मस्ती-भरा मेरा हिंदुस्तान: उल्टा-सीधा एक समान

Flag-India.jpg.webp

दिल्ली । बीते वर्ष इन्हीं दिनों, साउथ की एक यूनिवर्सिटी में “भारतीय दर्शन और विज्ञान” विषय पर आयोजित एक सेमिनार में, एक ज्ञानी साधु महाराज को लैपटॉप से प्रेजेंटेशन देते देखा, एक हाथ में मोबाइल, दूसरे में रिमोट l वाह, क्या अद्भुत संगम था टेक्नोलॉजी और फिलासफी का!!

एक खबर अगले दिन अखबार में पढ़ी। आष्टांग योग के विख्यात शिक्षक गुरु, हार्ट अटैक की वजह से ICU में इलाज के लिए भर्ती। उधर रॉकेट से अंतरिक्ष में सैटेलाइट सफलता पूर्वक भेजने के लिए हवन, प्रार्थना सभा में बड़ी संख्या में लोग उपस्थित रहे।

भारत देश महान है। विसंगतियों और विरोधाभासों को हम विविधता कहकर सम्मान देते हैं। ये हमारा बड़प्पन है कि असफलताओं का क्रेडिट खुद न लेकर सितारों को देते हैं, जबकि सफलता के कई बाप होते हैं। चिमटाधारी चिलमची बाबा को वोही महत्व देते हैं जितना मेडिकल कॉलेज के प्रोफेसर को।
ये पावन भूमि विचित्रताएं का एक ऐसा मेला है जहाँ हर चीज़ “जुगलबंदी” करती है—चाहे वो पुराना हो या नया, पवित्र हो या पगला, सब मिलकर एक रंग-बिरंगी रेनबो कलर की पोर्ट्रेट बनाते हैं, जहां मुंह में राम बगल में छुरी लिए दुश्मन भी दोस्ती का किरदार खूबी से निभाते हैं।

हमारे यहाँ संतों ने मोक्ष पाने के लिए जंगलों में तपस्या की, लेकिन आज के आध्यात्मिक गुरु, बेंगलुरु के टेक पार्क में “मोक्ष” (IPO) की तलाश करते हैं! महात्माओं को जंगल में वृक्ष के नीचे ज्ञान मिला, पर आज के गुरु “लिंक्डइन” पर ज्ञान बाँटते हैं। पैसा कमाओ प्राणायाम से, मोह माया के खिलाफ तकरीर करके।

22 भाषाएँ, 1000 से ज्यादा बोलियाँ, पर जब भारत-पाक मैच होता है, तो सब एक हो जाते हैं! हम सब एक हैं… बस टीवी स्क्रीन तोड़ने के लिए! ट्रेन में बैठकर अगर आप इडली-सांभर ऑर्डर करें, तो तैयार रहें पैंट्री वाला आपको इडली के साथ, सांभर की जगह सब्जी रायता थमा सकता है!
हम मंगल पर मिशन भेजते हैं, लेकिन गाँव में 4G का सिग्नल पकड़ने के लिए लोग पेड़ पर चढ़ जाते हैं! कोविड काल में बहुतों ने ये प्रयोग किया। इसरो ने चंद्रयान भेजा, हमने व्हाट्सएप फॉरवर्ड भेजा! सवेरे उठते ही सभी को धार्मिक संदेश, या देवी देवताओं के आशीर्वाद वॉट्सएप पर फॉरवर्ड करना, एक हेल्थी रिचुअल बन चुका है जिससे देश पर ग्रह नक्षत्र मनमानी नहीं कर पाते।

आवारा कुत्ते, बंदर, गायें सड़क पर राज करते हैं, और हम उनके आगे हॉर्न बजाओ, देश बचाओ वाले नारे लगाते हैं। यातायात नियम? वो क्या होता है? गाय माता जहाँ चलें, वहीं सबको रुकना पड़ता है! साइलेंट जोन में जोर से भोंपू बजाए। जिधर जगह मिले, घुसो, आगे निकलो, चालान आयेगा, देख लेंगे विधायक जी!

आजकल लोग “स्वाइप राइट” करके प्यार ढूँढ़ते हैं, लेकिन शादी तब तक नहीं होती जब तक पंडित जी कुंडली नहीं मिला लेते! रिश्ता शादी की वेबसाइट से, परखा जाएगा पंडितजी की ज्योतिषी चाल से, यजमान हाथ जोड़े नतमस्तक सितारों की गति और दिशा से। यानी अब जन्म कुंडली का मैच कराओ!
अमीरी गरीबी की रेखा मोह माया या मृग तृष्णा है। एक तरफ अंबानी का 27 मंजिला घर, दूसरी तरफ झुग्गी में रहने वाले लोग। ट्रिकल-डाउन इकोनॉमी? जब रोकड़ा प्रथम पायदान पर ही रुक जाए तो समृद्धि का बंटवारा, कभी न खत्म होने वाला सपना ही बना रहता है।

हम दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र हैं, लेकिन नेता वही पुराने खानदान से आते हैं। चुनाव आता है, जाता है… पर नेता वही रहते हैं! ये एक नई जाति व्यवस्था है, जिसमें नेता के बच्चे नेता, डॉक्टर के डाक्टर, सीए के सीए, जजों के जज वकील, आईएस के बच्चे ऑफिसर, एंड सो ऑन। हम फ्लेक्सिटेरियन नहीं, बस थोड़े कन्फ्यूज्ड हैं! मीट खाना गुनाह, दारू पीकर मांसाहारी गाली गलौज तर्क संगत! घर में दादी हल्दी वाला दूध पिलाती हैं, और हम कैफे में “हल्दी लट्टे” के लिए ₹500 देते हैं! पुराना ज्ञान, नया पैकेजिंग! विषमताएं और ढोंग, आडंबर life ko रोचक बनाते हैं । लड़कियां हवाई जहाज उड़ा रही हैं, लेकिन शादी के बाद सबसे पहला सवाल— “रोटी बनाना आता है न? कोई बॉय फ्रेंड तो नहीं है न?”

हम दीये जलाकर अंधेरा भगाते हैं, फिर पटाखों से हवा को इतना जहरीला बना देते हैं कि सांस लेना मुश्किल हो जाता है! पहले प्रदूषण फैलाओ, फिर एयर प्यूरीफायर खरीदो! पर्सनल या कम्युनिटी हाइजीन की किसे चिंता, बस फ़ोग deo है तो, स्प्रे करते रहो। पाप को धुएं में उड़ाओ, भंडारे में प्रसाद पाओ।

सबका साथ, सबका विकास। हम सबको साथ लेकर चलते हैं… बस चुनाव के लिए ही धर्म याद आ जाता है! “वोट बैंक की पूजा, सबसे बड़ा धर्म!”

भारत को समझना हो तो हार्वर्ड की डिग्री कम पड़ेगी, और अगर समझ आ गया तो पक्का आप बाबा बन जाएंगे! यहाँ विरोधाभास कोई सामाजिक बुराई नहीं, बल्कि हमारी यूएसपी है। जितने फन, उतनी गहनता; जितनी सादगी, उतनी जुगाड़ टेक्नोलॉजी! सच कहें तो हम भारतीयों की खासियत ये है कि हमारी ट्रैजिक ट्रैफिक जाम भी कॉमिक कॉन्सर्ट लगती है।

हमारी संस्कृति ऐसी है कि एक ही व्यक्ति हवन भी करता है और ठेके पर लाइन में भी लगता है। सुबह योग, शाम को जलेबी! मंदिर में मत्था टेकते हैं, और बाहर निकलकर हेलमेट फेंककर ट्रैफिक नियम तोड़ते हैं। जय श्री, बोलते हुए बाइक स्टार्ट करना भी अब इंश्योरेंस का हिस्सा बन गया है। यहाँ हर चीज़ में ड्यूलिटी है। मंदिर में माथा टेकते हैं और पूजा के बाद मोबाइल से वीडियो बनाकर अपलोड भी करते हैं — “जय बाबा वायरलनाथ की!”
हम भारतीय उस थाली की तरह हैं जिसमें सब कुछ होता है — और कभी-कभी कुछ ऐसा जो न तो पकवान है, न पहचान — जैसे “प्याज वाली खीर।”

Share this post

Brij Khandelwal

Brij Khandelwal

Brij Khandelwal of Agra is a well known journalist and environmentalist. Khandelwal became a journalist after his course from the Indian Institute of Mass Communication in New Delhi in 1972. He has worked for various newspapers and agencies including the Times of India. He has also worked with UNI, NPA, Gemini News London, India Abroad, Everyman's Weekly (Indian Express), and India Today. Khandelwal edited Jan Saptahik of Lohia Trust, reporter of George Fernandes's Pratipaksh, correspondent in Agra for Swatantra Bharat, Pioneer, Hindustan Times, and Dainik Bhaskar until 2004). He wrote mostly on developmental subjects and environment and edited Samiksha Bharti, and Newspress Weekly. He has worked in many parts of India.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

scroll to top