करुणा सागर पण्डा
रायपुर (छत्तीसगढ़): द्वार पर अगवान बनकर जमाई के स्वागत में गई रानी मैना जब शिव जी को भयानक वेष में देखती है तो वह क्रोध से परछन की थाली को वहीं द्वार पर ही पटक आती है। और उसी क्रोध में वह अपनी पुत्री को बुलाकर कहती है- “मेरी बात सुन लो पार्वती! उस बावले शिव से तुम्हारा विवाह नहीं होगा…नहीं होगा… नहीं होगा।”
~ “बावला? यह आप क्या कह रहीं हैं माता?”
— “सच ही तो कह रही हूँ। पूरा का पूरा बौराया हुआ है वह… वस्त्र तक पहनने का शऊर नहीं है उसे। वह कर्पूर की तरह गोरा है फ़िर भी उज्ज्वल दिखने के लिए उसने अपने पूरे तन पर राख मला हुआ है। उसके गले में सुगंधित फूलों की नहीं, मसान के नरमुंडों की माला है… उसने अपना कंगन-कुंडल सांपों का बना रखा है। और, वह तो जो है सो है…. उसके साथ में भी जो हैं न… उन सबका का रूप भी बहुत भयंकर है पुत्री! तुम तो उन्हें देखते ही डर जाओगी। इसलिए अपने पिता के समीप जा जाकर उनसे कह दो कि तुमको शिव से विवाह नहीं करना है। जाओ पार्वती! जाकर कह दो…”
~ “ऐसे कैसे विवाह को ‘ना’ कह दूं माता? आप तो विधाता की योजना को ही अस्वीकार करने को कह रही हैं।”
— “अरे! उसी विधाता से ही तो चूक हो गई है पुत्री! उसे जिस फल को कल्पवृक्ष में लगाना चाहिए था… वह उसे बबूल के पेड़ में लगाने जा रहा है। तुम्हारा ना कहना ही सर्वथा उचित है।”
~ “नहीं माता! कलंक के टीके को व्यर्थ में ही अपने कपार पर लगा लेना कैसे उचित हो सकता है? नियति ने जो रच दिया गया है, वह तो होकर ही रहेगा।”
— “होकर ही रहेगा तो तुम भी मेरी बात सुन लो! मैं तुम्हें लेकर पहाड़ से गिर पड़ूंगी… आग में जल जाऊंगी… समुद्र में कूद जाऊंगी लेकिन इस बावले वर से तुम्हारा विवाह नहीं होने दूंगी।”
~ “माता! आप तनिक शांत होइए और शांति से नारद जी की कही बातों को स्मरण कीजिए। उन्हीं के कहने से ही तो घोर तपस्या करके मैंने इस मंगल दिन को पाया है।”
— “तुम तो नाम मत लो उसका… बाँझ स्त्री भला प्रसव की पीड़ा को क्या जाने? इतना तो सोचो पार्वती! कि जो स्वयं अविवाहित है… वह तुम्हारे घर बसाने का उपदेश क्या ही देगा, जो तुमने उसकी बातों को विश्वास कर लिया।”
…और इस तरह माता-पुत्री में तर्क-वितर्क तब तक निर्बाध चलता रहा जब तक पर्वतराज हिमाचल सप्तऋषियों और नारद जी के साथ मिलकर रानी मैना को यह आश्वस्त नहीं करा लिए कि यह विवाह सिर्फ़ दो आत्माओं का ही मिलन नहीं अपितु शिव के साथ शक्ति का मिलन है। पार्वती ही साक्षात जगदम्बा है जो पूर्व जन्म में प्रजापति दक्ष की पुत्री सती थी… और उसे अपने हर जन्म में शिव को ही वरण करना है।
वैसे माता-पुत्री के पूरे संवाद में रानी मैना के जितने भी तर्क थे वे एक माँ के हृदय के तर्क थे। भला ऐसी कौन माँ होगी जो अपनी बेटी की गृहस्थी में सुख और शांति देखना नहीं चाहेगी? आज भी इस लोक में एक माँ उसे ही तो अपना जामाता चुनती है जिसका अपना घर हो, जिसके पास आजीविका के साधन हों, देखने-ताकने में भी जो भला मानुष दिखे…. लेकिन! देवी पार्वती के तर्क विश्वास के उस बीज से उपजे हुए तर्क थे जो प्रेम की धरातल पर बोये गए थे। सती के रूप में हवनकुंड में उनका आत्मदाह केवल संबंधों के प्रति समर्पण का उदाहरण भर नहीं था… वह एक विश्वास भी था कि उसके परमेश्वर उसकी प्रतीक्षा करेंगे, अगले जन्म में वह उसी गरिमा के साथ शिव की ही अर्धांगिनी बनेंगी।
यदि हम शास्त्रों से इतर लोकमानस को देखें तो उसके अनुसार भी गौरी-शंकर की जोड़ी ही संसार की सबसे सुंदरतम जोड़ी है। जानते हैं क्यों? क्योंकि शिव वह सब करते हैं जो एक सामान्य स्त्री अपने पुरुष से अपेक्षा रखती है। और वह अपेक्षा होती क्या है…. यही कि वह अंतिम निश्वास तक अपने पुरुष की अनन्या बनकर रहे, यही कि उसके पुरुष के प्रेम में कोई आडंबर न हो, यही कि उसका पुरुष दुनियादारी का गणितज्ञ न हो..… है न? तो बंधु! लोक संस्कृति में व्याप्त भोले बाबा की उन तमाम कथाओं को बाँच लीजिए, आपको बाबा वही करते मिलेंगे जो माता पार्वती उनसे अपेक्षा रखतीं हैं। और माता पार्वती? क्या उन्होंने भी कभी शिव जी के औघड़दानी होने का या उनके फक्कड़पना का प्रतिरोध किया? कभी नहीं किया। माता भी बाबा के रंग में ही रंगी रहतीं हैं। यही तो है दाम्पत्य का कुशल निर्वहन…. यदि संसार की सभी जोड़ियां भी गौरी-गौरा की जैसी हो जाएं तो उन सबका घर भी कैलाश जैसा ही पवित्र बन जाएगा।
।। महाशिवरात्रि मंगलकारी हो।।
।। ॐ नमः पार्वती पतये, हर-हर महादेव ।।



