इस संगोष्ठी में देशभर से आए विद्वान, शोधकर्ता और संस्कृति विशेषज्ञ नदियों के ऐतिहासिक, सामाजिक और सांस्कृतिक आयामों पर विचार-विमर्श करेंगे तथा नदी-केंद्रित भारतीय परम्पराओं के विविध पक्षों को उजागर करेंगे।
इसके बाद, 2 फरवरी से 11 फरवरी 2026 तक, विक्टोरिया मेमोरियल हॉल के सहयोग से, वहीं के दरबार हॉल में दुर्लभ छायाचित्रों एवं चित्रों की एक विशेष प्रदर्शनी आयोजित की जाएगी। इस प्रदर्शनी में विख्यात कलाकारों और छायाकारों की शताब्दी पुरानी दुर्लभ कृतियां प्रस्तुत की जाएंगी, जिनमें नदी भूगोल, प्राकृतिक दृश्य और सांस्कृतिक जीवन को विषयगत रूप से दर्शाया गया है। इसका उद्देश्य आगंतुकों को गंगा नदी प्रणाली के भारतीय सभ्यता, विरासत और कलात्मक कल्पना पर पड़े स्थायी प्रभाव की समझ प्रदान करना है, जिससे दर्शकों को नदी और संस्कृति के गहरे अंतर्संबंधों का अनुभव हो सके।
इस कार्यक्रम के माध्यम से आईजीएनसीए नदियों को इतिहास, स्मृति और जीवित परम्पराओं के महत्वपूर्ण संवाहक के रूप में देखते हुए जनसहभागिता, विद्वत् संवाद और सांस्कृतिक चेतना को प्रोत्साहित करना चाहता है। संगोष्ठी और प्रदर्शनी दोनों आम जनता के लिए खुली हैं। सभी इच्छुक नागरिकों का इस कला, इतिहास और नदीय संस्कृति के अनूठे संगम का अनुभव करने के लिए स्वागत है।



