डाॅ. चन्द्र प्रकाश सिंह
दिल्ली । ब्राह्मण के विरोध में एक नया ज्वार आया है। आज हिन्दू शास्त्रों को मिथ (काल्पनिक) घोषित करने वाले एक विशेषज्ञ का लेख पढ़ रहा था, जिसमें उन्होंने बताया है कि पंद्रह सौ वर्ष पूर्व भारत में कोई ब्राह्मण नहीं था, हड़प्पा काल में भी भारत में कोई ब्राह्मण नहीं था। ब्राह्मण अपना घोड़ा लेकर यूरेशियाई देश से भारत आया और सूर्य के रथ में उन घोड़ों को जोत दिया। यही नहीं ब्राह्मण शेर भी भारत के बाहर से लाया था, जिसके ऊपर न केवल अपनी दुर्गा देवी को बैठा दिया, बल्कि उस दुर्गा से देशी भैंसे को मरवा दिया और देशी हाथी को शेर से कुचलवा दिया। उनका पूरा निहितार्थ यह था कि बहुत ही चालाकी से ब्राह्मण ने यहाँ के देशज प्रतीकों को अपने प्रतिमानों के साथ जोड़कर भारत में ब्राह्मणवाद फैला दिया।
यह बातें उन्हें बहुत अच्छी लगेंगी जिनके चिन्तन में जातिवाद के घेरे के अतिरिक्त और कोई विचार नहीं है और जिनके लिए जातियाँ राजनीतिक दांव-पेच की आधार ही नहीं हैं, बल्कि उनके लिए जाति के अतिरिक्त हमारे सांस्कृतिक चिन्तन में कुछ और है ही नहीं। बहुत लोग तो उनकी बातों का उद्धरण देकर यह भी बता देंगे कि जातियाँ को तो ब्राह्मणों ने ही बनाया है। आज कल ऐसे विचारक हिन्दू राष्ट्र के महारथियों को भी बहुत भाने लगे हैं।
लेकिन यह विषय जातियों का नहीं है, केवल एक जाति को लक्ष्य बनाकर यह हिन्दू संस्कृति के सम्पूर्ण चिन्तन और मेधा को मिथ्या और काल्पनिक घोषित करने की एक कुचेष्टा है।
जिस हड़प्पा सभ्यता की बात उन्होंने की है उसी में एक ऐसा चित्रांकन प्राप्त हुआ है, जिसमें दो पक्षी एक ही वृक्ष पर बैठे हुए हैं, उनमें से एक फल खा रहा है और दूसरा चुपचाप बैठा हुआ है। यह चित्र परमात्मा और जीवात्मा की अवस्था का वह चित्रण है जिसका वर्णन मुण्डकोपनिषद् के “द्वा सुपर्णा सयुजा सखाया” मंत्र में किया गया है।
उपनिषदों में ब्राह्मण शब्द का अनेक स्थानों पर उल्लेख आता है। वहाँ ब्राह्मण का अर्थ कोई जाति नहीं बल्कि अवस्था है।उपनिषदों में ‘ब्राह्मण’ का अर्थ जाति नहीं, बल्कि परमतत्व (ब्रह्म) और उस परम तत्व को जानने वाले ज्ञानी व्यक्ति दोनों के अर्थ में किया गया है।
तैत्तिरीयोपनिषद् में “आनन्दं ब्रह्मणो विद्वान्। न बिभेति कुतश्चनेति।” अर्थात् ब्रह्म के आनन्द को जानने वाला किसी से भयभीत नहीं होता। यहाँ ब्रह्मण का अर्थ पूर्ण व्यापक सनातन सत्ता से है। ऐसे ही बृहदारण्यक उपनिषद् में परमसत्ता के लिए तथा उसको जानने वालों के लिए ब्राह्मण शब्द प्रयोग किया गया है। छान्दोग्य उपनिषद् में तो सत्यकाम को केवल सत्य बोलने के आधार पर ब्राह्मण मान लिया गया।
ब्राह्मण जाति नहीं मानव की वह अवस्था है जो पूर्ण व्यापकता के साथ एकाकार थी, फिर ऐसे लोगों का समूह एक वर्ण के रूप में चिह्नित किया गया और बाद में वह वंशानुगत रूप में परिवर्तित होकर जाति बन गया।
आज इस आक्रमण का लक्ष्य केवल आज की वंशानुगत ब्राह्मण जाति नहीं है, बल्कि यह ब्रह्मतत्व, ब्रह्मबोध और भारतीय मेधा के उस शिखर पर आक्रमण है जो मानव चिन्तन की पूर्णता को अभिव्यक्त करती है। यह एक व्यापक चिन्तन को जाति के रूप में खड़ा कर सम्पूर्ण संस्कृति को लांक्षित करने की एक कुचेष्टा है।



