क्यों हर धर्मग्रंथ भविष्य से डराता है?

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दिल्ली : हाल ही में एक ज्ञानी बाबाजी से टकराहट हुई। वो बोले “कलियुग आ चुका है, अमेरिका (पश्चिम) से शुरू हुआ है, फिर मध्य एशिया, अंत में भारतीय क्षेत्र पर सौ साल में छा जाएगा। तब तक आगे बढ़ना है। नीचे गिरने से पूर्व तरक्की की बुलंदियां छूनी होती हैं, अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप पश्चिमी समाज को गर्त में पहुंचाने के लिए ही अवतरित हुए हैं।” उनकी बातें सुनकर कुछ लोगों का सोया हास्य रस जाग्रत हुआ!!
बहरहाल, बॉलीवुड फिल्म के एक गाने की ये पंक्ति श्री “राम कह गए सिया से” … आज कोई भविष्यवाणी नहीं, बल्कि रोज़ का अनुभव बन चुकी है। अक्सर मन में सवाल उठता है, क्या सचमुच इंसान और इंसानियत का सफ़र अंधेरे गड्ढे की तरफ़ ही तय है? क्यों दुनिया के लगभग सभी धर्मग्रंथ—रामचरितमानस से लेकर बाइबिल, क़ुरआन, बौद्ध, जैन और सिख परंपराएँ, भविष्य को लेकर इतने सख़्त, इतने बेचैन, इतने निराश दिखाई देते हैं?
क्या ये ग्रंथ “अंत” की घोषणा करते हैं या हमें थकाऊ पतन से रूबरू कराते हैं। जब सभ्यताएँ बूढ़ी होती हैं, तो पहले उनकी आत्मा थकती है। इमारतें तब भी ऊँची होती हैं। तकनीक तब भी तेज़ होती है। बाज़ार तब भी चमकता है। लेकिन भीतर का इंसान धीरे-धीरे खोखला होने लगता है।
हज़ारों साल पहले अलग-अलग सभ्यताओं ने, अलग-अलग भाषाओं में, एक ही बात कही, अगर तरक़्क़ी नैतिकता से आगे निकल गई, तो सवाल ये नहीं कि क्या बचेगा, सवाल ये है कि कैसे बचेगा?
तुलसी का कलियुग:
गोस्वामी तुलसीदास का कलियुग कोई अचानक आई आपदा नहीं है। यह मूल्यों का उलटफेर है। यह वह दौर है जहाँ चोरी को चालाकी कहा जाता है। अहंकार को आत्मविश्वास। झूठ को “स्मार्टनेस”। और चोट पहुँचाने वाले को “सफल इंसान”।
तुलसी लिखते हैं, धर्म के रखवाले ही धर्म से सौदेबाज़ी करने लगते हैं। संतों के घर सज जाते हैं, लेकिन दिल सूने रह जाते हैं। गुरु बाज़ार में बिकने लगते हैं। परंपरा दिखावा बन जाती है। माँ-बाप, गुरु, बुज़ुर्ग, सब बोझ लगने लगते हैं। रिश्तों में अपनापन घटता है, हिसाब-किताब बढ़ जाता है।
यह पतन नहीं, यह सामान्यीकरण है। और यही सबसे ख़तरनाक होता है।
भागवत पुराण: धीमी सड़न की कहानी
भागवत पुराण कलियुग को किसी एक हादसे की तरह नहीं देखता। वह उसे एक धीमी सड़न कहता है। सच थोड़ा-थोड़ा कम होता जाता है। दया घटती जाती है। याददाश्त कमजोर पड़ती है। ज़िंदगी लंबी लगती है, लेकिन गहराई खो देती है। दौलत इंसान की पहचान बन जाती है। चरित्र पीछे छूट जाता है। नेता ऊँचे पदों पर होते हैं, लेकिन नैतिकता नीचे गिर जाती है। धर्म चलता रहता है, पर आत्मा शामिल नहीं होती।
भागवत की सबसे बड़ी चेतावनी यही है, कलियुग शोर से नहीं जीतता। वह तब जीतता है जब ग़लत चीज़ें “नॉर्मल” बन जाती हैं।
फिर भी, भागवत अंत की बात नहीं करता। वह एक मोड़ की बात करता है, कल्कि का आगमन। विनाश के लिए नहीं, शुद्धि के लिए।
बाइबिल: पूरी दुनिया की बेचैनी
बाइबिल का “आख़िरी वक़्त” किसी एक देश की कहानी नहीं है। यह पूरी दुनिया की सामूहिक बेचैनी है। जंगें।बीमारियाँ। भूख। डर। झूठे पैग़ंबर। झूठे वादे। और सच बोलने वालों की बढ़ती तन्हाई।
यहाँ भी वही पैटर्न है, ताक़त बढ़ती है, विवेक घटता है।
बाइबिल कहती है, अंधेरा इसलिए नहीं आता कि सब खत्म हो जाए, बल्कि इसलिए आता है ताकि सब साफ़ हो सके। तबाही बदले के लिए नहीं, शुद्धि के लिए।
इस्लाम, बुद्ध, जैन और सिख परंपरा: अलग ज़बान, वही चेतावनी। नालायक लोग हुक्म चलाएँगे। इल्म बहुत होगा, लेकिन समझ कम।
महात्मा बुद्ध कहते हैं, एक ऐसा समय आएगा जब उपदेश बहुत होंगे, पर करुणा ग़ायब हो जाएगी। ध्यान होगा, पर जागरूकता नहीं। फिर मैत्रेय आएगा, एक नई शुरुआत के लिए।
जैन दर्शन समय को एक ढलान मानता है। अहिंसा कठिन होती जाएगी। मुक्ति दुर्लभ होगी, लेकिन असंभव नहीं।
नॉर्स, यूनानी, पारसी, सब यही कहते हैं, सभ्यताएँ हथियारों से नहीं, चरित्र के क्षरण से गिरती हैं।
तो क्या हम उसी दौर में हैं? सवाल यह नहीं है कि “क्या अंत निकट है?”
सवाल यह है, क्या हम पहचान पा रहे हैं कि हम कहाँ खड़े हैं? आज दौलत इंसान की क़ीमत बन गई है। छवि, सच से ज़्यादा अहम हो गई है। धर्म एक ब्रांड बन चुका है। और इंसान, थका हुआ उपभोक्ता।
हर युग में मोक्ष, मुक्ति, निजात, इंसान के भीतर से ही शुरू होती है। और शायद यही बात हज़ारों साल पुराने ये ग्रंथ आज भी हमसे कहना चाहते हैं

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Brij Khandelwal

Brij Khandelwal

Brij Khandelwal of Agra is a well known journalist and environmentalist. Khandelwal became a journalist after his course from the Indian Institute of Mass Communication in New Delhi in 1972. He has worked for various newspapers and agencies including the Times of India. He has also worked with UNI, NPA, Gemini News London, India Abroad, Everyman's Weekly (Indian Express), and India Today. Khandelwal edited Jan Saptahik of Lohia Trust, reporter of George Fernandes's Pratipaksh, correspondent in Agra for Swatantra Bharat, Pioneer, Hindustan Times, and Dainik Bhaskar until 2004). He wrote mostly on developmental subjects and environment and edited Samiksha Bharti, and Newspress Weekly. He has worked in many parts of India.

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