प्रिय वेलेन्टाइनियों एंड जेंज़ीगणों!

happy-valentines-day-2025-wishes-quotes-images-facebook-and-instagram-posts-and-gifts-for-your-loved-ones.jpg.webp

सुरेंद्र बांसल

चंडीगढ़ । अपना भारत वसंत और होली जैसे मदनोत्सवों का देश है। देश और समाज की स्मृतियां भले क्षीण हुई हों , लेकिन हमारी संस्कृति और परंपराएं आज भी अनेक फूहड़ताओं से दूर हैं। बीते कुछ वर्षों से जब से दुनिया मुट्ठी में आनी शुरू हुई है तो वैश्विक फूहड़ताओं का दायरा भी तेजी से बढ़ा है। वेलेंटाइन सप्ताह भी उसी बाज़ार में सजी फूहड़ मोहब्बत की दुकान का प्रसार और पसारा ही है।

इसी बाज़ार के नियंताओं ने शोशा छोड़ा कि, प्यार अंधा होता है’, जबकि हमारे देश की मान्यताएं कहती हैं कि अगर प्यार ही अंधा हो, तो आंख जीवन का कौनसा तत्व देता है ? जैसे कहा जाता है कि सच कड़वा होता है, अगर सच ही कड़वा होता है, तो फिर जगत में मीठा क्या होगा? जब दिल लगा गधी से तो परी क्या चीज़ है’ प्रेम की ऐसी ही फूहड़ और बेहूदी परिभाषा को लेकर ही प्रेम सिर्फ एक ऑब्जेक्ट में बदल गया है.जिसने प्रेम की समझ को अर्थहीन बना दिया है। वेलेंटाइन जैसे फूहड़ सप्ताहों के बाज़ार ने लोगों को समझा दिया है कि प्यार अंधा होता है, जबकि सच यह है कि सिर्फ प्यार ही इंसान को असली आँख देता है। प्यार के बिना इंसान मात्र एक शरीर भर है, वैसे ही जैसे बिना देवता के मंदिर। प्रेम के कारण ही कोई इंसान जीवन के बड़े लक्ष्य तय करता है, प्रेम के कारण ही जीवन में करुणा और सौंदर्यबोध उत्पन्न होता है और वही सौंदर्यबोध जीवन में बहुत कुछ रचने की प्रेरणा बनता है, जिसे फैज़ ने कहा है,” और भी ग़म हैं ज़माने में मोहबत के सिवा ”. प्रेम की भावना ही जीवन में सकारात्मक सफलता की राह पर ले जाती है। सिर्फ छपरीपंथी और रीलबाज़ी के लिए बने संबंध न ईमानदार होते हैं, न प्रामाणिक और न ही प्रेमपूर्ण हो पाते हैं।

ऐसे संबंध सिर्फ भीतर और बाहर उजाड़ ही रचते हैं,और भीतरी उजाड़ बहुत घातक होते हैं। हमारे आसपास घटने वाली दुर्घटनाओं के बारे में छपने वाली ख़बरों में आज वही उजाड़ साफ़ दीखते हैं. और जिन लोगों के भीतर उजाड़ होते हैं, वे सब फिर और अधिक नकली विकल्पों की ओर भागने लगते हैं। नकली ब्यूटी प्रोडक्टस की ओर, सोशल मीडिया पर अपनी ही सेल्फियां चेंपने की चुल्ल और बे मक़सद रीलबाज़ी के प्रपंच उसी उजाड़ का परिणाम और साक्षात् प्रमाण हैं।

इसके विपरीत सच्चा प्रेम अपने घर से लेकर अपना परिवेश और देश रचने की व्यापक दृष्टि देता है, क्योंकि प्रेमियों को लगने लगता है कि हमारा परिवेश चारों ओर प्रेयसी या प्रेमी की तरह सुंदर,सुरम्य और प्रेम के आत्मीय आभास सा होना चाहिए।

प्रेम केवल प्रेमी-प्रेमिका की छीया-छी नहीं , बल्कि अपना परिवेश अधिकाधिक आत्मीयता की सीख है।

लेकिन आसपास देखिये तो वेलेंटाइन सप्ताहों से निकले साप्ताहिक प्रेमी अचानक कहां खो जाते हैं, पता ही नहीं चलता ? अगर वे सच में प्रेमी होते तो वे नित्यप्रति कटती श्रद्धाएं कैसे देख सकते हैं ? प्रेम के कारण उनके भीतर उगी करुणा मांसाहार और भांति भांति के परफ्यूमों के लिए प्रतिदिन कटते जीव-जंतु कैसे बर्दाश्त कर सकते हैं ? हर रोज़ कटते पेड़, पट रहे तालाब, मिटती हरियाली सच्चे प्रेमी कैसे बर्दाश्त कर लेते हैं ? सच्चा प्रेम अपनी देह से लेकर प्रकृति के समस्त इकोसिस्टम के लिए सर्वे भवंतु सुखिना ‘ की प्रार्थना बनता है। क्या वेलेंटाइनी ऐसे बनते दिखे कभी ?

अगर हर साल वेलेंटाइन सप्ताह के कारण समाज में करोड़ों प्रेमी तैयार होते हैं, तो इतनी बेटियां रोज़ क्यों काटी जा रही हैं? अगर हर साल वेलेंटाइन सप्ताह के कारण समाज में करोड़ों प्रेमी तैयार हो रहे हैं, तो लाखों युवा नशे की लत में गर्क़ क्यों हो रहे हैं ? अगर वेलेंटाइन सप्ताहों से उपजे प्रेमी हमारे आसपास के घरों में ही रहते हैं तो धरती पर इतने वृद्धाश्रम और अनाथालय क्यों बढ़ रहे हैं, बलात्कारियों की बाढ़ कहां से आ रही है ? ज़मीन जायदाद और दहेज के लिए अदालतों में इतने मुकदमे क्यों लड़े जा रहे हैं ? क्या ये प्रेम के अभाव से उपजे वही उजाड़ नहीं हैं, जो हमने रच लिए ? निस्संदेह ये सब वही उजाड़ हैं जो मात्र बाज़ार में खुली नकली मोहब्बत की दुकानों से खरीदे गए हैं. इसलिए हे प्रिय वेलेंटाइनियों एंड जेंज़ीगणों संक्रमण काल से गुज़रते देश को रचने की ज़िम्मेदारी अब आपकी ही है, और रचनाएं मौलिक और प्रमाणिक होकर ही संभव होती हैं. और ध्यान रहे कि अपना परिवेश और देश मोहब्बत की दुकानों से खरीदे टुच्चे और छिछोरे सप्ताहिक प्रेम से समृद्ध नहीं होते।

Share this post

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

scroll to top