डॉ. मयंक चतुर्वेदी
दिल्ली पत्रकारिता का मूल धर्म सत्ता से सवाल पूछना है, सरकार को किसी समस्या का समाधान खोज के देना है, किंतु जब यही सवाल एकतरफा दृष्टिकोण और चयनात्मक तथ्यों के साथ प्रस्तुत किए जाते हैं तब वे विमर्श नहीं बल्कि नैरेटिव बन जाते हैं। हाल ही में दिल्ली हाई कोर्ट द्वारा राणा अय्यूब के पुराने ट्वीट्स पर की गई कड़ी टिप्पणियों ने उनके सोशल मीडिया व्यवहार को कटघरे में खड़ा किया है। इसके साथ ही यह भी साफ हो गया है कि वे अब तक एक खास विचार जोकि भारत की छवि को धूमिल करता है के लिए लिखती रही हैं।
दरअसल, इसी के साथ उनके समग्र लेखन, विशेषकर अंतरराष्ट्रीय मंचों पर प्रकाशित लेखों की प्रकृति और प्रभाव पर भी प्रश्नचिह्न लग गया है। यह मामला आज उस बड़े प्रश्न में बदल चुका है कि क्या वैश्विक मंचों पर भारत की नकारात्मक छवि बनानेवाली आलोचना, तथ्यों पर आधारित संतुलित विश्लेषण है या फिर एक सुनियोजित प्रस्तुति? ताकि भारत को हर संभव नुकसान पहुंचाया जा सके।
राणा अय्यूब वैसे तो अपने शुरूआती पत्रकारिता काल में तहलका से जुड़ी रहीं और बाद में एक स्वतंत्र कॉलमनिस्ट के रूप में उभरीं। आज वे अल जजीरा, द वॉशिंगटन पोस्ट, टाइम मैगज़ीन, द गार्जियन, बीबीसी जैसे अंतरराष्ट्रीय मीडिया संस्थानों के लिए लिखती हैं। यही कारण है कि उनके लेख भारत समेत वैश्विक स्तर पर कई जगह वितरित होते हैं और जिनके माध्यम से एक खास नैरेटिव सेट करने का कार्य किया जाता है, जोकि निश्चित तौर पर भारत विरोधी है।
उनका चर्चित लेख “Modi’s India is a living nightmare for Muslims” सीधे तौर पर भारत को मुसलमानों के लिए भयावह देश के रूप में चित्रित करता है। इस लेख में भीड़ हिंसा और राजनीतिक माहौल को इस तरह प्रस्तुत किया गया, मानो पूरा तंत्र एक समुदाय के खिलाफ काम कर रहा हो। लेख में दावा किया गया कि भारत में मुसलमानों के लिए हालात खराब हो रहे हैं। भीड़ हिंसा, नफरत और राजनीतिक माहौल ने भय पैदा किया है। सरकार की नीतियों और माहौल से अल्पसंख्यकों में असुरक्षा बढ़ी है। स्वभाविक है कि इस प्रकार का सामान्यीकरण भारत की जटिल सामाजिक संरचना को एक ही रंग में रंग देता है। जिसमें कि स्थापना यही की जा रही है कि भारत में बहुसंख्यक हिन्दू समाज मुसलमानों पर भयंकर अत्याचार कर रहा है।
“Journalism is under attack in India. So is the truth.” में वे दावा करती हैं, भारत में “मीडिया स्वतंत्रता” खतरे में है। भारत में मीडिया पर दबाव बढ़ रहा है। “हाइपर-नेशनलिज़्म” और “सेल्फ-सेंसरशिप” बढ़ने का दावा किया। कहा कि स्वतंत्र पत्रकारों के लिए काम करना मुश्किल होता जा रहा है।“The Indian government continues to harass journalists…” में यह स्थापित करने का प्रयास किया कि सरकार आलोचनात्मक पत्रकारिता को दबा रही है। भारत में पत्रकारों पर कानूनी कार्रवाई और उत्पीड़न हो रहा है। “Amid violence, Indian Muslims are fearing the worst” में उन्होंने साम्प्रदायिक हिंसा की घटनाओं को आधार बनाकर पूरे देश में भय का वातावरण चित्रित किया। कहा कि भारत में साम्प्रदायिक हिंसा के कारण मुसलमानों में डर है। प्रधानमंत्री की “चुप्पी” पर सवाल उठाए गए। 2002 गुजरात दंगों से तुलना की गई।
ऐसे ही “This 17th-century hatred is fueling India’s politics” में उन्होंने इतिहास और फिल्मों के माध्यम से यह तर्क दिया कि भारत में एक विशेष नैरेटिव को बढ़ावा दिया जा रहा है। अय्यूब ने फिल्मों और इतिहास की व्याख्या के जरिए “मुगल-विरोधी नैरेटिव” पर सवाल उठाया। कहा कि इतिहास को राजनीतिक उद्देश्यों से बदला जा रहा है। वे यहीं नहीं रुकती हैं, इससे आगे अपने एक लेख “Stateless by design: How India is erasing its citizens” में नागरिकता से जुड़े कानूनों को लेकर गंभीर आरोप लगाए गए कि भारत अपने ही नागरिकों को अधिकारों से वंचित कर रहा है। भारत में नागरिकता से जुड़े कानूनों/प्रक्रियाओं के कारण लोगों को “स्टेटलेस” बनाया जा रहा है। इसे लोकतंत्र के लिए खतरा बताया। फिर “Attempts to demonize the Taj Mahal damage more than history” में उन्होंने ताजमहल को लेकर चल रहे विवादों में मुस्लिम नैरेटिव की आलोचना नहीं की।
“India’s surveillance state should alarm every democracy” में उन्होंने डिजिटल निगरानी को लोकतंत्र के लिए खतरा बताया। वहीं “How Trump is forcing Europe’s pivot to India” में उन्होंने अंतरराष्ट्रीय राजनीति के संदर्भ में भारत की भूमिका का विश्लेषण आलोचनात्मक रखा। यदि उनके कुछ अन्य रिपोर्ट एवं लेखों के शीर्षक देखें तो हिंदू राष्ट्रवाद ने भारत के देशभक्ति पर्व को पीछे छोड़ दिया है।… मोदी के भारत में गांधी जी अप्रासंगिक हो गए हैं।… मोदी भारत में मुसलमानों के प्रति नफरत भड़का रहे हैं, जबकि दुनिया इस ओर से मुंह मोड़ रही है।…अपने भारतीय झंडे ऊँचे उठाएँ: बहुत से अन्याय हैं जिन्हें छुपाना ज़रूरी है। इस स्वतंत्रता दिवस पर जश्न मनाने के लिए कुछ खास नहीं है।
अय्यूब लिखती हैं, हिंसा और धमकियों के बढ़ने के साथ, भारत के मुसलमानों को सबसे बुरे हालात का डर सता रहा है।, भारत में मुस्लिम नरसंहार की मांगें और भी तेज होती जा रही हैं।…मोदी की चुप्पी एक तरह से इसका समर्थन है।… मोदी के भारत में नफरत, धमकियों और अन्याय का एक घटनाक्रम, भारत का पतित और अवमूल्यित लोकतंत्रवैश्विक] क्या यह कट्टर राष्ट्रवादी भिक्षु भारत का अगला विभाजनकारी नेता बनेगा?…इसमें लिखा गया है, बाजार-अनुकूल मुखौटे की आड़ में सांप्रदायिक ध्रुवीकरण को भड़काने की योगी आदित्यनाथ की प्रतिभा बिल्कुल मोदी की रणनीति से मिलती-जुलती है।
ये उस एमनेस्टी इंटरनेशनल का समर्थन करती हैं जो अपनी रिपोट्स के माध्यम से भारत विरोधी एजेंडा चलाती है। भारत ने एमनेस्टी इंटरनेशनल को दरकिनार करते हुए तानाशाही की ओर अपने अग्रसर होने की गति को तेज कर दिया है।…कश्मीर से जुड़े विचारों पर सवाल उठाने की कीमत धमकियों और सेंसरशिप के रूप में चुकानी पड़ती है।…भारत की न्यायिक स्वतंत्रता का विनाश लगभग पूर्ण हो चुका है। सत्ताधारी सरकार द्वारा एक पूर्व मुख्य न्यायाधीश को संसद में नियुक्त करने से देश का शासन और नैतिक संकट और भी बढ़ गया है।
इसी तरह से नागरिकता विधेयक भारत को हिंदू राष्ट्रवादी राज्य बनने की राह पर अग्रसर करता है।…मोदी सरकार ने हिंदू वर्चस्व को मजबूत करने के अपने सपने को आधिकारिक कानूनी आवरण देने की कोशिश की है।…भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने मुसलमानों को द्वितीय श्रेणी के नागरिक बनाने वाले दक्षिणपंथी दृष्टिकोण का समर्थन किया है।…कश्मीर में भारत की कार्रवाई ने पूरे समुदायों को पंगु और चुप करा दिया है।’…हमारे बच्चे जेल में हैं’: भारत किस तरह कश्मीर को अलग-थलग और भयभीत रख रहा है! … मोदी का भारत मुसलमानों के लिए एक जीता-जागता दुःस्वप्न है।… इस तरह के कई अन्य लेख भी हैं, जो द वॉशिंगटन पोस्ट, टाइम मैगज़ीन, द गार्जियन, बीबीसी, अल जजीरा पर हमें प्राय: दिखाई देते हैं। सभी का एक ही नैरेटिव है, केंद्र की मोदी सरकार का विरोध, सनातन हिन्दू धर्म का विरोध और कुल मिलाकर भारत का विरोध!
प्राय: इन सभी लेखों को एक साथ देखने पर एक सामान्य सूत्र उभरता है; भारत को एक ऐसे राष्ट्र के रूप में प्रस्तुत करना, जहाँ लोकतंत्र कमजोर हो रहा है, संस्थाएँ दबाव में हैं और अल्पसंख्यक असुरक्षित हैं। इसी पृष्ठभूमि में उनके विवादित ट्वीट्स को देखा जाना चाहिए। जब एक ही व्यक्ति बार-बार एक विशेष प्रकार का नैरेटिव प्रस्तुत करता है, चाहे वह लेखों में हो या सोशल मीडिया पर तब पूरी तरह से स्पष्ट हो जाता है कि आखिर व्यक्ति चाहता क्या है।
पुनश्च; दिल्ली हाई कोर्ट द्वारा जिन ट्वीट्स पर आपत्ति जताई गई, उनमें धार्मिक प्रतीकों और ऐतिहासिक व्यक्तित्वों के संदर्भ में की गई टिप्पणियाँ शामिल हैं। अदालत ने इन्हें प्रथम दृष्टया “अपमानजनक, भड़काऊ और सांप्रदायिक” माना है। दिल्ली हाई कोर्ट ने कथित पत्रकार राणा अयूब ट्वीट मामले में यह भी कहा कि हिंदू देवी-देवताओं और वीर सावरकर पर किए गए ट्वीट्स अपमानजनक, भड़काऊ और सांप्रदायिक हैं। इसका अर्थ यह नहीं है कि आलोचना नहीं होनी चाहिए। वस्तुत: इसका अर्थ यह है कि आलोचना तथ्यों, संतुलन और व्यापक संदर्भ के साथ होनी चाहिए। पत्रकारिता का उद्देश्य समस्याओं को उजागर करना भर नहीं होता, वह उन्हें सही परिप्रेक्ष्य में प्रस्तुत भी करती है।



