पानी का हक: सांस जितना जरूरी, अब कानून में भी दर्ज हो!

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दिल्ली । विश्व जल दिवस है, 22 मार्च 2026 को। इस बार का मुद्दा है जल और लैंगिक समानता, Water and Gender।
मतलब साफ है, पानी की कमी सबसे ज्यादा औरतों और लड़कियों पर भारी पड़ती है।

दुनिया भर में जहां साफ पानी और शौचालय की कमी है, वहां असमानता और बढ़ती है, और सबसे ज्यादा बोझ महिलाओं पर।
लेकिन भारत में यह सिर्फ एक दिन की बात नहीं, यह रोज की जंग है। एक दिन भाषण, फोटो, पोस्टर, और फिर वही खामोशी। अब वक्त आ गया है कि हम चुप न रहें। सवाल सीधा है, पानी भीख है या हक?

हवा पर कोई मीटर नहीं, कोई टैक्स नहीं, कोई ताला नहीं। क्योंकि बिना हवा के जीवन खत्म। पानी भी तो उतना ही जरूरी है। बिना पानी के जीवन नहीं चलता। फिर क्यों पानी को बाजार में बेचा जा रहा है? बोतल में बंद, दाम लगाकर। जो अमीर है, वह खरीद लेता है। जो गरीब है, वह गंदा पानी पीकर बीमार पड़ता है, मौत के मुंह में जाता है। यह इंसानियत के खिलाफ है। पानी सार्वजनिक संपत्ति है, जन-धन है। इसे मुनाफे की चीज नहीं बनाया जा सकता।

सच कड़वा है। भारत में 18 प्रतिशत दुनिया की आबादी है, लेकिन सिर्फ 4 प्रतिशत मीठा पानी हमारे पास। करीब 60 करोड़ लोग उच्च से अत्यधिक जल-तनाव में जी रहे हैं। भूजल तेजी से खत्म हो रहा है।

हम दुनिया में सबसे ज्यादा भूजल निकालने वाले देश हैं। पानी की प्रति व्यक्ति उपलब्धता गिरकर 1400 घन मीटर के आसपास पहुंच गई है, जो जल-तनाव की सीमा से नीचे है। नदियां नाले बन चुकी हैं। हैंडपंप जहर उगलते हैं। शहरों में टैंकर माफिया राज करता है।

दिल्ली हो या लखनऊ, आगरा हो या मुरादाबाद, कहानी एक जैसी है। 40 प्रतिशत पानी पाइपलाइनों में लीक हो जाता है। मौसम बेकाबू, बेमौसम बारिश, झुलसाती गर्मी, कमजोर मानसून। यह सिर्फ पर्यावरण का मुद्दा नहीं रहा। यह अर्थव्यवस्था का संकट है, स्वास्थ्य का विस्फोट है, सामाजिक अस्थिरता का संकेत है।

सबसे ज्यादा चोट किसे लगती है? गरीब को, औरत को, बच्चे को, हाशिए पर खड़े समाज को। गांवों में औरतें आज भी मटके सिर पर रखकर मीलों चलती हैं। समय गंवाती हैं, स्वास्थ्य गंवाती हैं, स्कूल जाने वाली लड़कियां पढ़ाई छोड़ देती हैं। गंदा पानी दस्त, हैजा, टाइफाइड लाता है। हर साल लाखों बच्चे ऐसी बीमारियों से मरते हैं, जिन्हें एक गिलास साफ पानी रोक सकता था। यह त्रासदी नहीं, अपराध है। और यह अपराध रोका जा सकता है।
अब एक उम्मीद की किरण है, जल जीवन मिशन। 2019 में शुरू हुआ था। टैप तो लग गए, लेकिन फंक्शनल? नियमित पानी? साफ पानी? कई जगहों पर अभी कमी है। भूजल गिर रहा है, प्रदूषण बढ़ रहा है। मिशन 2028 तक बढ़ा दिया गया है, बजट भी बढ़ा है। लेकिन अब जरूरत है कि सिर्फ कनेक्शन नहीं, असली जल सुरक्षा हो, हर बूंद का हिसाब, हर घर में नियमित, साफ पानी।

समाधान भावना में नहीं, डेटा और तकनीक में है। कल्पना कीजिए, हर पाइप पर स्मार्ट मीटर। रियल-टाइम डैशबोर्ड बताए कि कहां पानी खत्म होने वाला है। एआई अवैध बोरवेल पकड़े। एल्गोरिदम तय करे कि किसे कितना पानी मिले, ताकि कोई प्यासा न रहे। सिंगापुर ने करके दिखाया, केप टाउन ने घबराहट को प्रबंधन में बदला। हम क्यों नहीं?

लेकिन असली लड़ाई शासन की है। बांध-नहर की पुरानी राजनीति बंद हो। मांग को काबू करना होगा। पानी की असली कीमत तय करनी होगी, कड़वी लेकिन जरूरी। प्रदूषण पर सख्त सजा। स्थानीय निकायों को डेटा, अधिकार, संसाधन दो। समुदाय को ताकत दो।

वरना क्या होगा? अमीर टैंकर मंगाएंगे। गरीब कतार में खड़े रहेंगे। बीमारियां फैलेंगी। उद्योग ठप होंगे। समाज दरक जाएगा। समय भाग रहा है। सलाहें मरहम हैं, जख्म गहरा है। 60 करोड़ लोग इंतजार नहीं कर सकते।

पानी अब दया नहीं, अधिकार है। सांस जितना जरूरी हक। विश्व जल दिवस सिर्फ याद दिलाने का नहीं, फैसला लेने का दिन है। सरकारें मजबूत नीतियां बनाएं। बजट लगे। जवाबदेही तय हो। हर घर तक साफ पानी पहुंचे। जल स्रोत सुरक्षित हों। वितरण बराबरी से हो। औरतों की आवाज सुनी जाए, उनकी अगुवाई हो।

यह कोई योजना नहीं, यह अधिकार है। इसे कानून में, नीति में, जमीन पर सच बनाओ। वरना अगली बार नल नहीं सूखेंगे, पूरी व्यवस्था सूख जाएगी। पानी का हक बनाओ कानून। अब वक्त है। कल बहुत देर हो जाएगी।

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Brij Khandelwal

Brij Khandelwal

Brij Khandelwal of Agra is a well known journalist and environmentalist. Khandelwal became a journalist after his course from the Indian Institute of Mass Communication in New Delhi in 1972. He has worked for various newspapers and agencies including the Times of India. He has also worked with UNI, NPA, Gemini News London, India Abroad, Everyman's Weekly (Indian Express), and India Today. Khandelwal edited Jan Saptahik of Lohia Trust, reporter of George Fernandes's Pratipaksh, correspondent in Agra for Swatantra Bharat, Pioneer, Hindustan Times, and Dainik Bhaskar until 2004). He wrote mostly on developmental subjects and environment and edited Samiksha Bharti, and Newspress Weekly. He has worked in many parts of India.

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