कोलकाता । स्वाधीनता आंदोलन में डाक्टर की डिग्री लेकर राष्ट्र और समाज के लिये अपना जीवन समर्पित कर देने के उदाहरण तो अनेक हैं पर क्रांतिकारी आंदोलन में एक नाम ऐसा भी है जिन्हे पहले काला पानी का कारावास मिला फिर वे देश की प्रख्यात डाक्टर बनीं ।
यह नाम है डाक्टर सुनीति चौधरी का। उनका जन्म 22 मई 1917 को हुआ। वे अभी स्कूल की विद्यार्थी थीं कि उन्होंने मात्र 14 वर्ष की आयु में अपनी साथी शाँति घोष के साथ मिलकर 24 दिसम्बर 1931 को मजिस्ट्रेट बी जी स्टीवेंसन उनके कार्यालय में घुसकर गोली मारी। दोनों बालिकाओं ने मिलने की अनुमति मांगी और कमरे में पंहुचते ही गोली चला दी । निशाना अचूक था, स्टीवेंसन वहीं मर गया। दोनों वीर बालाएं गिरफ्तार कर ली गयीं । 27 फरवरी 1932 को उन्हें आजीवन कारावास की सजा घोषित करके कालापानी भेज दिया गया। इधर पुलिस ने परिवार पर अत्याचार किये जिसमें एक भाई की मौत हुई । परिवार बिखर गया । अंततः 6 दिसंबर,1939 को द्वितीय विश्व-युद्ध के पहले आम माफी की वार्ता के अंतर्गत वे रिहा हुईं ।
तब सुनीति 22 वर्ष की हो गई थीं । जेल से रिहा होकर उन्होंने पहले अपनी आजीविका के कयी काम आरंभ किये और जोरशोर से पढ़ाई आरंभ की । बंगाल के आशुतोष कॉलेज से प्री-यूनिवर्सिटी कोर्स प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण की और 1944 में मेडिसिन एंड सर्जरी में डिग्री के लिए कैम्पबेल मेडिकल स्कूल में प्रवेश लिया। डाक्टरी परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद क्रांतिकारी प्रद्योत कुमार घोष से विवाह कर लिया । विवाह के बाद चंदननगर बस गयीं और शीघ्र ही ख्याति प्रतिष्ठित डॉक्टर के रूप में हो गई । स्वतंत्रता के बाद डॉ. सुनीति घोष को कांग्रेस और कम्युनिस्ट दोनों राजनैतिक दलों की ओर से चुनाव लड़ने का प्रस्ताव आया पर उनकी रुचि राजनीति में नहीं थी वे पूरी तरह समाज की सेवा को समय देना चाहतीं थीं । और 12 जनवरी, 1988 को 71 वर्ष की आयु इस क्रांतिकारी महिला ने संसार से विदा ले ली ।



