शिवानी दुर्गा
मुरैना की पर्वतीय शृंखलाओं के बीच स्थित चौसठ योगिनी मंदिर अपनी बाहरी सादगी के भीतर एक गहरी, प्राचीन और रहस्यमयी विद्या को छुपाए हुए है। जो साधक इसकी ऊर्जा को महसूस करना जानते हैं, उन्हें यह स्थान किसी साधारण मंदिर की तरह नहीं, बल्कि तंत्र-विद्या के मौन और भूले-बिसरे विश्वविद्यालय जैसा प्रतीत होता है, जहाँ कभी शक्ति की 64 धाराएँ स्वतंत्र रूप से प्रवाहित होती थीं।
आज यहाँ प्रवेश करते ही कक्षों में शिवलिंग दिखाई देते हैं, परंतु यह इस स्थल का मूल स्वरूप नहीं है। सभी शोध संकेत स्पष्ट करते हैं कि इन कक्षों में पहले योगिनियों की मूर्तियाँ प्रतिष्ठित थीं, भिन्न-भिन्न शक्तियों, सिद्धियों और तांत्रिक ऊर्जा-स्तरों का प्रतिनिधित्व करने वाली। समय की आँधी, आक्रमणों और धार्मिक-सामाजिक उथल-पुथल ने इन मूर्तियों को विलुप्त कर दिया, पर उनकी आवृत्ति अभी भी पत्थरों में जीवित है। जो साधक ऊर्जा-संरचनाओं को पढ़ने की क्षमता रखते हैं, वे इन रिक्त कक्षों में भी अदृश्य स्पंदन को महसूस कर सकते हैं।
इतिहासकारों के अनुसार इस स्थल का राजकीय जीर्णोद्धार 1323 ईस्वी के आसपास हुआ। किंतु वास्तविक निर्माण का काल इससे भी पुराना, लगभग 10वीं-11वीं शताब्दी का माना जाता है। यही वह समय था जब उत्तर भारत में तंत्र, गणित, ज्योतिष और आकाशीय विज्ञान एक-दूसरे से जुड़े हुए थे और मंदिर केवल उपासना-स्थल नहीं, बल्कि विज्ञान और आध्यात्मिक प्रयोगशालाएँ भी होते थे। मितावली का यह गोलाकार मंदिर उसी परंपरा का जीवंत उदाहरण है।
इसका वृत्ताकार ढाँचा, 64 समान कक्ष, खुले आकाश के नीचे बना परिक्रमा–पथ, सूर्य की छाया को पकड़ने वाली दीवारें और मध्य में स्थित शिवालय, ये सभी संकेत बताते हैं कि यह केवल शक्तिपीठ नहीं, बल्कि कॉस्मिक आर्किटेक्चर है। जब मूर्तियाँ यहाँ थीं, तब हर कक्ष एक विशिष्ट ऊर्जा-कक्ष था। साधक परिक्रमा करता तो वह 64 भिन्न कंपन–क्षेत्रों से गुजरता। यह यात्रा बाहरी वृत्त की नहीं, बल्कि भीतर के ब्रह्मांड की होती थी। मध्य में स्थित शिवालय इस बात का प्रतीक है कि सभी योगिनियाँ, सभी शक्तियाँ अंततः शिव-तत्त्व में ही विलीन होती हैं।
आज मूर्तियाँ नहीं हैं, परंतु यह रिक्तता भी अपनी जगह पर गूढ़ है, मानो ज्ञान के पन्ने फट गए हों, लेकिन स्याही अभी भी अक्षरों की तरह हवा में तैर रही हो। कभी तंत्र-गुरुकुल रहे इस स्थान का मौन आज भी साधक से संवाद करता है। जब आप इन कक्षों में खड़े होते हैं, तो आप दीवारों में छिपे प्राचीन अनुष्ठानों की प्रतिध्वनि को महसूस कर सकते हैं। यह स्थल बताता है कि ज्ञान नष्ट नहीं होता, वह रूप बदलकर समय की तहों में छिप जाता है, पर अपने संवेदनशील साधक की प्रतीक्षा करता रहता है।
मुरैना का चौसठ योगिनी मंदिर आज भी शोधकर्ताओं और साधकों दोनों के लिए एक ऐसा तीर्थ है जहाँ इतिहास, शक्ति और विज्ञान एक दूसरे में गुंथकर खड़े हैं। यह केवल वास्तुकला नहीं, एक जीवंत यंत्र है, एक मौन विश्वविद्यालय है, और एक अमिट स्मृति है उस तंत्र-साधना की, जो सदियों पहले यहाँ अपने उच्चतम रूप में सम्पन्न होती थी।
(लेखिका तंत्र साधक और तंत्र विषय की शोधार्थी हैं)



