नेशनल दस्तक पत्रकारिता नहीं, करता है’धंधा’

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दीपक पांडेय

‎दिल्ली। मेरी पहली ही नौकरी नेशनल दस्तक में थी और मैं यहां का पहला फाउंडर जूनियर सब एडिटर बना। मतलब इस मीडिया कंपनी में जुड़ने वाला मै पहला जूनियर सब एडिटर था। इसी चैनल के उद्घाटन पर पहली बार रविश कुमार से मिला। आप जब इसके उद्घाटन का वीडियो देखेंगे तो इसमें मेरा भी नाम लिया गया है।

‎पर यहां का इतना जहरीला माहौल था कि पहले ही दिन से उल्टी आने लगी। मैं फरीदाबाद से दिल्ली इसे ज्वाइन करने आ रहा था, मेरे लिए तब दिल्ली बिल्कुल नई थी। कुछ नहीं जानता था मैं  Delhi के रूट आदि के बारे में। रास्ता भटक गया।

‎10 बजे की बजाय 10.30 बजे पहुंचा। पहले ही दिन आंबेडकरवाद और सामाजिक न्याय के मसीहा संपादक जी ने मुझको वेलकम में ही काफी खरी खोटी सुना दी। मैं तो बस शॉक्ड था। ये एकदम से नया नया था। पहले ही दिन डांट।

‎तब जबकि किसी अन्य मीडिया समूह में कभी भी ऐसा नहीं होता। क्योंकि उसके बाद मैं कई बड़े मीडिया समूह के साथ काम किया। वहां तो बकायदा से हंसते मुस्कराते हुए वेलकम होता है।

‎खैर, दो महीना भी इनके साथ काम करना मुहाल हो गया। मैं शायद दुनिया का पहला ऐसा व्यक्ति रहा हूं, जो पहले ही दिन से पहली ही जॉब में सबसे पहले दूसरी जॉब ढूंढने लगा।

‎जब दो महीने तक कोई नई जॉब नहीं मिला, तो नेशनल दस्तक में 14 दिन की सैलरी छोड़कर गांव वापस प्रयागराज चला आया। मैने अपने घर वालों को भी नहीं बताया कि मैने जॉब छोड़ दी।

‎करीब हफ्ते भर गांव में रहा। उसी दौरान एक इंटरव्यू के लिए काल आया। फिर दोबारा दिल्ली आ गया। इंटरव्यू दिया और संयोगवश मेरा सलेक्शन हो भी गया। लेकिन मुझे मेरी 14 दिन की सैलरी याद थी, जो नेशनल दस्तक के साथ काम किया था। मैं उसी दिन शाम को उनसे बकाया सैलरी लेने के लिए पहुंच गया।

‎पहले दिन उन्होंने सैलरी देने से साफ मना कर दिया और बोला – तुमने (वहां आपने कहने का चलन नहीं था) बिना बताए जॉब छोड़ दिया। इसलिए तुमको कुछ नहीं मिलेगा। मैने भी कहा – क्यों, नहीं मिलेगा?

‎अभी तो मैं तीन महीने के प्रोबेशन पीरियड पर था। जब आप अपनी सेवा शर्तों के अनुसार बिना किसी सूचना के इस दौरान मुझे कंपनी से बाहर निकालने पर सिग्नेचर करवाएं हैं, तो मुझे भी तीन महीने तक बाहर निकलने के लिए आपको बिना कुछ बताए बाहर निकलने का अधिकार है। आपको मेरी सैलरी देनी ही होगी। चाहे जो कुछ हो जाए।

‎यह अधिकार आदि वाली थेथरई मैने इन्हीं के साथ दो महीने तक काम करते हुए सीखी थी और उनके ही लॉजिक से मेरा इस बात को लेकर वहां खूब विवाद हुआ। मैने कहा – मैं बिना सैलरी लिए वापस नहीं जाऊंगा। आपको देना ही होगा।

‎फिर उन्होंने दूसरे दिन आने को बोला और मैं दूसरे दिन आकर सैलरी लेकर ही गया। लेकिन फिर भी इन्होंने मेरे पूरे 14 दिन की सैलरी नहीं दी। केवल 7 दिन की ही दी। मैने भी मन ही मन ही कहा – जहां एक दिन की भी मिलने की उम्मीद नहीं थी, तो यहां यार.. भागे भूत की लंगोटी ही सही। इन्हीं से सीखी थेथरई, कुछ तो काम आया।

‎मैं शायद मीडिया का पहला भी ऐसा आदमी रहा होऊंगा, जो 90 फीसदी की अधिकार की हिस्सेदारी का नारा लगाने वालों से अपना 50 प्रतिशत अधिकार लड़के वसूल लिया। बिल्कुल भी विक्टिम कार्ड नहीं खेला।

‎मैं बता दूं कि इनका सिंगल प्वाइंट एजेंडा है। थेथरई करना, विक्टिम कार्ड खेलना और वंचितों और गरीबों की भावनाओं का दोहन करते हुए समाज और सरकार को ब्लैकमेल करना।

‎अगर पत्रकारिता की आड़ में ब्लैकमेलिंग के कारोबार को चलाने का कोई आदर्श उदाहरण देखना हो, तो वह यहां जैसे मीडिया संस्थानों में देखा जा सकता है। यहां काम करने वाले खुद को पत्रकार कहने वाले दलालों को देखा जा सकता है।

‎इस नेशनल दस्तक चैनल का आप लोगो देखिए, इसमें आपको नीले बैकग्राउंड के साथ लाल रंग का चक्र दिखेगा। इसी से इनकी विचारधारा समझा जा सकता है। नीला बैकग्राउंड वामसेफियों के वामन मेश्राम जैसे जहरीले लोगों का प्रतीक है, तो लाल रंग पत्रकारिता की आड़ में छिपे वामपंथियों की कलुषित विचारधारा का संचालक, जिसका काम खबरों के नाम पर उन्हें अपने एजेंडे के हिसाब से मैनिपुलेट करना और समाज में खाई पैदा करना है।

‎अगर आपको लगता है कि ये पत्रकारिता कर रहे तो आप बड़ी भूल में हैं। इनके लिए अपने फायदे के लिए दूसरे वर्ग के लोगों पर जहरीली जबान का इस्तेमाल करना न्यू नार्मल है। धंधा है। क्योंकि इससे क्लिक बेट के साथ साथ फंड भी अच्छा खासा मिलता है। इनकी स्थापना ही प्रोपोगेंडा के लिए होता है।

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