दिल्ली। भारतीय पत्रकारिता के मंचों पर टीवी डिबेट शो अक्सर गरमागरम बहसों का गवाह बनते हैं, लेकिन हाल ही में न्यूज 18 इंडिया की प्रमुख एंकर रूबिका लियाकत ने अपनी ‘जीरो टॉलरेंस’ नीति से एक नया उदाहरण कायम किया। एक लाइव डिबेट में तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के समर्थक तौसिफ अहमद खान द्वारा अभद्र भाषा का इस्तेमाल करने पर रूबिका ने उन्हें शो से बाहर निकाल दिया। यह घटना न केवल टीएमसी की राजनीतिक रणनीति पर सवाल उठाती है, बल्कि मीडिया में महिलाओं की गरिमा और सभ्य बहस के मानदंडों को भी रेखांकित करती है।
घटना का केंद्र बिंदु बांग्लादेशी हिंदुओं का मुद्दा था। डिबेट में बंगाल में अवैध घुसपैठ की चर्चा हो रही थी। तौसिफ ने दावा किया कि बंगाल में हुई घुसपैठ में 80 प्रतिशत हिंदू शामिल हैं और इन्हें केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने ही लाया है। यह बयान न केवल तथ्यों से परे था, बल्कि राजनीतिक पूर्वाग्रह से प्रेरित लग रहा था। रूबिका ने तुरंत पलटवार किया, स्पष्ट करते हुए कि बांग्लादेश के हिंदू यदि भारत की नागरिकता चाहते हैं, तो नागरिकता संशोधन अधिनियम (सीएए) में उनके लिए स्पष्ट प्रावधान है। वे घुसपैठ के बजाय वैध आवेदन देकर आसानी से नागरिक बन सकते हैं। इस तर्क ने तौसिफ के झूठ को बेनकाब कर दिया।
लेकिन तौसिफ की प्रतिक्रिया शो की गरिमा के लिए कलंकपूर्ण साबित हुई। सीएए के प्रावधानों का जिक्र होते ही उन्होंने अभद्र और अपमानजनक भाषा का सहारा लिया, जो न केवल एंकर के प्रति असम्मान था, बल्कि दर्शक वर्ग के प्रति भी। रूबिका, जो स्वयं एक महिला पत्रकार हैं, ने इस पर कोई ढील नहीं बरती। उनकी जीरो टॉलरेंस नीति अपनाई और उन्होंने तौसिफ को धक्के देकर शो से बाहर किया और कहा, “इस शो से बाहर हो जाओ। अपनी घर की महिलाओं, अपनी बीवी और बच्चों से ऐसे ही बात करना।” यह कथन न केवल सख्त था, बल्कि एक नैतिक संदेश भी देता था: सार्वजनिक मंच पर अभद्रता की कोई जगह नहीं।
यह घटना टीएमसी की आंतरिक संस्कृति पर भी सवाल खड़े करती है। नहीं भूलना चाहिए कि तृणमूल का नेतृत्व ममता बनर्जी के पास है और वे स्वयं एक महिला हैं। तृणमूल कांग्रेस पार्टी को अपने समर्थकों को महिलाओं से कैसे व्यवहार करते हैं, इसका प्रशिक्षण देना चाहिए। तौसिफ अहमद खान जैसे लोग किसी पार्टी के लिए कलंक ही नहीं, समाज के लिए भी खतरा हैं।
रूबिका का कदम महिलाओं को सशक्त बनाने वाला है। मीडिया में महिलाओं को अक्सर चुनौतियों का सामना करना पड़ता है, और ऐसी घटनाएं उन्हें और मजबूत बनाती हैं।
रूबिका की यह नीति प्रशंसनीय है। डिबेट शो सूचना का माध्यम हैं, न कि व्यक्तिगत हमलों का। अभद्रता पर जीरो टॉलरेंस से न केवल शो की गुणवत्ता सुधरती है, बल्कि दर्शकों को सकारात्मक संदेश भी मिलता है। सोशल मीडिया पर इस वीडियो ने तहलका मचा दिया है, जहां यूजर्स रूबिका की तारीफ कर रहे हैं। यह घटना याद दिलाती है कि पत्रकारिता में सत्य और शिष्टाचार दोनों जरूरी हैं। यदि राजनीतिक बहसें ऐसी ही सख्ती से संचालित हों, तो लोकतंत्र मजबूत होगा।



