रवि मिश्रा
फिल्म सिटी (नोएडा)। इस कुतर्क का कोई उत्तर नहीं कि पत्रकारिता में फलां लोग क्यों हैं, फलां लोग क्यों नहीं …पत्रकारिता की पढ़ाई को चुनने का अवसर 12वीं के बाद से सबके लिए खुल जाता है। भारत के सरकारी और गैर सरकारी संस्थानों में दाखिले कि जो प्रक्रिया है यहां भी वैसी ही है। मेरा अपना अनुभव एक छात्र के रूप में ये कहता है कि दाखिला लेने से लेकर पढ़ाई तक इस पेशे को अपने जीवन के रूप में चुनने वाले किसी भी छात्र के दिमाग में कम से कम ये बात कहीं नहीं आती कि वो पत्रकारिता की पढ़ाई इसलिए करेगा क्योंकि उसकी जाति, या धर्म, या राज्य या समाज के लोग इसमें ज्यादा हैं । मुझे नहीं पता कि ये किसी और पेशे में होता है या नहीं पर जर्नलिज्म के चुनाव में कोई भी छात्र ये बात तो कहीं से भी नहीं सोचता ।
पढ़ाई के खत्म होते होते सबको पता चल जाता है कि ये पेशा निर्दयता की हद तक मेहनत करवाने वाला, लगातार सीखने की कभी न खत्म होने वाली यात्रा से भरा , भारी शारीरिक जोखिम, आर्थिक जोखिम, अनपेड से शुरू होकर अंडर पेड रह जाने , ऑफिस और ऑफिस से बाहर की जटिल राजनीति में सदा उलझे रहने और उसपर हर दिन नौकरी के आखिरी दिन की तरह एक्यूरेसी को मैच करने की टाइम के खिलाफ एक अनवरत रेस है ।
नींद, भूख, प्यास परिवार, त्योहार को जो कुर्बान करने में सबसे पहले हाथ उठा कर आगे आता है वही पत्रकार बना रह पाता है। विश्वास कीजिए कि इस हालात को भांप लेने वाले, व्यावहारिक ज्ञान वाले कई छात्र शुरू में ही ये पेशा छोड़ देते हैं।
फिर भी कुछ हम जैसे लोग आगे बढ़ते हैं इसलिए नहीं कि हमारी जाति या धर्म या समाज के लोग यहां हमें हाथों हाथ लेने को तैयार बैठे हैं। बल्कि इसलिए कि हम इन हालात में भी इस पेशे से प्यार करते हैं और बिना सैलेरी, आधी सैलेरी और कभी 18 तो कभी 20 घंटे या उससे भी ज्यादा देर तक दुनिया के सुख – दुख में डूबे रहने का एक पागलपन होता हैं जो इस करियर से शुरू होता है , जैसे – जैसे हम आगे बढ़ते हैं इसका दबाव खुद पर बढ़ता ही जाता है। छोटी शुरुआत से एक अच्छे संस्थान तक पहुंचना सपना होता तो है पर हमारे काम के प्रेशर वाला नेचर कभी और कहीं नहीं बदलता। ये हम सभी जानते भी है और मनाते भी है।
ये कहने में मुझे गर्व है कि करियर शुरू करने से लेकर आजतक मै या मेरे सभी साथी, जितने लोग काम करते रहे हैं किसी को व्यक्तिगत त्याग या मेहनत में कोई आरक्षण नहीं है। ये शायद इकलौता पेशा है जहाँ मेहनत हर विपरीत परिस्थिति में आपको मजबूत बनाए रखती है।
हम में से न जाने कितने पत्रकारों ने अपने सिद्धांतों, आदर्श और उसूल की वजह से नौकरियां छोड़ी, इस्तीफे दिये, लम्बी नाइट शिफ्ट सजा के रूप में काटी, सस्पेंड हुए और अपमानित भी हुए । अगर किसी को लगता है कि जाति या धर्म देखकर ये सब होता होगा तो मुझे ये सोचने वालों पर तरस आता है क्योंकि 90 प्रतिशत लोग वही हैं जो आपके लिए स्टैंड लेने की वजह नौकरियों से इस्तीफा दे रहे होते हैं या संस्थान में संघर्ष कर रहे होते हैं।
जमीन से लेकर स्टूडियो तक खड़ा हर पेशेवर पत्रकार जो बरसों से यहां कठिन हालात में टिका हुआ है कम से कम उसकी तपस्या का उपहास मत कीजिए । आपकी पसंद या नापसंद वाला कोई एक या दो anchor या पत्रकार इन हजारों पत्रकारों की मेहनत , बलिदान और सेवा के उपहास का कारण नहीं बनने चाहिए । अगर आप ये कर रहे हैं तो आप आपके लिए ही देश के कोने कोने में खड़े सिपाहियों को खत्म कर रहे हैं।
जिसे भी लगता है कि ये काम बहुत सरल, प्रभुत्व, एकाधिकार, बहुत पैसे वाला और बहुत सुरक्षित है , मेरी तरफ से उनका स्वागत है कि वो आएं और सिर्फ एक महीने एक पेशेवर माहौल में अपने उसी ज्ञान के साथ काम कर के दिखाएं जो दिन रात फ्री के सोशल मीडिया पर फ्री में देते रहते हैं ।
और जब मैं आप सभी मित्रों और समाज के लोगों को ये बात कह रहा हूं तो मेरा आशय न तो अभिमान का है, न किसी को कमतर बताने जताने का है और न ही खुद को महान बताने का । मेरा आग्रह ये है मेरे हजारों पत्रकार भाई और साथी बहुत मेहनत करते हैं आपके लिए । कुछ कम या कुछ ज्यादा , कुछ सहमति और असहमति के साथ। पर उनकी इस संघर्ष की यात्रा को ये कह कर अपमानित न किया जाए कि जाति, धर्म या समाज को देखकर लोग यहां भीड़ लगा रहे हैं। इस काम में एक ही जाति सबसे ज्यादा और बड़ी है वो है कड़ी मेहनत। जो धैर्य के साथ, लगन के साथ , विपरीत हालत में मान और अपमान सहते हुए जनता के लिए मेहनत करता है वो यहां लंबा चलता है।
आपकी पसंद या नापसंद के एक दो लोगों से ये मेहनती लोग परिभाषित नहीं होने चाहिए। पत्रकारिता में एक ही जाति के लोग सबसे ज्यादा हैं, और ये वही हैं जिनके अंदर कॉलेज में कदम रखने के समय से ही ये आग घर कर जाती है कि आराम नहीं , हमें मेहनत का रास्ता चुनना है ताकि हम किसी की आवाज बन सके ।
हमारी जाति कठिन मेहनत की जाति है और इस जाति में सबका स्वागत है।



