दिल्ली। आज पत्रकारिता की परिभाषा धुंधली पड़ती जा रही है। यह बताना कठिन होता जा रहा है कि असली पत्रकारिता क्या है, और इससे भी अधिक मुश्किल यह तय करना कि पत्रकारिता कर कौन रहा है। जब ये दोनों सवाल किसी हद तक सुलझ जाते हैं, तो सबसे बड़ा प्रश्न उठता है—पत्रकारिता कैसे की जाए और किस संस्थान के साथ?
दिल्ली जैसे शहर में दुनियादारी सीखते हुए इन सवालों के जवाब मिलते हैं, लेकिन अक्सर वे खुद को धोखा देने वाले साबित होते हैं। अच्छे पत्रकारों की कमी नहीं है। वे बिलासपुर, रांची, बांदा, बस्तर और विदर्भ में मौजूद हैं। ये लोग अपनी कमियों के साथ अच्छाई को संभाले हुए हैं, लेकिन उनकी कमियों में ‘दलाली’ नहीं है—न आर्थिक, न वैचारिक। वैचारिक प्रतिबद्धता और वैचारिक दलाली दो अलग चीजें हैं। दलाल विचार छोड़कर व्यक्ति के पीछे भागता है, जबकि प्रतिबद्ध पत्रकार सिद्धांत पर अडिग रहता है।
यह मर्सिया नहीं, बल्कि वास्तविकता का आकलन है। माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विश्वविद्यालय में आशुतोष गुप्ता ने छात्रों से खुलकर कहा था कि जो समाज बदलने आए हैं, वे घर लौट जाएं। पत्रकारिता एक पेशा है, जैसे डॉक्टरी, इंजीनियरिंग या वकालत। यहां दुनिया बदलने का रोमांस छोड़कर व्यावहारिक धंधा करना पड़ता है। प्राध्यापक पुष्पेन्द्र पाल सिंह ने ‘हंस’ पत्रिका में इस घटना का विस्तार से वर्णन किया था। आशुतोष में ईमानदारी थी; उन्होंने स्पष्ट कह दिया। कई पत्रकारों में यह साहस नहीं होता। बाद में आशुतोष को लगा कि राजनीति अधिक मुनाफे वाला धंधा है, लेकिन वे वहां भी सफल नहीं हुए और वापस पत्रकारिता में लौट आए।
ऐसी ही एक मिसाल अल्मोड़ा के शमशेर सिंह बिष्ठ की है। जनसत्ता में काम करते हुए जब उन पर विज्ञापन लाने का दबाव पड़ा, तो उन्होंने वरिष्ठ पत्रकार रामबहादुर राय से पूछा-यदि विज्ञापन पत्रकार लाएगा, तो जिसका विज्ञापन लिया, उसकी खबर कैसे निष्पक्ष लिखी जाएगी? विज्ञापन का पैसा लिया, तो खबर भी विज्ञापन वाली ही करनी पड़ेगी न?
आज की पत्रकारिता की सबसे बड़ी चुनौती यही है। विज्ञापनदाता ही वेतन का स्रोत है, और खबरें भी उसी के अनुकूल लिखनी पड़ती हैं। यदि कोई संस्थान जनता की तरफ देखकर ईमानदारी से पत्रकारिता करने की कोशिश करता है, तो दाल-रोटी के लिए कमर झुकाए जनता कंधा न झटके तो क्या करे? बाजार के दबाव में संस्थान झुकते हैं, और पत्रकार मजबूर हो जाते हैं।
फिर भी, निराशा का यह दौर पत्रकारिता के लिए सबसे अच्छा समय भी है। अच्छी, ईमानदार पत्रकारिता अब दुर्लभ हो गई है। जरा-सी भी संभावना दिखे, समाज उसे हाथों-हाथ लेने को तैयार है। जो पत्रकार बिना दलाली के, बिना समझौते के सच को सामने रखेगा, उसकी सफलता की गुंजाइश बहुत अधिक है। ग्रामीण इलाकों से लेकर शहरों तक, लोग निष्पक्ष आवाज की तलाश में हैं।
पत्रकारिता को बचाना अब व्यक्तिगत साहस और सामूहिक जिम्मेदारी का सवाल है। यदि कुछ लोग पुरानी प्रतिबद्धता को जिंदा रखें, तो यह पेशा फिर से समाज का दर्पण बन सकता है। समय चुनौतीपूर्ण है, लेकिन अवसरों से भरा हुआ भी। ईमानदारी अब सबसे बड़ा पूंजी है।



