निलेश देसाई
भोपाल । भारतीय कृषि क्षेत्र में जब भी कोई बड़ा बदलाव या अंतरराष्ट्रीय समझौता होता है, तो अक्सर एक पुराना हथियार निकाला जाता है— ‘विचारधारा का लेबल’। भारत-अमेरिका व्यापार समझौते (2026) के तहत जीएम (GM) उत्पादों के आयात का विरोध करने वाले स्वर भी आज इसी कसौटी पर कसे जा रहे हैं। इसे ‘लेफ्टिस्ट एजेंडा’ या ‘विकास विरोधी’ बताकर खारिज करने की कोशिशें तेज हैं। लेकिन क्या यह बहस वाकई दक्षिणपंथ बनाम वामपंथ की है? या फिर यह भारत की आने वाली पीढ़ियों की थाली और किसानों की आर्थिक संप्रभुता का गंभीर प्रश्न है?
विचारधारा की दीवार के पार: सर्वसम्मत संकट
अक्सर विरोध को विचारधारा से जोड़ना असली मुद्दे से ध्यान भटकाने का सबसे आसान तरीका होता है। हकीकत यह है कि अमेरिका से सब्सिडी वाले मक्का और सोयाबीन के आयात का विरोध केवल वामपंथी संगठन नहीं, बल्कि राष्ट्रवादी विचारधारा से प्रेरित संगठन भी कर रहे हैं। जबभारतीय किसान संघ (BKS) और आशा-किसान स्वराज जैसे धुर विरोधी छोरों के संगठन एक ही मुद्दे पर खड़े हों, तो समझ लेना चाहिए कि संकट विचारधारा का नहीं, बल्कि अस्तित्व का है।
सब्सिडी का अर्थशास्त्र: बाजार का ‘अन्यायपूर्ण युद्ध’
इसे राजनीति के बजाय शुद्ध ‘अर्थशास्त्र’ के नजरिए से देखें। अमेरिकी कृषि का मॉडल भारी सरकारी नकद सब्सिडी (PSE) पर टिका है। वहां का किसान बाजार की कीमतों के भरोसे नहीं, सरकारी चेक के भरोसे खेती करता है। जब वह अपना ‘अधिशेष’ (Surplus) भारत में डंप करता है, तो वह भारत के उस छोटे किसान से प्रतिस्पर्धा कर रहा होता है जिसे एमएसपी (MSP) के लिए भी संघर्ष करना पड़ता है।
• क्या अपने देश के उत्पादकों को विदेशी सब्सिडी वाली डंपिंग से बचाना ‘एजेंडा’ है?
• या यह एक कल्याणकारी राज्य का बुनियादी आर्थिक कर्तव्य है?
. जीएम (GM) का प्रवेश: विज्ञान बनाम व्यापारिक दबाव
जीएम उत्पादों का मुद्दा केवल प्रयोगशालाओं तक सीमित नहीं है। अमेरिका का दबाव है कि भारत अपने ‘नॉन-जीएम’ (Non-GM) प्रमाणपत्र की शर्तों को हटाए। इसे ‘प्रौद्योगिकी का विरोध’ कहना गलत है; यह असल में ‘सूचना के अधिकार’ और ‘जैविक सुरक्षा’ (Biosecurity) का प्रश्न है।
सरकार का यह तर्क कि “प्रसंस्करण (Processing) के बाद जीएम का प्रभाव खत्म हो जाता है”, वैज्ञानिक से ज्यादा व्यापारिक लगता है। यदि पशु जीएम चारा (DDGS) खाएंगे, तो वही तत्व दूध के माध्यम से इंसानों तक पहुंचेंगे। इस खतरे पर सवाल उठाना किसी विचारधारा की गुलामी नहीं, बल्कि एक जागरूक नागरिक का अपने स्वास्थ्य के प्रति सतर्क होना है।
कंपनियों का कौशल: विरोध को राजनीति में उलझाना
बहुराष्ट्रीय कंपनियां इस खेल की माहिर खिलाड़ी हैं। वे जानती हैं कि यदि वे विरोध को ‘राजनीति’ या ‘एजेंडा’ करार दे दें, तो मध्यम वर्ग और नीति-निर्माता उस मुद्दे से किनारा कर लेंगे। कंपनियां भारत में ‘सेवा’ करने नहीं, बल्कि ‘बाजार’ कब्जाने आई हैं। वे अक्सर व्यापारिक समझौतों की पेचीदगियों में उन प्रावधानों को छिपा देती हैं जो हमारी घरेलू बीज संप्रभुता को स्थायी रूप से नष्ट कर सकते हैं।
. समाधान: ‘विरोध’ को ‘वैकल्पिक व्यापार’ में बदलना
इस बहस को तभी गंभीर बनाया जा सकता है जब हम विरोध के साथ-साथ ‘विकल्प’ की बात करें।
• सहकारिता का शस्त्र: अमूल जैसे मॉडलों ने दिखाया है कि जब किसान संगठित होता है, तो वह बाजार की शर्तों को तय करता है। हमें प्राकृतिक खेती और स्वदेशी बीजों के आधार पर ‘प्राकृतिक सहकारिता’ (Natural Cooperatives) विकसित करनी होगी।
• बाजार के हुनर: हमें कंपनियों की तरह ब्रांडिंग, गुणवत्ता और आपूर्ति श्रृंखला (Supply Chain) के हुनर सीखने होंगे। यदि “जीएम-मुक्त” उत्पाद एक सफल बिजनेस मॉडल बन जाए, तो कोई भी वैश्विक ताकत उसे बाजार से बाहर नहीं कर पाएगी।
‘लेफ्टिस्ट एजेंडा’ जैसे जुमले उन लोगों के लिए ढाल का काम करते हैं जो गहन चर्चा से बचना चाहते हैं। भारत-अमेरिका व्यापार समझौता केवल डॉलर का लेनदेन नहीं है; यह इस बात का फैसला है कि हमारी मिट्टी में क्या बोया जाएगा और हमारी अगली पीढ़ी क्या खाएगी। जब लड़ाई अस्तित्व और आत्मनिर्भरता की हो, तो वहां ‘लाल’ या ‘केसरिया’ नहीं, बल्कि केवल ‘मिट्टी का रंग’ प्राथमिकता होना चाहिए। हमें सड़कों पर आवाज उठाने के साथ-साथ बाजार में अपना ‘हुनर’ दिखाना होगा, तभी हम इन वैश्विक ताकतों का मुकाबला बराबरी के धरातल पर कर पाएंगे।



