विप्लव विकास
कोलकाता: पश्चिम बंगाल के मालदा जिले का मोथाबाड़ी क्षेत्र 1 अप्रैल को उस भयानक सच्चाई का गवाह बना जिसे ‘सेकुलर’ राजनीति का चश्मा पहनने वाले अक्सर अनदेखा कर देते हैं। न्यायपालिका के सात अधिकारियों को, जिनमें महिला अधिकारी भी शामिल थीं, 9 घंटों तक उन्मादी भीड़ के बीच बंधक बने रहना पड़ा। यह केवल कानून-व्यवस्था की विफलता नहीं है, बल्कि यह उस भीड़ तंत्र का भारतीय संवैधानिक प्रक्रिया और न्याय व्यवस्था पर आक्रमण था जिसने पश्चिम बंगाल में कानून के शासन की जगह भीड़ के शासन की सच्चाई सबके सामने ला दिया है। आज समय आ गया है कि इस मुद्दे पर बिना किसी लाग-लपेट के बात किया जाए, क्योंकि अब पानी सिर के ऊपर से गुजर चुका है।
इस पूरे घटनाक्रम की जड़ में वह ‘अदृश्य जनसांख्यिकीय युद्ध’ है, जिसे पिछले कुछ दशकों से सुनियोजित तरीके से पश्चिम बंगाल की सीमावर्ती जिलों में लड़ा जा रहा है। चुनाव आयोग द्वारा मतदाता सूची के शुद्धिकरण की प्रक्रिया के दौरान जब लाखों संदिग्ध नामों को हटाया गया, तो अचानक सड़कों पर उतरा यह आक्रोश स्वतःस्फूर्त नहीं था। यह उस वोट-बैंक की छटपटाहट थी जिसे पहले वामपंथियों तथा अब तृणमूल कांग्रेस ने अपने राजनीतिक अस्तित्व के लिए ढाल बनाया है। जब ‘घुसपैठियों’ और ‘संदिग्ध नागरिकों’ के हाथ से लोकतंत्र को हाईजैक करने का हथियार छीना जाने लगा, तो उन्होंने लोकतंत्र के रक्षक न्यायिक अधिकारियों पर ही हमला बोल दिया। यह सीधे तौर पर भारतीय गणराज्य की संप्रभुता को चुनौती है।
ममता बनर्जी की सरकार और उनके प्रशासन की भूमिका यहाँ संदेहास्पद ही नहीं, बल्कि स्पष्ट रूप से एक पक्षीय दिखाई देती है। टीएमसी का राजनैतिक संरक्षण इन तत्वों को यह एहसास दिलाता है कि वे कानून से ऊपर हैं। जब मुख्यमंत्री स्वयं ऐसे संवेदनशील समय पर संवैधानिक संस्थाओं जैसे चुनाव आयोग पर हमलावर होती हैं, तो जमीन पर बैठे दंगाइयों को यह स्पष्ट संदेश जाता है कि राज्य सत्ता उनके पीछे खड़ी है। यह ‘मौन समर्थन’ और प्रत्यक्ष उकसावा ही है जिसने मालदा और मुर्शिदाबाद जैसे जिलों को ऐसे टापुओं में तब्दील कर दिया है जहाँ भारत का संविधान नहीं, बल्कि मजहबी और राजनीतिक गुंडागर्दी का राज चलता है।
यहाँ सबसे बड़ा प्रश्न पश्चिम बंगाल के आम हिंदू मतदाता के विश्वास का है। 2021 के चुनाव के बाद जो वीभत्स रक्तपात हुआ, जिस तरह से हजारों हिंदू परिवारों को पलायन के लिए मजबूर किया गया और माताओं-बहनों की मर्यादा को तार-तार किया गया, उसकी टीस आज भी बाकी है। मोथाबाड़ी की घटना ने उस पुराने घाव को फिर से हरा कर दिया है। एक आम हिंदू मतदाता आज स्वयं से पूछ रहा है “अगर प्रशासन सात न्यायिक अधिकारियों को सुरक्षा नहीं दे सकती, तो क्या वह मुझे मेरे घर से बूथ तक जाने की सुरक्षा दे पाएगी? क्या मतदान के बाद इस जिहादी भीड़ से हमें बचाने हेतु ये शासन इच्छुक हैं?” यह डर ही वह हथियार है जिसका उपयोग तृणमूल और उसका ‘खास’ वोट बैंक करना चाहता है ताकि बहुसंख्यक समाज भयवश घरों में दुबका रहे और ‘डेमोग्राफिक इंजीनियरिंग’ और ‘सांइटिफिक रिगिंग’ के माध्यम से सत्ता पर कब्जा बरकरार रहे।
अब समय आ गया है कि पश्चिम बंगाल की कानून-व्यवस्था को लोह-हस्त से नियंत्रित किया जाए। चुनाव आयोग, प्रशासन और केंद्र सरकार को यह समझना होगा कि पश्चिम बंगाल में अब ‘सॉफ्ट पावर’ या केवल शांति की अपीलों से काम नहीं चलने वाला। यहाँ ‘आपरेशन ब्लैक फारेस्ट’ जैसी प्रशासनिक दृढ़ता की आवश्यकता है। संदेश बिलकुल साफ होना चाहिए, जो हाथ कानून को चुनौती देंगे, उन्हें कानून की पूरी ताकत से कुचल दिया जाएगा। मोथाबाड़ी के गुनहगारों को ऐसी सजा मिलनी चाहिए जो अन्यान्य असामाजिक तत्वों के लिए नजीर बने। जो भी दबंग, गुंडे या सुपारी लेकर जन-मन में भय का वातावरण बनाने, भयमुक्त वातावरण में मतदान प्रक्रिया पूर्ण होने में और मतगणना के पश्चात हत्या और लूट करने में सक्षम है और जिनका ऐसा रिकार्ड रहा है उन्हें पांच मई तक थाने में बंद केंद्रीय बल की निगरानी में रखना चाहिए।
और पश्चिम बंगाल के हिंदू समाज को भी यह समझना होगा कि यह लड़ाई अब केवल बिजली, पानी या सड़क की नहीं है। यह लड़ाई हमारे अस्तित्व, हमारी संस्कृति और हमारी आने वाली पीढ़ियों के भविष्य की है। शेष भारत के लोगों को भी यह स्पष्ट होना चाहिए कि पश्चिम बंगाल पूरे भारत में बांग्लादेशी घुसपैठियों और आतंकियों के आवागमन का सुरक्षित द्वार बन गया है। इसलिए यहां की ममता सरकार सीमा पर बाड़ लगाने के काम को विलंबित करती रहती है।
मोथाबाड़ी की घटना यह चीख-चीख कर कह रही है कि यदि आज हिंदू समाज संगठित होकर अपने मताधिकार का प्रयोग करने बाहर नहीं निकला, तो कल शायद उनके पास अपना प्रतिनिधि चुनने का अधिकार ही न बचे। पश्चिम बंगाल के जो भी मतदाता राज्य से बाहर हैं उन्हें अपने घर लौट कर आना चाहिए। अपना मतदान अपने मतदान केंद्र पर अवश्य करना चाहिए। यह पश्चिम बंगाल के हिन्दुओं के अस्तित्व की लड़ाई का चुनाव है।
प्रशासन को यह सुनिश्चित करना होगा कि राज्य के हर संवेदनशील बूथ पर केंद्रीय बलों की इतनी भारी तैनाती हो कि उपद्रवी घर से बाहर निकलने की हिम्मत न कर सकें। निर्वाचन आयोग को यह स्पष्ट करना होगा कि वह किसी भी दबाव या भ्रम में नहीं आएगा और मतदाता सूची से हर एक अवैध नाम को हटाकर ही दम लेगा। यह केवल ‘शुद्धिकरण’ नहीं, बल्कि बंगाल के लोकतंत्र का ‘सांस्कृतिक पुनरुत्थान’ है। यदि इस चुनाव के बाद भी राज्य की सत्ता ‘तुष्टिकरण’ के मोहपाश में बंधी रही और जनसांख्यिकीय आक्रमणकारियों को राजनैतिक सुरक्षा कवच प्रदान करती रही, तो वह दिन दूर नहीं जब पश्चिम बंगाल के हिंदुओं को अपने ही आंगन में शरणार्थी बनकर रहना पड़ेगा। अब ‘प्रतीक्षा’ का समय समाप्त हो चुका है; अब ‘परिवर्तन हेतु पराक्रम’ का समय है। उन ताकतों पर लोकतांत्रिक प्रणाली से प्रहार करने का समय है जो भारत की अखंडता और पश्चिम बंगाल की अस्मिता को चुनौती दे रही हैं। शासन को ‘लोह-हस्त’ अपनाकर यह सिद्ध करना होगा कि लोकतंत्र की जड़ें किसी भीड़ की सनक से कहीं अधिक गहरी हैं। पश्चिम बंगाल के हिंदू मानस को भी अब भय की बेड़ियां तोड़कर, 2021 के जख्मों को अपनी शक्ति बनाकर बूथ तक पहुंचना होगा। याद रखिए, आपका एक वोट केवल एक विधायक नहीं चुनेगा, बल्कि यह तय करेगा कि आने वाली पीढ़ियां अपनी संस्कृति के साथ इस माटी पर जीवित रह पाएंगी या नहीं। अब और नहीं! अपराधियों को दंड मिले और न्याय की विजय हो, तभी बंगाल का वास्तविक ‘अमल धवल’ स्वरूप पुनः निखर पाएगा।



