महाराष्ट्र नगर निकाय चुनाव परिणाम – प्रमुख राजनैतिक संदेश

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मुंबई । महाराष्ट्र नगर निकाय चुनाव परिणाम आ चुके हैं। मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस के नेतृत्व में भाजपा गठबंधन महायुति ने संपूर्ण महाराष्ट्र मे महाविजय प्राप्त करके इतिहास रच दिया है। महाराष्ट्र में पहली बार भाजपा के 22 मेयर बनने जा रहे हैं जबकि तीन जिलों में उसके सहयोगी शिवसेना एकनाथ शिंदे गुट, एक जिले अहिल्यानगर में उसके दूसरे सहयोगी अजित पवार गुट का मेयर बनने जा रहा है। भारत के सबसे बड़े नगर निगम मुंबई में पक्ष और विपक्ष के बीच केवल चार सीटो का अंतर होने के कारण किसका मेयर बनेगा इस पर कुछ कहना कठिन हो गया है किन्तु यदि भाजपा का मेयर बनता है तो यह एक बड़ी उपलब्धि होगी। महाराष्ट्र निकाय चुनावों में ओवैसी की एआईएमआइएम की बढ़त मुस्लिम तुष्टिकरण में संलिप्त रहने वाली कांग्रेस और समान विचारों वाली इंडी गठबंधन की पार्टियों के लिए चिंता का नया कारण बन गई है।
चुनाव परिणामों से स्पष्ट है कि महाराष्ट्र की जनता ने हिंदी और उत्तर भारतीयों के प्रति नफरत को पूरी तरह नकारते हुए राजनीतिक स्थिरता और विकास को चुना है। परिवारवाद की राजनीति भी हाशिये पर जाती दिख रही है। मुस्लिम तुष्टिकरण में संलिप्त रहने वाले दल जो मुंबई में न्यूयार्क के ममदानी जैसा मेयर बनाने का सपना देख रहे थे उनको भी झटका लगा है। इन चुनावों में एआईएमआईएम जैसी पार्टियों को जैसी सफलता प्राप्त हुई है वह स्थानीय स्तर पर बांगलादेशी घुसपैठियों व रोहिंग्याओं के चलते हुए जनसांख्यकीय परिवर्तन से संभव हुई दिखती है। 

महाराष्ट्र की राजनीति में अपना वर्चस्व बनाए रखने के लिए 20 वर्षों के बाद ठाकरे बन्धु एक साथ आ गए किंतु उसका कोई प्रभाव चुनाव परिणामों पर नहीं दिखा। महाराष्ट्र में ठाकरे बंधुओं की दुर्गति का कारण यह लोग स्वयं ही हैं । ठाकरे बंधुओं ने मराठी और मराठी मानुस को ही अपना मुख्य चुनावी मुद्दा बनाया और अन्य मुद्दे पीछे छोड़ दिए । मुंबई में मराठी मतदाता केवल 38 प्रतिशत है जबकि 30 से 35 प्रतिशत मतदाता गुजराती और अन्य उत्तर भारतीय और दूसरे समुदायों के हैं। उद्धव ठाकरे अगर राज ठाकरे के साथ गठबंधन नहीं करते तो संभवतः उन्हें अधिक लाभ मिल सकता था क्योंकि राज ठाकरे के लोग जिस तरह उत्तर भारतीयों और हिंदी भाषियों की सार्वजनिक रूप से पिटाई कर रहे थे वो भारतीय समाज स्वीकार नहीं करता चाहे वो किसी भी प्रान्त या क्षेत्र का हो। अवसर मिलते ही समावेशी भारतीय समाज ने अपने वोट से ठाकरे की पिटाई कर दी। ठाकरे बंधुओं ने तमिलनाडु के भाजपा नेता अन्नामलाई को रसमलाई कहा।लुंगी की पुंगी बजने जैसे निम्न स्तरीय व्यंग्य किए । ठाकरे बंधुओं ने बांग्लादेश में हिंदुओं पर हो रहे अत्याचारों की निंदा तक नहीं की अपितु इसके लिए मोदी सरकार को ही दोष देते रहे। ठाकरे बंधु “बुर्के वाली मेयर बनेगी” जैसी बातों पर भी चुप रहे जिसको जनता ने इनके भी मुस्लिम तुष्टिकरण की ओर झुकने का प्रमाण माना। 

आज महाराष्ट्र में सभी वर्गों के मतदाताओं का वोट भाजपा को मिल रहा है।महाराष्ट्र में महायुति गठबंधन युवाओं की सबसे बड़ी पसंद बनकर उभरा है ।महाराष्ट्र में लाडली बहिन योजना का प्रभाव भी महिला मतदाताओं पर देखने को मिला। इस योजना के अंतर्गत महिलाओं के खाते में तीन हजार रुपए आते थे किंतु इंडी दलों की आपत्ति के कारण चुनाव आयोग ने इस राशि के वितरण पर रोक लगा दी थी, तब एकनाथ शिंदे ने महिलाओं से विशेष अपील करी की थी कि अब आप सभी लोग इन लोगो को वोट मत करिएगा क्योंकि यह लोग विकास विरोधी और महिला विरोधी हैं। यदि मुंबई की बात करी जाए तो वहां के स्थानीय टेंपो-टैक्सी चालकों का भी अच्छा खासा मत भाजपा गठबंधन को मिला है। मुंबई में टैंपो -टैक्सी चलाने वालों का बड़ा प्रतिशत है। 

मुंबई में 118 सीटों पर विजय मिलने के बाद यदि भाजपा ने अपना मेयर बना लिया तो यह पार्टी के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण उपलब्धि होगी क्योंकि मुंबई भारत की आर्थिक गतिविधियों का बड़ा केंद्र है। यह नगर निगम 1885 से एशिया का सबसे बड़ा नगर निगम है। बीएमसी का वार्षिक बजट 74 हजार करोड़ रुपए से अधिक है जबकि गोवा, मणिपुर, मेघालय, मिजोरम जैसे 8 राज्यों का बजट इससे कम है। मुंबई नगर निगम के पास 1.15 लाख कर्मचारी हैं। महाराष्ट्र में भाजपा की इस बड़ी जीत का श्रेय स्वाभाविक रूप से मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस व प्रांतीय तथा स्थानीय नेतृत्व को जाता है। महाराष्ट्र नगर निकाय चुनावों से स्पष्ट हो गया है कि भाजपा की हिंदुत्व और विकास की अपील मराठी मानुस को भी आकर्षित कर रही है। महाराष्ट्र सरकार के एक मंत्री नीतीश राणे ने सोशल मीडिया पोस्ट पर लिखा कि जो हिंदू हित की बात करेगा वो महाराष्ट्र पर राज करेगा बसयही बात बाला साहेब ठाकरे के उत्तराधिकारी भूल गए। 
 
महाराष्ट्र की राजनीति में मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस विगत 12 वर्षों से सक्रिय रहते हुए राजनीति के धुरंधर के रूप में स्थापित हो रहे हैं। वह महाराष्ट्र की समस्याओं का निराकरण कर रहे हैं। उन्होंने चुनाव अभियान के दौरान स्पष्ट किया कि हिंदुत्व केवल भावनात्मक या सांस्कृतिक मुद्दा नहीं अपितु सुशासन और विकास की वैचारिक नींव है। उन्होंने नगर निगम चुनावों में स्थानीय मुद्दों पर बल दिया। भाजपा के इस धुरंधर ने महाराष्ट्र में ठाकरे बंधुओं से लेकर शरद पवार और कांग्रेस के मजबूत किलों में उस समय सेंध लगाने में सफलता प्राप्त की जब इन्होंने मिलकर लोकसभा चुनाव -2024 में भाजपा को रोक दिया था। नागपुर से लेकर सोलापुर तक स्थानीय भाजपा नेतृत्व ने विपक्ष के हर किले हिलाकर रख दिया है। ऐसा माना जा रहा है कि महाराष्ट्र के नगर निकाय चुनाव परिणामों का प्रभाव सभी आगामी विधानसभा चुनावों पर पड़ेगा ।

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मृत्युंजय दीक्षित

मृत्युंजय दीक्षित

मृत्युंजय दीक्षित का लखनऊ में निवास है। वे लेखक, स्वतंत्र पत्रकार एवं स्तम्भकार हैं

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