क्या सचमुच आसमान युद्ध का फैसला लिख रहा है? या फिर इतिहास अब भी ट्रंप के हाथों में है?

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दिल्ली । आसमान अशांत है। आग लगी हुई है। चीन और रूस ऐसे खामोश हैं जैसे कुछ हुआ ही न हो। जबकि ज़मीन पर धुआँ है, बारूद है और बेचैनी है।
बेचारा ट्रंप क्या करे। ग्रह-नक्षत्र उसे चैन से रहने नहीं दे रहे। ज्योतिषियों का दावा है कि ऊपर ग्रहों की चाल ही नीचे युद्ध की दिशा तय कर रही है। अमेरिका और इज़राइल की अगुवाई में ईरान के खिलाफ छिड़ा संघर्ष छह दिनों की जगह अब छठे हफ्ते में प्रवेश कर चुका है। शुरुआत का पलड़ा साफ तौर पर एक तरफ झुका दिखता है। लेकिन अंत अब भी धुंध में लिपटा है ; लंबा, उलझा हुआ, थकाने वाला।

“इतिहास की सबसे बड़ी लड़ाइयाँ पहले आसमान में लड़ी जाती हैं, धरती तो सिर्फ उसका मंच बनती है,” एक पश्चिमी ज्योतिषी की यह टिप्पणी इन दिनों खूब दोहराई जा रही है।
कहानी 28 फरवरी की उस रात अचानक रफ्तार पकड़ती है। मिसाइलें आसमान चीरती हैं। ठिकाने ढहते हैं। और ईरान के सर्वोच्च नेता अली खामेनेई की मौत इस संघर्ष को एक नए मोड़ पर ला खड़ा करती है। सैन्य ढांचे को गहरी चोट लगती है। दुनिया सन्न रह जाती है।

ज्योतिषी इसे महज संयोग नहीं मानते। मंगल और यूरेनस का टकराव। राहु और मंगल की युति। यही विस्फोटक संयोजन है जिसे शास्त्रों में उथल-पुथल का संकेत माना गया है।
“जब मंगल उग्र होता है, तो तलवारें खुद रास्ता खोज लेती हैं,” एक वैदिक ज्योतिषी का कहना है।

शुरुआती दौर में यह युद्ध एकतरफा दिखता है। अमेरिकी वायु शक्ति का दबदबा साफ नजर आता है। सटीक हमले। सीमित नुकसान। मजबूत पकड़। लेकिन यही वह क्षण है जहाँ कहानी पलटने को बेकरार है।

कुंडलियाँ इशारा कर रही हैं कि यह संघर्ष जल्द थमने वाला नहीं। अप्रैल और मई आग से भरे महीने बताए जा रहे हैं। शनि और मंगल की युति तनाव को लंबा खींचेगी।
“शनि सिखाता है, मंगल सज़ा देता है। दोनों साथ हों तो समय कठोर हो जाता है,” यह पुरानी ज्योतिषीय कहावत फिर प्रासंगिक लगने लगी है।

आगे क्या? जवाब बेचैन करने वाला है। ड्रोन हमले बढ़ेंगे। मिसाइलों की बरसात होगी। प्रॉक्सी युद्ध गहराएंगे। होरमुज़ जलडमरूमध्य पर खतरे मंडराएंगे। पूरा पश्चिम एशिया इस आग की तपिश महसूस करेगा।

लेकिन हर भविष्यवाणी सिर्फ अंधेरा नहीं दिखाती। नास्त्रेदमस के लंबे सात महीनों के युद्ध का भी हवाला दिया जा रहा है।

कुछ ज्योतिषी दावा कर रहे हैं कि यह संकट अपने भीतर एक बदलाव का बीज भी लिए हुए है। गर्मियों के आखिर तक ईरान के लिए “मुक्ति” और एक तरह का पुनर्जन्म संभव है।
“हर विनाश अपने भीतर सृजन का बीज छुपाए होता है,” यह कथन जैसे इस पूरे परिदृश्य पर फिट बैठता है।

वैदिक ज्योतिष के कई चेहरे इसे सिर्फ सैन्य संघर्ष नहीं, बल्कि एक गहरे राजनीतिक और सांस्कृतिक भूकंप की शुरुआत मानते हैं। उनके मुताबिक दबाव बढ़ेगा, सत्ता डगमगाएगी और अंततः एक नई पहचान उभरेगी। शायद “प्राचीन पर्शिया” की स्मृति फिर सिर उठाए।

इस अंधेरे में एक हल्की रोशनी भी है।
जब बृहस्पति कर्क राशि में प्रवेश करेगा, तब संवाद के दरवाजे खुल सकते हैं। कुछ ज्योतिषी जुलाई के अंतिम सप्ताह की ओर इशारा कर रहे हैं। कुछ सितंबर और अक्टूबर में चरणबद्ध समझौते की संभावना देखते हैं। लेकिन इतिहास बार-बार साबित कर चुका है : “शांति कभी सीधे रास्ते से नहीं आती, वह संघर्ष के काँटों से होकर गुजरती है।”
भविष्यवक्ताओं की मानें तो एक और संकेत चिंता बढ़ाता है। यूरेनस का मिथुन राशि में प्रवेश। इतिहास गवाह है ; जब-जब ऐसा हुआ, अमेरिका बड़े युद्धों में उलझा है। आशंका है कि यह संघर्ष सीमाओं से बाहर फैल सकता है। तेल की कीमतें उछल सकती हैं। दूसरी शक्तियां परोक्ष रूप से मैदान में उतर सकती हैं।

ज्योतिषियों की भाषा अलग है, लेकिन निष्कर्ष एक सा है। फिलहाल युद्ध का मैदान अमेरिका और इज़राइल के पक्ष में झुका हुआ दिखता है। लेकिन जीत का ताज अभी दूर है। यह लड़ाई सिर्फ गोलियों और बमों से तय नहीं होगी। इसका असली हिसाब वक्त करेगा।

एक वरिष्ठ ज्योतिषी के शब्दों में गूंजती सच्चाई है:
“युद्ध मैदान में जीते जाते हैं, लेकिन उनका अर्थ समय तय करता है।”
नीचे धरती पर सैनिक आगे बढ़ रहे हैं। मोर्चा संभाले खड़े हैं। ऊपर आसमान में ग्रह अपनी चाल चल रहे हैं। और दुनिया ठहरी हुई सांसों के साथ देख रही है।
आखिर फैसला कौन करेगा?
सितारे?
या इंसान की जिद, उसकी बुद्धि और उसका साहस?
“ग्रह दिशा देते हैं, लेकिन मंज़िल इंसान खुद चुनता है।”

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Brij Khandelwal

Brij Khandelwal

Brij Khandelwal of Agra is a well known journalist and environmentalist. Khandelwal became a journalist after his course from the Indian Institute of Mass Communication in New Delhi in 1972. He has worked for various newspapers and agencies including the Times of India. He has also worked with UNI, NPA, Gemini News London, India Abroad, Everyman's Weekly (Indian Express), and India Today. Khandelwal edited Jan Saptahik of Lohia Trust, reporter of George Fernandes's Pratipaksh, correspondent in Agra for Swatantra Bharat, Pioneer, Hindustan Times, and Dainik Bhaskar until 2004). He wrote mostly on developmental subjects and environment and edited Samiksha Bharti, and Newspress Weekly. He has worked in many parts of India.

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