मैंने कहा न लिखने पढ़ने का काम बहुत चुनौती का काम है

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हितेन्द्र

कोलकाता। लिखना पढ़ना बहुत ही चुनौती भरा काम है । बहुत खून पसीना बहाना पड़ता है । कई फ्रंटों पर लड़ना भी पड़ता है ।
हमारे जनरेशन की एक और समस्या है जिसपर ध्यान देना चाहिए । हमलोग ग़लत धारणाओं का बोझ बहुत आत्मविश्वास से ढोते रहे । अब जब इन धारणाओं की बिखरते हुए देखते हैं तो समझ में नहीं आता कि अपने विश्वासों की रक्षा कैसे करें ।

विश्वास ग़लत नहीं था । दुनिया को बेहतर बनाने का ख़्वाब तो सही है । जो पीछे हैं , मजबूर हैं उनके साथ खड़े होना तो हमारा दायित्व है ही ।
दिक़्क़त थी ग़लत मार्गदर्शन की ।

उनके बारे में जान जाने के बाद या तो चुप रहिए कुछ बोलिए नहीं या फिर साहस पूर्वक अपनी बात को कहिए और इस क्रम में अपने विरुद्ध भी बोलिए । यह आसान नहीं होता ।

सामने आई पीढ़ी कमजोर नहीं है लेकिन उनके पास यथार्थ नहीं है । जीवन बोध भी कुछ संकीर्ण है । उनसे बातें करते हुए लगता ही नहीं है कि सामाजिक बोध उनके भीतर ठीक से प्रतिष्ठित है ।

हमलोगों को बहुत बेहतर शिक्षक मिले थे जबकि हमलोग सरकारी संस्थानों और पुस्तकालयों में पढ़े लिखे । आज के युवा लोग हमारी पीढ़ी से बहुत कुछ सीख सकती थी अगर सामाजिक स्पेस को हम बचा सके होते ।

अपनी पीढ़ी के अधिकतर लोगों को अपने अपने बाल बच्चों की चिंता में ही फँसा देखता हूँ । उनके पास समय और संसाधन सिर्फ़ परिवार के लिए है ।
इसलिए सरकारी संस्थान और सामाजिक स्पेस सब ढहते जा रहे हैं ।

हमलोग मूक दर्शक बने हुए हैं ।

लिखने पढ़ने का काम करने वाले तभी कुछ कर सकेंगे जब उनपर ध्यान देने वाले लोग बचेंगे और बढ़ेंगे ।

वही तो कम होती जा रही है ।

तसल्ली के लिए किसी समारोह में जाकर कुछ बोल आए कोई, तस्वीर साझा कर ले या कहीं कविता पाठ कर आए लेकिन यह बिल्कुल स्पष्ट है कि अंतर नहीं पड़ता ।

मैंने कहा न लिखने पढ़ने का काम बहुत चुनौती का काम है । यह सुविधा से किया जाने वाला काम नहीं है । यह चैरिटी का काम नहीं है ।

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