-डॉ. मयंक चतुर्वेदी
भोपाल । भारतीय इतिहास का औपनिवेशिक काल सिर्फ राजनीतिक दासता का अध्याय नहीं है, यह तो उस सुनियोजित योजना का भी प्रतीक है जिसके माध्यम से ब्रिटिश साम्राज्य ने भारत की सामाजिक एकता, आर्थिक आत्मनिर्भरता और सांस्कृतिक निरंतरता को व्यवस्थित रूप से कमजोर करने का प्रयास किया। हम सभी जानते हैं कि यह प्रक्रिया अचानक नहीं हुई, अनेक प्रशासनिक निर्णयों, आर्थिक नीतियों, सामाजिक प्रयोगों और वैचारिक सिद्धांतों के माध्यम से धीरे-धीरे विकसित की गई। स्थायी बंदोबस्त से लेकर जाति-आधारित जनगणना और तथाकथित आर्य सिद्धांत तक, हर कदम एक बड़े औपनिवेशिक लक्ष्य का हिस्सा था, भारत को भीतर से विभाजित कर उस पर दीर्घकालिक नियंत्रण बनाए रखना।
यदि हम औपनिवेशिक नीतियों की शुरुआत पर दृष्टि डालें, तो ईस्ट इंडिया कंपनी के शासनकाल में लागू किया गया स्थायी बंदोबस्त एक महत्वपूर्ण मोड़ था। इस व्यवस्था ने भारतीय कृषि संरचना को जड़ से बदल दिया। जमींदारों को भूमि का स्वामित्व देकर किसानों को उनके पारंपरिक अधिकारों से वंचित कर दिया गया। आर. सी. मजूमदार ने अपनी पुस्तक भारत का इतिहास (भारतीय विद्या भवन, पृष्ठ 321) में स्पष्ट किया है कि इस व्यवस्था ने ग्रामीण समाज में असमानता को स्थायी रूप दे दिया। परिणामस्वरूप किसान ऋणग्रस्तता, शोषण और निर्धनता के दुष्चक्र में फंस गए। यह केवल एक आर्थिक नीति नहीं थी, बल्कि ग्रामीण भारत को कमजोर करने की एक दीर्घकालिक रणनीति थी।
इसी प्रकार ब्रिटिश शासन ने भारतीय उद्योगों को भी योजनाबद्ध ढंग से नष्ट किया। भारत, जो कभी विश्व का प्रमुख वस्त्र-निर्माता था, उसे कच्चे माल का आपूर्तिकर्ता बना दिया गया। आर. सी. दत्त ने भारत का आर्थिक इतिहास (लोकभारती प्रकाशन, पृष्ठ 145) में लिखा है कि ब्रिटिश नीतियों ने भारतीय कुटीर उद्योगों को समाप्त कर दिया। ब्रिटेन में निर्मित वस्त्रों को भारत में खुले रूप से बेचा गया, जबकि भारतीय उत्पादों पर भारी कर लगाए गए। इससे न केवल आर्थिक ढांचा कमजोर हुआ, बल्कि लाखों कारीगर बेरोजगार हो गए।
औपनिवेशिक दमन का एक और कठोर रूप 1857 का स्वतंत्रता संग्राम के बाद देखने को मिला। इस महान विद्रोह ने ब्रिटिश शासन की नींव हिला दी थी, जिसके परिणामस्वरूप अंग्रेजों ने भारतीयों के प्रति अविश्वास और दमन की नीति अपनाई। वी. डी. सावरकर ने 1857 का स्वातंत्र्य समर (प्रभात प्रकाशन, पृष्ठ 402) में उल्लेख किया है कि विद्रोह के बाद भारतीयों को प्रशासन और सेना में सीमित कर दिया गया तथा नस्लीय भेदभाव को बढ़ावा दिया गया। यह स्पष्ट संकेत था कि ब्रिटिश शासन अब केवल नियंत्रण बनाए रखने के लिए कठोर उपायों पर निर्भर था।
बीसवीं सदी के प्रारंभ में बंगाल विभाजन ने “फूट डालो और राज करो” की नीति को खुलकर सामने ला दिया। लॉर्ड कर्जन द्वारा किया गया यह विभाजन प्रशासनिक नहीं, बल्कि राजनीतिक और सामाजिक उद्देश्य से प्रेरित था। बिपिन चंद्र पाल ने राष्ट्रवाद के विचार (सरस्वती प्रकाशन, पृष्ठ 210) में इसे राष्ट्रीय एकता को तोड़ने का प्रयास बताया है। इस घटना ने भारतीय समाज में सांप्रदायिक विभाजन को बढ़ावा दिया और इसके विरोध में स्वदेशी आंदोलन का उदय हुआ।
इसी क्रम में रोलेट एक्ट और जलियांवाला बाग हत्याकांड जैसे घटनाक्रम ब्रिटिश शासन की दमनकारी प्रवृत्ति को उजागर करते हैं। महात्मा गांधी ने सत्य के प्रयोग (नवजीवन प्रकाशन, पृष्ठ 278) में रोलेट एक्ट को न्याय के विरुद्ध बताया, जबकि रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने जलियांवाला बाग की घटना को मानवता पर कलंक कहा। इन घटनाओं ने भारतीय जनमानस को झकझोर दिया और स्वतंत्रता आंदोलन को व्यापक समर्थन मिला, परंतु ब्रिटिश रणनीति केवल दमन तक सीमित नहीं थी; उन्होंने भारतीय समाज की आंतरिक संरचना को भी प्रभावित करने का प्रयास किया।
भारत की जनगणना 1871 से प्रारंभ होकर 1901 की जनगणना तक जाति-आधारित वर्गीकरण को संस्थागत रूप दिया गया। हर्बर्ट रिस्ले ने दि पीपल ऑफ इंडिया (केम्ब्रिज यूनिवर्सिटी प्रेस, पृष्ठ 51) में जाति को वैज्ञानिक रूप से वर्गीकृत करने की बात कही। इस प्रक्रिया ने भारतीय समाज की लचीली संरचना को कठोर बना दिया और जातीय पहचान को स्थायी रूप दे दिया। अंग्रेजों का उद्देश्य था कि जाति भाव भड़का कर भारतीय हिन्दुओं में आपसी वैमन्यता पैदा की जा सके और देखो! वे सफल भी हो गए।
जी. एस. घुर्ये ने कास्ट एंड रेस इन इंडिया (पॉपुलर प्रकाशन, पृष्ठ 23) में लिखा है कि ब्रिटिश जनगणना ने समाज की जटिलता को स्थिर रूप में बदल दिया। इसका परिणाम यह हुआ कि विभिन्न समुदायों के बीच प्रतिस्पर्धा और विभाजन की भावना बढ़ी, जिसे ब्रिटिश शासन ने अपने हित में उपयोग किया। इसका दुष्परिणाम आज भी हम झेल रहे हैं।
इसी प्रकार तथाकथित आर्य सिद्धांत का प्रयोग भी सामाजिक विभाजन को गहरा करने के लिए किया गया। मैक्स मूलर ने लेक्चर्स ऑन द साइंस ऑफ लैंग्वेज (लॉन्गमैन प्रकाशन, पृष्ठ 120) में स्पष्ट किया कि “आर्य” कोई नस्ल नहीं, बल्कि भाषा-समूह है। इसके बावजूद औपनिवेशिक व्याख्याओं में इसे नस्लीय रूप देकर भारतीय समाज को आर्य और अनार्य, उत्तर और दक्षिण जैसे विभाजनों में बांटने का प्रयास किया गया। स्वयं मैक्स मूलर भी इसमें अप्रत्यक्ष रूप से सहयोगी रहे, जिसके अनेक प्रमाण मौजूद हैं। जिसमें कि आगे वामपंथी इतिहासकारों ने जो किया, सो आज सभी के सामने आ ही चुका है।
बी. बी. लाल ने द सरस्वती फ्लोज ऑन (आर्यन बुक्स इंटरनेशनल, पृष्ठ 87) में उल्लेख किया है कि इस सिद्धांत का उपयोग यह दिखाने के लिए किया गया कि भारत सदैव बाहरी आक्रमणों से प्रभावित रहा है। इससे भारतीयों के बीच ऐतिहासिक अविश्वास की भावना को बढ़ावा मिला। अंततः, भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान ब्रिटिश शासन का दमन यह स्पष्ट कर देता है कि यह शासन किसी भी प्रकार से भारतीय हितों के अनुकूल नहीं था। डॉ. राजेन्द्र प्रसाद ने आत्मकथा (भारतीय ज्ञानपीठ, पृष्ठ 456) में लिखा है कि इस समय व्यापक गिरफ्तारियाँ कर जनता की आवाज को दबाने का प्रयास किया गया।
समग्र रूप से देखा जाए तो ब्रिटिश शासन की नीतियाँ एक सुविचारित औपनिवेशिक ढांचे का हिस्सा थीं, जिनका उद्देश्य भारत को आर्थिक रूप से निर्भर, सामाजिक रूप से विभाजित और राजनीतिक रूप से कमजोर बनाए रखना था। भूमि व्यवस्था, औद्योगिक विनाश, दमनकारी कानून, जातीय वर्गीकरण और वैचारिक सिद्धांत, ये सभी उसी रणनीति के विभिन्न आयाम थे।
इस ऐतिहासिक विश्लेषण से यह स्पष्ट होता है कि भारत की स्वतंत्रता सिर्फ राजनीतिक संघर्ष का परिणाम नहीं थी, यह सामाजिक एकता और सांस्कृतिक चेतना की भी विजय थी। औपनिवेशिक नीतियों ने जहाँ एक ओर भारत को गहरे संकट में डाला, वहीं दूसरी ओर उन्होंने भारतीय समाज को अपनी पहचान और एकता के महत्व को समझने का अवसर भी दिया। यही कारण है कि आज भी इन घटनाओं का अध्ययन इतिहास को समझने के साथ ही वर्तमान और भविष्य की दिशा तय करने के लिए भी अत्यंत आवश्यक माना जाता है।
घटनाएं अनेक हैं, जिसमें कि सबसे बड़ा भारत का विभाजन है। कोई योजना नहीं रही भारत विभाजन की, हिन्दुओं को डारेक्ट एक्शन के दौरान मरने के लिए छोड़ दिया गया, रियासतों को स्वतंत्र रख एक नया संकट खड़ा किया गया, लाहौर जैसे हिन्दू बहुल्य अनेक क्षेत्र पाकिस्तान को सौंप दिए गए। कहां तक गिनाएं अंग्रेजों के अपराध जो उन्होंने भारतीयों के विरोध में किए हैं।



