रिंकू सिंह राही
लखनऊ : आज जो मीडिया में खबरें मिल रही हैं, वह पत्र दिनांक 26.03.2026 को ही हस्ताक्षर करके भेज दिया गया था। यह स्पष्ट कर दूं कि यह त्याग पत्र नहीं है बल्कि तकनीकी त्याग पत्र है, मतलब… एक offer type.. कि यदि दिव्यांग आरक्षण के उधार से ली गई (मतलब इस उधार को चुकाने का अतिरिक्त दायित्व), इस सेवा में मुझसे काम नहीं ले पा रहे हो तो पुरानी सेवा में ही भेज दो, वहां पर कम उधार होने से कम काम में ही संतुष्टि मिल सकेगी।*
इसलिए इस offer पत्र पर सरकार को निर्णय लेना है। मैं तो दोनों तरफ ही तैयार हूं। हालांकि इस प्रकार मैंने कुव्यवस्था से सीधा पंगा लिया है। देखते हैं कि कुव्यवस्था वाले लोग मिलकर क्या गलत करते हैं मेरे साथ? मेरा पूरा विश्वास है कि आने वाले समय में प्रत्यक्ष/अप्रत्यक्ष तरीके से कुछ तो गलत होगा ही। यदि जन दवाब अधिक पड़ा तो हो सकता है कि यह गलत होना थोड़े समय बाद हो।
किंतु मेरे लिए तो–
सब कुछ लुटाने की तमन्ना,
अब हमारे दिल में है।
देखना है जोर कितना,
बाजू –ए भ्रष्ट व्यवस्था में है।
चूंकि जैसा कि पिछली पोस्ट में बताया गया था कि cheap मीडियाबाजी से अच्छी बातें सामने नहीं आ पाती हैं, इसलिए उस पत्र पर कार्यवाही होने के लिए छोड़ दिया गया था। हालांकि आज IAS एसोसिएशन के ग्रुप में शेयर किया था कि उन्हें थोड़ा सा तो पता चले कि IAS सेवा क्यों अपनी प्रांसगिकता खोती जा रही है? योजना थी कि अगले तीन चार दिनों में यह पत्र यहां share किया जाता (इसकी hint भी दी थी पिछली पोस्ट में)।
लेकिन IAS एसोसिएशन के ग्रुप से सूचना leak हो गई और सूचना सतही बाहर आई और केवल TRP मात्र के लिए मीडियाबाजी शुरू, कुछ भी लिखकर, वह भी बिना पत्र पढ़े ही।
ऐसे में जो बिंदु मेरे द्वारा उठाए गए हैं, उन्हें वास्तविक तौर पर लाने के लिए बहुत से मीडिया के दौर में कुछ अच्छे मीडिया वालों/अन्य की जरूरत है, (यदि आपके परिचित में कोई हों हों तो आपसे अति विशेष अनुरोध है कि कृपया इन तक ये तीनों पत्र अवश्य पहुंचाएं), जो उठाए गए बिंदुओं पर चर्चा करके IAS PCS एवं अन्य समान सेवाओं में योगदान करने वाले अच्छी मानसिकता (कुछ तो बहुत अच्छी सोच के साथ आते हैं) वाले अधिकारियों के सद्मार्ग में बनने वाली दीवार को तोड़ा जा सके, जिससे कि उन्हें विवशतावश गलत रास्ते की ओर जाने का समझौता न करना पड़े। इसके साथ ही जो एक वाक्य बहुत ज्यादा प्रसिद्ध हो गया है– व्यवस्था/system ही खराब है। जबकि इतने वर्षों से मैं समझ पाया हूं कि जो system/व्यवस्था, संवैधानिक तरीके से बनी है, वह काफी सही है,कुछ कमियां हैं, उन्हें सही करने की भी व्यवस्था है। जबकि हमारा पाला जिससे पड़ता है वह व्यवस्था नहीं बल्कि कुव्यवस्था है। जिसे संवैधानिक व्यवस्था को ठेंगा दिखाने के लिए, इसके विपरीत जानबूझकर खड़ा किया गया है और दिन ब दिन मजबूत किया जा रहा है। बस यहीं से लड़ाई शुरू होती है अच्छे और बुरे लोगों में। अच्छे लोग संवैधानिक व्यवस्था को लागू करना चाहते हैं, और बुरे लोग उससे अलग हटने में बड़ा नुकसान पाते हैं और फिर मेरे जैसे लोग पहले भी attack झेले हैं और आगे भी झेलने के लिए तैयार हैं। (जिस तरह की कुव्यवस्था मजबूत है, यदि एकदम अलग post नहीं रख सके इस कुव्यवस्था से तो, या तो कुव्यवस्था ही खत्म होगी या फिर मैं ही खत्म). क्योंकि यदि व्यवस्था होती तो मेरी उठक बैठक की गलती के लिए या तो सजा देती या माफ करती, लेकिन अलग नहीं बैठाती (हालांकि वहां पर भी काम ढूंढ लिए गए मेरे द्वारा, जिनमें अड़चनों को भी बताया गया है)। मतलब कुव्यवस्था ने अपना कार्य किया और बिना कोई सजा दिए हुए ही अलग कर दिया– कारण कुव्यवस्था में कोई जवाबदेही नहीं है, जबकि व्यवस्था में सबसे बड़े पद वाले की भी जवाबदेही है, इसलिए डरते हैं ऊपर वाले लोग व्यवस्था से और use करते हैं स्थापित कुव्यवस्था का।
फिर वेतन देकर भी काम नहीं लेते और इस प्रकार सरकारी धन के दुरुपयोग पर शायद ही आज तक कोई audit आपत्ति आई हो।
इसमें IAS एसोसिएशन की भूमिका पर भी प्रश्न उठाए हैं। क्योंकि भ्रष्ट अधिकारियों के लिए यह एसोसिएशन सशक्त भूमिका में होती है जबकि देशहित में कार्य करने वाले किसी भी अधिकारी के पक्ष में यह एसोसिएशन शायद ही कभी दिखाई दी हो।
आदि।
चूंकि अभी मेरे पास पुरानी सेवा का विकल्प रूपी मध्यम मार्ग है और शायद एक लंबी लड़ाई करते हुए सेवा करने के बाद यहां आया हूं, तो इन दीवारों का खास अनुभव भी है, जिससे समझ पा रहा हूं कि कैसे मुझे भ्रष्ट तंत्र के साथ adjust करने वाला अधिकारी बनाने की बहुत ही चमत्कारिक कोशिश हो रही है कि यदि मेरे पास पुराना अनुभव न होता तो समझ ही नहीं पाता कि क्या हुआ और कैसे हो गया? इसलिए इन सब बातों को लिखकर whisteblowing का जोखिम सहर्ष लेने को तैयार हो गया।
शायद जब तक मैं समझ पाता, तब तक स्वंय दलदल में फंस जाता तो खुद की ही बुराई कैसे करता…. मतलब मैं भी इस भ्रष्ट तंत्र का एक हिस्सा हो जाता।
यकीन मानिए कि इन सेवाओं को join करने वाले अधिकतर लोग या कहें aspirants काफी अच्छी सोच और विजन के साथ आते हैं। तो उन्हें छद्म तौर पर बदलने वाली व्यवस्था को उजागर करके whisteblower का ही कार्य करने का प्रयास किया है। जिसमें मेरा नुकसान है, और इसी नुकसान के डर से दूसरे नहीं कर पाते हैं। जबकि शायद एक तो मेरे पास पुरानी सेवा का विकल्प है और दूसरा मेरी पिछली story मेरे साथ है, और तीसरा मुझे इन नुकसान से कम डर लगता है (पिछली सेवा में मात्र चार महीने में ही attack झेला था, जबकि पहले से ही आशंका थी और थोड़ा सा compromise… मतलब… बस नजर फेरनी थी भ्रष्टाचार से (ईमानदार रहते हुए नजर फेरने के लिए कोई रिश्वत न लेता या फिर सात आठ दिवस की छुट्टी लेने तक की पेशकश की गई थी.. मतलब ईमानदारी ही ईमानदारी)और मेरे ऊपर खतरा खत्म)। लेकिन मैं शायद सिर्फ ईमानदार नहीं हूं, वह छोटी सी चीज है। जबकि मैं संवैधानिक मूल्यों को संविधान बनाने वालों की मंशा के अपनाने एवं उनका अनुसरण करने के लिए हृदय से कटिबद्ध हूं। भले ही इसके लिए कुछ भी कुर्बानी क्यों न देनी पड़ें।
मतलब कोई तो चाहिए जो बता सके कि असली मुद्दा क्या है इस तकनीकी त्यागपत्र का (अनुरोध सहित)। क्योंकि जो गोलियों से नहीं डरा, क्या वह punishment posting से डरेगा? जबकि यह मात्र whistleblowing का एक बहुत ही छोटा सा बिंदु है, जिस पर ही सभी का ध्यान आकर्षित किया गया है। जबकि असली लक्ष्य…. पुनः–सरकारी सेवा में प्रवेश लेने वालों के लिए ऐसी व्यवस्था को सुनिश्चित कराना है, कि कोई भी भ्रष्ट व्यवस्था का भाग, धोखे में रहकर न बने, हालांकि यदि स्वेच्छा से भाग बनना चाहे तो बने।
इसके लिए पिछली पोस्ट में दिए गए दो पत्र और यहां पोस्ट किए गए पत्र को पढ़ना होगा…. लंबे पत्र हैं तो समय देना होगा… फिर चर्चा आरंभ की जाए इन पत्रों में उठते हुए बिंदुओं पर। मुझे तो बस विश्वास कायम रखना है आमजन का, जो भारतीय संविधान के प्रति अपनी ड्यूटी मानता हूं सरकारी नौकर होने के नाते।
इस चर्चा से मैं भी सीखूंगा। बाकी तो सब दिखावा ही होगा।



