पश्चिमी उत्तरप्रदेश की सांस्कृतिक उपेक्षा, सरकारी ओर राजनीतिक उदासीनता का कठोर सच

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राहुल चौधरी नील
लखनऊ: उत्तर प्रदेश की पहचान उसकी बहुरंगी संस्कृति, ऐतिहासिक विरासत और लोक परंपराओं से बनती है, लेकिन यह पहचान जितनी व्यापक दिखाई जाती है, जमीनी हकीकत उतनी ही असमान और पक्षपातपूर्ण है। विशेष रूप से पश्चिमी उत्तर प्रदेश के संदर्भ में यह असंतुलन एक गहरी और लगातार चल रही सरकारी उपेक्षा का प्रमाण बन चुका है। वर्षों से यह अनुभव बार-बार इस बात की पुष्टि करता है कि राज्य का संस्कृति विभाग—जिससे उम्मीद की जाती है कि वह हर क्षेत्र की सांस्कृतिक धरोहर को संरक्षित और प्रोत्साहित करेगा—व्यवहार में पूरब से चलकर मथुरा के आगे बढ़ने को तैयार ही नहीं है।
मथुरा तक आते-आते मानो सांस्कृतिक उत्तर प्रदेश समाप्त हो जाता है। उसके आगे के जिले—सहारनपुर, शामली. मुजफ्फरनगर, बिजनौर, अमरोहा, बुलंदशहर, मुरादाबाद—सरकारी नजरों में जैसे किसी नक्शे पर दर्ज ही नहीं हैं। कभी कभी मेरठ को छू लिया जाता है l यह केवल एक भावनात्मक आरोप नहीं, बल्कि अनुभवों और लगातार दिखने वाले पैटर्न का निष्कर्ष है। सरकारी कार्यक्रमों की सूची उठाकर देख लीजिए, सांस्कृतिक उत्सवों की घोषणाओं पर नजर डाल लीजिए, या विभागीय सोशल मीडिया गतिविधियों को ही देख लें—हर जगह वही सीमित भौगोलिक दायरा दिखाई देता है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश जैसे राज्य के लिए “गैर-मौजूद” क्षेत्र में तब्दील कर दिया गया है।
यह उपेक्षा आकस्मिक नहीं है, बल्कि एक सुनियोजित प्रशासनिक मानसिकता का परिणाम प्रतीत होती है। सरकारी मशीनरी अक्सर उन्हीं स्थानों पर कार्यक्रम आयोजित करती है जहां पहले से संसाधन, पहचान और राजनीतिक महत्व मौजूद है। इससे एक तरह का सांस्कृतिक केंद्रीकरण पैदा होता है, जिसमें कुछ शहर लगातार और अधिक समृद्ध होते जाते हैं, जबकि अन्य क्षेत्र पूरी तरह उपेक्षित रह जाते हैं। सवाल यह है कि क्या संस्कृति केवल उन्हीं क्षेत्रों की संपत्ति है जो पहले से प्रसिद्ध हैं?  क्या हर जिले की लोक परंपराएं राज्य की सांस्कृतिक पहचान का हिस्सा नहीं हैं?
सरकारी उपेक्षा का सबसे खतरनाक पहलू यह है कि यह धीरे-धीरे सामान्य बना दी जाती है। जब वर्षों तक किसी क्षेत्र में कोई बड़ा सांस्कृतिक कार्यक्रम नहीं होता, जब स्थानीय कलाकारों को मंच नहीं मिलता, जब विभागीय योजनाएं वहां तक पहुंचती ही नहीं—तो यह स्थिति “सामान्य” बन जाती है। इससे न केवल कलाकार हतोत्साहित होते हैं, बल्कि पूरी पीढ़ी अपनी सांस्कृतिक जड़ों से कटने लगती है।
यह भी स्पष्ट है कि इस उपेक्षा के पीछे केवल प्रशासनिक कारण ही नहीं, बल्कि राजनीतिक प्राथमिकताओं की कमी भी जिम्मेदार है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश के जनप्रतिनिधियों से शायद ही कभी यह सवाल उठता है कि उनके क्षेत्र में सांस्कृतिक कार्यक्रम क्यों नहीं हो रहे।  व्यक्तिगत राजनीति केवल आंतरिक राजनीति में व्यस्त दिखती है l जबकि संस्कृति को एक गैर-जरूरी विषय मान लिया जाता है। यह दृष्टिकोण न केवल संकीर्ण है, बल्कि दीर्घकालिक रूप से समाज के लिए हानिकारक भी है। अगर जिला प्रशासन कोई आयोजन करना भी चाहे तो ये नेतागण अपने अपने अहम् के साथ ऐसे दूरी बनाते हैं …….
जब राज्य के कुछ हिस्सों को लगातार अवसर मिलते हैं और अन्य हिस्सों को नजरअंदाज किया जाता है, तो यह असमानता केवल सांस्कृतिक नहीं रहती, बल्कि सामाजिक असंतोष का कारण भी बनती है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश के लोगों में यह भावना गहराती जाएँगी कि उनकी पहचान, उनकी परंपराएं और उनकी प्रतिभाएं राज्य के लिए महत्वहीन हैं।
इस स्थिति को बदलने के लिए केवल सामान्य सुझावों से काम नहीं चलेगा। सबसे पहले, मंत्रालय को अपनी जवाबदेही तय करनी होगी। संस्कृति विभाग को यह स्पष्ट करना चाहिए कि पिछले वर्षों में पश्चिमी उत्तर प्रदेश में कितने कार्यक्रम आयोजित किए गए और भविष्य की क्या योजना है। पारदर्शिता के बिना सुधार की कोई उम्मीद नहीं की जा सकती।
दूसरा, सांस्कृतिक नीति में क्षेत्रीय संतुलन को अनिवार्य बनाया जाना चाहिए। यह केवल एक औपचारिक घोषणा न हो, बल्कि इसे लागू करने के लिए ठोस तंत्र विकसित किया जाए। हर जिले के लिए बराबर न्यूनतम सांस्कृतिक कार्यक्रमों की संख्या तय होनी चाहिए और उसकी नियमित समीक्षा होनी चाहिए।
तीसरा, स्थानीय स्तर पर सांस्कृतिक संस्थाओं और कलाकारों को सीधे समर्थन दिया जाए। यदि सरकार वास्तव में संस्कृति को बढ़ावा देना चाहती है, तो उसे बड़े शहरों के आयोजनों से बाहर निकलकर छोटे जिलों और कस्बों तक पहुंचना होगा।
अंततः, यह समझना आवश्यक है कि संस्कृति केवल उत्सवों और कार्यक्रमों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह समाज की आत्मा और उसकी पहचान का आधार है। जब सरकार किसी क्षेत्र की संस्कृति को नजरअंदाज करती है, तो वह केवल कार्यक्रमों की कमी नहीं पैदा करती, बल्कि उस क्षेत्र की आत्मा को कमजोर करती है।
पश्चिमी उत्तर प्रदेश की यह उपेक्षा अब केवल एक शिकायत नहीं रह गई है, बल्कि एक गंभीर प्रश्न बन चुकी है-क्या राज्य की सांस्कृतिक नीतियां वास्तव में समावेशी हैं, या वे केवल कुछ चुनिंदा क्षेत्रों तक सीमित हैं? जब तक इस प्रश्न का ईमानदारी से उत्तर नहीं दिया जाता और ठोस कदम नहीं उठाए जाते, तब तक यह असंतुलन बना रहेगा और एक बड़े क्षेत्र की सांस्कृतिक पहचान लगातार हाशिए पर धकेली जाती रहेगी।

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