मुरैना का किसान सम्मेलन बना भाजपा की अंदरूनी लड़ाई का मंच

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अर्पित शर्मा

मुरैना:- हाल ही में मुरैना जिले में भारतीय किसान उर्वरक सहकारी लिमिटेड (IFFCO) द्वारा एक “विशाल किसान सम्मेलन” आयोजित किया गया। इसके साथ ही 15 से 17 मार्च तक किसानों के लिए स्वास्थ्य विभाग के सहयोग से निशुल्क नेत्र परीक्षण एवं ऑपरेशन शिविर भी लगाया गया।
कार्यक्रम में इफको के अध्यक्ष दिलीप संघाणी मुख्य रूप से उपस्थित रहे। मंच पर नरेंद्र सिंह तोमर (विधानसभा अध्यक्ष), सांसद शिवमंगल सिंह तोमर, महापौर शारदा सिंह, जिला पंचायत अध्यक्ष आरती सिंह, विधायक सरला रावत, कलेक्टर अशीष जांगिड़ सहित कई जनप्रतिनिधि मौजूद रहे।
हालांकि, हैरानी की बात यह रही कि कृषि विभाग के अंतर्गत आने वाले इस आयोजन में प्रदेश के कृषि मंत्री ऐंदल सिंह कंसाना अनुपस्थित रहे, जबकि वे स्वयं इसी जिले की सुमावली विधानसभा से विधायक हैं।

*कृषि मंत्री की गैरमौजूदगी उठाती है कई सवाल*
किसान सम्मेलन जैसे महत्वपूर्ण कार्यक्रम में कृषि मंत्री की गैर मौजूदगी अब कई सवाल खड़े कर रही हे, कहा यह भी जा रहा हे कि जिले में दो बाहुबली नेता होने की वजह से वह जनता के सामने एक – दूसरे के वर्चस्व को बढ़ने नहीं देना चाहते।

अभी तक भाजपा में चंबल क्षेत्र पर सिर्फ नरेंद्र सिंह का वर्चस्व रहा हे यहां तक कि हर छोटे बड़े निर्णय भी उन्हीं से पूछकर लिए जाते थे मगर पिछले चुनावों में पार्टी ने जहां मुरेना जिले से नरेंद्र सिंह को विधानसभा अध्यक्ष बनाया वही दूसरी ओर इसी जिले की सुमावली विधानसभा से जीते ऐंदल सिंह को कृषि मंत्री के पद से नवाजा। ऐसे में दोनों नेताओं और उनके समर्थकों के बीच प्रतिस्पर्धा की स्थिति बनती दिख रही हे। या यू कहे कि दोनों के अहम अब आपस में टकरा रहे हे।

*क्या भाजपा में ‘बाहरी’ का भाव अभी भी मौजूद है?*
2020 के लगभग तत्कालीन कमलनाथ सरकार से नाराज होकर कई सारे लोगों ने सिंधिया के साथ कांग्रेस छोड़ भाजपा का दामन थाम लिया और उसी के चलते कुछ समय बाद ऐंदल सिंह भी कांग्रेस छोड़ भाजपा में शामिल हो गए जबकि ऐंदल सिंह की राजनीतिक शुरुआत बसपा से वर्ष 1993 से विधायक बनने से हुई और वह 1998 में फिर बसपा से विधायक बने। इसके बाद उन्होंने कांग्रेस का दामन थाम वर्ष 2008 एवं 18 में विधायक बने इसके बाद उन्होंने सिंधिया का साथ दिया और भाजपा का दामन थाम कृषि मंत्री बने। इसके बाद 2023 के विधानसभा चुनावों में दोबारा चुनाव जीतकर वह कृषि मंत्री बने यानी वह अभी तक 5 बार विधायक रहे हे और राजनीति का अच्छा अनुभव रखते हैं, उनके ही विभाग के कार्यक्रम में उन्हें आमंत्रित न किया जाना यह संकेत देता है कि पार्टी के भीतर अब भी उन्हें पूरी तरह स्वीकार नहीं किया गया है, या फिर स्थानीय नेतृत्व के बीच खींचतान जारी है। या फिर भाजपा के बड़े नेता नहीं चाहते कि कंसाना के कद के सामने उनकी अहमियत पार्टी के आला कमान के सामने घटे।

*अधिकारियों की मुश्किलें बढ़ीं*
सूत्रों के अनुसार अधिकारियों के स्वीकार किया कि कृषि मंत्री को निमंत्रण नहीं भेजा गया,जिसके चलते वह काफी नाराज हो गए।
बताया जा रहा हे कि मंत्री जी ने अधिकारियों को खूब खरी खोटी सुनाई और गुस्से में आपा खोते हुए उन्होंने यहां चेतावनी तक देदी की अबसे अगर मेरी विधानसभा में तुम लोग नजर आए तो तुमको जूतों की माला पहनाकर घुमाऊंगा।

अधिकारियों का कहना है कि वे राजनीतिक दबाव के बीच फंसे हुए हैं और उन्हें “ऊपर” के निर्देशों का पालन करना पड़ता है।

*गुटबाजी भाजपा के लिए खतरे की घंटी?*
जहां भाजपा एक ओर अपनी राजनीतिक विजय पताका को अश्वमेध यज्ञ की तरह चहुं ओर फैला रही है, वहीं दूसरी ओर नेताओं के बीच बढ़ती गुटबाजी पार्टी के लिए चिंता का विषय बन सकती है।

मालवा में कैलाश विजयवर्गीय की नाराजगी, महाकौशल में प्रहलाद पटेल की नाराजगी अभी तक शांत नहीं हुई थी कि अब चंबल में नरेंद्र सिंह तोमर व ऐंदल सिंह कंसाना के बीच उभरती खींचतान संकेत दे रही है कि आंतरिक संतुलन बनाए रखना पार्टी नेतृत्व के लिए चुनौती बनता जा रहा है।

वहीं इस तरह पार्टी नेताओं का यूं सामने आकर मनमुटाव या गुटबाजी दिखाना पार्टी हित को नुकसान पहुंचा सकता है, अगर समय रहते इस तरह की अंदरूनी खींचतान पर ध्यान नहीं दिया गया, तो इसका असर आने वाले चुनावों में देखने को मिल सकता है। संगठन की मजबूती के लिए नेताओं के बीच समन्वय और संतुलन बेहद जरूरी है।

प्रदेश की चारों दिशाओं में दिखती गुटबाजी अब नए प्रदेश अध्यक्ष खंडेलवाल के लिए कांटों का ताज बनी हुई है इस से कैसे वह लड़ेंगे अब यह तो वही जाने।

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