न्यूयॉर्क टाइम्स द्वारा आर.एस.एस. संबंधी भ्रामक व पूर्वाग्रह से ग्रसित लेख पर प्रतिवाद

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प्रवीण जैन 
दिल्ली : न्यूयॉर्क टाइम्स द्वारा प्रकाशित हालिया लेख में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को जिस प्रकार *हिन्दू वर्चस्ववाद, अल्पसंख्यक-दमन और असहिष्णु राजनीतिक परियोजना* के रूप में चित्रित किया गया है, वह तथ्यों, साक्ष्यों और संगठन की वास्तविक बहुआयामी भूमिका के विपरीत एक पक्षपातपूर्ण विमर्श है। लेख में प्रयुक्त भाषा, चयनित उदाहरण और अनुपस्थित तथ्य यह दर्शाते हैं कि निष्कर्ष पहले से निर्धारित थे और घटनाओं व कथनों को उसी ढाँचे में समायोजित किया गया। न्यूयॉर्क टाइम्स पहले भी भारत व भारत सरकार के विरुद्ध प्रोपेगेंडा आधारित लेख छापता रहा है और यह लेख भी उसी कड़ी में से एक है। अल्पसंख्यक हितों की बात करने वाले केवल एक विशेष समुदाय को ही अल्पसंख्यक की परिभाषा में रखते हैं, यह बात इस प्रोपेगेंडा लेख से सिद्ध होती है।

आर.एस.एस. की विचारधारा सांस्कृतिक राष्ट्रनिर्माण, सामाजिक समरसता, सेवा, आत्मनिर्भरता और राष्ट्रीय एकता पर आधारित है। देश के हज़ारों सेवा-प्रकल्प, आपदा-राहत कार्य, शिक्षण-संस्थाएँ, ग्राम-विकास कार्यक्रम तथा सामाजिक सद्भाव के प्रयास इस संगठन की दशकों पुरानी धारा हैं, जिन्हें लेख में पूरी तरह अनदेखा किया गया। कुछ स्थानिक घटनाओं या तत्वों के आधार पर सम्पूर्ण संगठन की नीयत और चरित्र को हिंसा, असहिष्णुता और वर्चस्ववाद के पर्याय के रूप में प्रस्तुत करना न तो प्रामाणिक पत्रकारिता है, न ही न्यायपूर्ण विश्लेषण।

जहाँ भारतीय न्यायपालिका के निर्णय, लोकतांत्रिक जनादेश और संवैधानिक नीतियों को *“धर्मनिरपेक्षता के क्षरण”* के रूप में व्याख्यायित किया गया, वहीं बहुसंख्यक पहचान की किसी भी सांस्कृतिक अभिव्यक्ति को *अल्पसंख्यक-विरोधी परियोजना* के रूप में निरूपित किया गया। यह दृष्टिकोण भारत की जटिल ऐतिहासिक-सामाजिक संरचना, संवैधानिक सुरक्षा-कवचों और विविधता-समन्वय की परंपरा से असंगत है।

हम यह रेखांकित करना आवश्यक समझते हैं कि *भारतीय बहुलतावाद और सांस्कृतिक पहचान का उभार, लोकतंत्र-विरोधी या अल्पसंख्यक-विरोधी नहीं है।* पत्रकारिता का दायित्व भय-कथाओं का पुनरुत्पादन नहीं, बल्कि तथ्य, सन्दर्भ और संतुलन सुनिश्चित करना है।

न्यूयॉर्क टाइम्स का यह आलेख न तो भारत के सामाजिक यथार्थ का परिपूर्ण चित्र प्रस्तुत करता है, न ही संघ की वैचारिक और संगठनात्मक वास्तविकता को। हम आशा करते हैं कि भविष्य में ऐसी रिपोर्टिंग में तथ्यों, आँकड़ों और स्वतंत्र स्रोतों का संतुलित उपयोग सुनिश्चित किया जाएगा, जिससे संवाद और समझ को प्रोत्साहन मिले — न कि पूर्वाग्रहों को।

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