दिव्या तिवारी
दिल्ली । गुरु तेग बहादुर की वाणी माया से मुक्ति और ईश्वर के नाम सेजुड़ने की प्रेरणा देती है। उन्होंने त्याग, करुणा, निर्भीकता औरआत्म-बौथ का संदेश देकर मानवता, समानता और सत्य केमार्ग पर चलने का आह्वान किया। उनका उपदेश आज भीजन-जन का मार्गदर्शन करतागु रु तेग बहादुर की रचनाएं सरल, सशक्त और प्रभावशाली हैं, जो सीधे पाठक के हृदय से जडतीहैं। उन्होंने पांचवें गुरु अर्जनदेव द्वारा संकलित ‘आदिग्रंथ’ कासंपादन कर उसे पूरा किया। गुरु तेग बहादुर की रचनाएंमानवता और आत्मिक उच्चता का संदेश देती हैं. जिनमें ‘माया’ से उबरकर ‘नाम’ से जुडने की प्रेरणा मिलती है। उनकी वाणी मेंसंसार की मायावी प्रवृत्तियों – लोभ, मोह, क्रोध, अहंकार- को’माया’ कहा गया है, जबकि परमात्मा से जुड़ने और सांसारिकबंधनों से मुक्त होने की भावना को ‘नाम’ के रूप में प्रस्तुतकिया गया है। वे व्याप्त मानवीय संकटों के बारे में समझाते हैंकि संसार की सुख-सुविधाओं और संबंधों का दास बनने सेव्यक्ति संकुचित एवं अधूरा हो जाता है। उनकी रचनाओं में यहसंदेश निहित है कि जीवन का वास्तविक उद्देश्य सांसारिकमोह-माया से ऊपर उठकर ईश्वर के नाम से जुड़कर आत्मिकशांति और पूर्णता प्राप्त करना है। उनकी वाणी में त्याग,साहस, धैर्य और सेवा जैसे गुणों का विशेष स्थान है, जो आज भी मानवजीवन के प्रेरणा स्रोत हैं।गुरु महाराज का साहित्य जीवन कोसार्थक बनाने और आत्मिक शांति प्राप्त करने का एक प्रबलमाध्यम है। उनके काल में समाज अपने वृहत्तर जीवन-आदर्शोंके भूलकर कंचन और कामिनी की अराधना में ही डूबा हुआथा। व्यक्ति की ऐसी मानसिकता को चित्रित करते हुए उन्होंनेकहा-कहउ कहा अपनी अधमाई।उरझिओ कनक कामिनी केरस नह कीरति प्रेम गाई। जग झूठे कउ साचु जानि कै ता सिउरुच उपजाई ।।दीन बंध सिमरिओ नहीं कबहूं होतु जु संगिसहाई। मगन रहिओ माइआ मै निस दिनि छुटी न मन की काई॥ कहि नानक अब नाहि अनत गति बिनु हरि की सरनाई ।।गुरुमहाराज अपनी रचनाओं में माया के प्रपंच और उससे मुक्ति काप्रमाण देते हैं। वे बताते हैं कि माया के प्रपंच में फंसा हुआव्यक्ति सोचता है कि ‘मैं अपनी अधमता का वर्णन किसतरहकरूं। मैं सोने और स्त्री में ही उलझकर रह गया हूं, संसार कीझूठी चीजों को ही सच मान बैठा हूं, इसलिए उन्हीं में रुचि रहीहै। चूंकि रात-दिन माया में ही मग्न रहता हूं, इसलिए मन-अज्ञानकी काई दूर नहीं होती। मुझे चाहिए क्या? दीनबंधु का स्मरणकरूं। बिना उसकी शरण में गए मेरी गति नहीं है।’गुरु महाराजहमें अपने मोह-बंधन से ऊपर उठकर ईश्वर-नाम के व्यापकधरातल पर पहुंचने की प्रेरणा देते हैं। उनका कहना है किअसली ईश्वर बाहर नहीं, हमारे भीतर है, जैसे पुष्प में सुगंधऔर दर्पण में छाया होती है। इसलिए पहले अपने आप कोपहचानना आवश्यक है, क्योंकि अपने आप को बिना पहचानेभ्रम दूर नहीं हो सकता। यह शिक्षा उनकी सभी रचनाओं कासार है जो मनुष्य को आंतरिक आत्म-बोध और मोक्ष के मार्गपर ले जाती है।उन्होंने जिस ईश्वर के गुणों की ओर संकेतकिया है, वे हैं सहनशीलता, दया, क्षमा, और विनम्रता। वे कहतेथे कि एक सज्जन व्यक्ति वह होता है, जो जाने या अनजाने मेंकिसी की भावनाओं को ठेस नहीं पहुंचाता। उनका मानना थाकि वैसे भी छोटे-छोटे कार्यों से ही महान कार्य बनते हैं तथा हारऔर जीत आपकी सोच पर निर्भर करती है। उनके अनुसार, वहईश्वर जो हमसे जुड़ा है, वह हमारे अंदर है और हमें उसे पहचानकर, अपने मन में दया, प्रेम और करुणा का भाव पालनाचाहिए।पतित उधारन भै हरन हरि अनाथ के नाथ। कहु नानकतिह जानिए सदा बसतु तुम साथ।अर्थात् ईश्वर पतितों काउद्धारक है, भय का नाश करने वाला और अनाथों का नाथ है।वह सदा हमारे साथ रहता है।उस समय मुगल शासक हिंदुओंका जबरन कन्वर्जन कर रहे थे। लोग डरे-सहमे और स्वयं कोअनाथ महसूस कर रहे थे। ऐसे में उन्होंने कहा, ईश्वर का स्मरणभय मुक्त करता है।
गुरु नानक ने ‘जपुजी’ में में ईश्वर के अनेक गुणों में से एक गुणको ‘निरभउ'(निर्भय) बताया था। इसलिए उसका साथ किभी भीव्यक्ति को निर्भय बनाता है। गुरु महाराज ने कहा-भै नासनदुरमति हरन कलि मैं हरि को नाम। निस दिन जो नानक भजैसफल होहि तिह काम ।।अर्थात् कलियुग में हरि का नाम भयका नाश करता है, दुरमतिको नष्ट करता है। जो इसे याद रखताहै, उसके सभी काम सफल हो जाते हैं। साथ ही, वह कहतेहैं-मद माइआ कै भइओ बावरो हरि जसु नहि उचरै। करि परपंचुजगत कउ डहकै अपनो उदरु भरै ।।अर्थात् जो व्यक्ति माया केमोह में अंधा होकर पागल हो गया है। वह परमात्मा की स्तुतिनहीं करता। ऐसा व्यक्ति केवल छल-कप्ट करके दुनिया कोधोखा देता है और अपने स्वार्थ के लिए अनैतिक कार्य करता है।अपनी रचनाओं में गुरु महाराज उस समाज की आलोचना करतेहैं, जहां व्यक्ति अपनी सुख-साधना में लिप्त होकर उच्चतरदायित्वों को भूल चुका था। वे बताते हैं कि माया के जाल मेंफंसा मन वेद-पुराण जैसे धार्मिक ग्रंथ तो सुनता था, पर जीवनमें उनका पालन नहीं करता। यानीवेद-पुरान साध मग सुनिकरि। निमष न हरि गुन गावै ।। दुरलभ देह पाई मानस कीबिरथा जनमु सिरावै ।। वे अपने शिष्य को चेतावनी देते हैं किऐसे मनुष्य दुर्लभ मानवजातिगए हैं। वे समाज में व्याप्तअंधविश्वास, जातिगत भेदभाव और के लिए प्राप्त दुर्लभता कीतरह होते हैं, जो अपने सत्य मार्ग से भटक धार्मिक कुप्रथाओंकी भी कटु आलोचना करते हैं। उनके अनु सच्चे ईश्वर के साथआत्मीयता स्थापित करनी चाहिए। उनका सत्य की ओर लौटनेके लिए मनुष्य को अपनी माया से मुक्त आज भी समानता, न्याय और आध्यात्मिक जागृति का आधार गुरु तेग बहादुर नेसंसार की नश्वरता पर विशेष बल दिया।उनका उद्देश्य यहसमझाना था कि उच्च आदर्शों के बिना सांसारिक सुख-भोगव्यर्थ है। उन्होंने सत्ता के अहंकार में डूबे शासकों को याददिलाया कि राम और रावण जैसे शक्तिशाली भी इस संसार मेंनहीं रहे। यह संसार और इसकी उपलब्धियां स्वप्नवत अस्थिरहैं और पृथ्वी का राज रेत की दीवार के समान है। अतःअभिमान निरर्थक है। दूसरी तरफ वे लोग हैं, जो सांसारिक मोहऔर लालसाओं में इतने डूबे हैं कि जीवन बचाने और इच्छाएंप्राप्त करने के लिए अपमान सहते हैं, अपना स्वाभिमान भूलजाते हैं। ऐसे लोगों में आत्मविश्वास और आत्म-सम्मान जगानेके लिए उन्हें छोटे मोहों से मुक्त करके यह समझाना आवश्यकहै कि यह भौतिक शरीर मिथ्या है, जबकि आत्मा ही वास्तविकसत्य है। सिख गुरु संसार त्यागने का उपदेश नहीं देते। वेसांसारिक दायित्वों का पालन करते हुए जीवन जीने का आग्रहकरते हैं।
उनके अनुसार, संसार मिथ्या तब होता है, जब व्यक्तिमाया में लिप्त होकर अपने व्यापक कर्तव्यों को भूल जाता है।उनके पितामह गुरु अर्जन देव ने उद्यम करने, धन कमाने औरईश्वर से जुड़ने का संदेश दिया, जिसमें कर्मठता और अध्यात्मका समन्वय है।गुरु तेग बहादुर का उद्देश्य व्यक्ति को उसमानसिक स्तर पर लाना था, जहां वह अपने लक्ष्य के लिएनिःसंकोच सर्वोच्च बलिदान कर सके और हंसते हुए मृत्यु काभी वरण कर सके। यह स्थिति तब आती है जब व्यक्तिदुख-सुख, भय, लोभ, मोह, मान-अपमान और क्रोध जैसेसांसारिक द्वंद्वों से मुक्त हो जाता है, सोने को मिट्टी के समानमानता है और उसके हृदय में माया की जगह ब्रह्म का वास होताहै। ऐसा साधक मृत्यु से नहीं डरता, क्योंकि वह जानता है कियह अटल है। गुरु तेग बहादुर जीवन की क्षणभंगुरता कोस्वीकार करते हुए लोगों को सत्य और उच्च आदर्शों की ओरउन्मुख होने का आह्वान करते थे। वे बार-बार ईश्वरीय शक्ति, जो व्यक्ति के अपने अंदर की ही शक्ति है, पर भरोसा रखने, उसे उत्पन्न करने का आग्रह करते थे। जीवन में एक स्थिति ऐसीआती है, जब व्यक्ति यह अनुभव करता है कि उसका बल छूटगया है, उस पर अनेक बंधन पड़ गए हैं और उसके सम्मुख कोईउपाय नहीं रह गया है। अपने एक दोहे में वे इसी तरह कीमनःस्थिति को उभारते हैं-बलु छुटकिउ बंधन परें कछु न होतउपाइ।कहु नानक अब ओट हरि गजि जिउ होहु सहाइ ।।फिरइस मनःस्थिति का समाधान करते हुए कहते हैं-बल होआ बंधनछुटे सम किछु होत उपाइ।नानक सब किछु तुमरै हाथ मै तुम हीहोत सहाइ ।।एक स्थिति ऐसी भी आती है, जब व्यक्ति कोसभी संगी-साथी बेसहारा छोड़कर चले जाते हैं-संग सखा सभतजि गए कोऊ न निबहिओ साथ।कहु नानक इह बिपत मै टेकएक रघुनाथ ।। ऐसी स्थिति में वे साधक को आश्वासन देते हुएकहते हैं-नामु रहिओ साधू रहिओ रहिओ गुरु गोबिंद । कहुनानक इह जगत में किन जपिओ गुरमंत ।।गुरु महाराज काउपदेश था कि निर्भय पद प्राप्त करने का एकमात्र मार्ग मन में’माया’ के स्थान पर ‘राम नाम’ को धारण करना है, जिससेसंकट मिटते हैं और ईश्वर का दर्शन होता है। ऐसा निर्भयसाधक होता है। इस प्रकार, गुरु तेग बहादुर के जीवन आदर्शोंने समाज को न किसी को भयभीत करता है और न स्वयंभयभीत सामाजिकता और ईश्वरीय सत्ता का समन्वयसिखाकर नई दिशा दी।



