ए के मिश्रा
नई दिल्ली: पूर्व सेना प्रमुख जनरल एम.एम. नरवणे की अप्रकाशित संस्मरण ‘Four Stars of Destiny’ को लेकर राजनीतिक विवाद तेज हो गया है। लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने पिछले सप्ताह इस किताब के अंशों का हवाला देते हुए सरकार पर हमला किया था, लेकिन अब प्रकाशक पेंग्विन रैंडम हाउस इंडिया ने स्पष्ट किया है कि किताब अभी तक किसी भी रूप में प्रकाशित नहीं हुई है।
राहुल गांधी ने संसद में हार्डकॉपी दिखाते हुए दावा किया कि किताब उपलब्ध थी, लेकिन “सरकार ने इसे गायब करवा दिया”। उन्होंने 2023 में जनरल नरवणे के एक पुराने ट्वीट का हवाला दिया, जिसमें लिखा था, “मेरी किताब उपलब्ध है, लिंक फॉलो करें।”
राहुल ने कहा, “या तो नरवणे झूठ बोल रहे हैं या पेंग्विन झूठ बोल रहा है। मुझे पूर्व सेना प्रमुख पर भरोसा है।” उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि किताब में 2020 के गलवान संघर्ष के दौरान राजनीतिक नेतृत्व द्वारा स्पष्ट निर्देश न दिए जाने का जिक्र है, जो सरकार के लिए असुविधाजनक है।
हालांकि, पेंग्विन रैंडम हाउस इंडिया ने सोमवार को बयान जारी कर कहा, “हमारे पास ‘Four Stars of Destiny’ के एकमात्र प्रकाशन अधिकार हैं। किताब अभी प्रकाशन के लिए नहीं गई है। कोई प्रिंट या डिजिटल कॉपी प्रकाशित, वितरित, बेची या सार्वजनिक रूप से उपलब्ध नहीं की गई है।” प्रकाशक ने चेतावनी दी कि अनधिकृत रूप से प्रसारित कोई भी संस्करण कॉपीराइट उल्लंघन है और इसके खिलाफ कानूनी कार्रवाई की जाएगी।जनरल नरवणे ने भी मंगलवार को पेंग्विन के बयान को शेयर करते हुए लिखा, “यह किताब की स्थिति है।” इससे पहले, दिल्ली पुलिस ने किताब के कथित लीक और प्रसार पर FIR दर्ज की है, जिसकी जांच स्पेशल सेल कर रही है।
प्रश्न उठ रहा है कि यदि किताब कभी प्रकाशित नहीं हुई और रक्षा मंत्रालय से मंजूरी लंबित है, तो राहुल गांधी को हार्डकॉपी कैसे मिली?
क्या यह अनधिकृत लीक है या कोई अन्य स्रोत? मीडिया विशेषज्ञों का कहना है कि प्रतिष्ठित प्रकाशकों द्वारा बिना लोकार्पण, समीक्षा या शोर-शराबे के ऐसी महत्वपूर्ण किताब रिलीज होना असंभव है। यदि सार्वजनिक रूप से उपलब्ध होती, तो सोशल मीडिया पर समीक्षाएं और फोटो बाढ़ मार देती।विपक्ष का दावा है कि किताब में चीन के साथ टकराव में “राजनीतिक नेतृत्व द्वारा सेना को छोड़ दिए जाने” का जिक्र है, जबकि सत्ताधारी पक्ष इसे राजनीतिक स्टंट बता रहा है। विवाद अब कोर्ट और संसदीय समितियों तक पहुंच सकता है, जहां तथ्य और सबूतों की जांच होगी।यह मामला राष्ट्रीय सुरक्षा, प्रकाशन प्रक्रिया और संसद में अप्रकाशित सामग्री के उपयोग से जुड़े गंभीर सवाल खड़े करता है। फिलहाल, किताब की सत्यता और उसके स्रोत पर बहस जारी है।



