– डॉ. मयंक चतुर्वेदी
दिल्ली । सुबह का वह क्षण याद कीजिए, जब किसी मंदिर की घंटी की ध्वनि वातावरण को चीरते हुए सीधे हृदय तक पहुँचती है। उस ध्वनि में पीढ़ियों की आस्था, श्रद्धा और भक्ति का संचित स्पंदन होता है। एक हिंदू जीवन की शुरुआत प्राय: मंदिर से होती है, जन्म लेने के पूर्व गर्भाधान, पुंसवन और सीमन्तोन्नयन यानी इस संपूर्ण तीन भाग के ‘गर्भ संस्कार’ के दौरान गर्भ में पल रहे शिशु के शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक विकास के साथ-साथ माता की प्रसन्नता के लिए देवताओं से प्रार्थना की जाती है और तभी एक जन्म लेनेवाले जीवात्मा के जीवन में उसके अस्तित्व के साथ ही मंदिर प्रवेश कर जाता है।
उसके बाद मंदिर की यात्रा जैसे घर के छोटे से पूजा-स्थल से लेकर विशाल तीर्थों तक संपूर्ण जीवन भर हमें जुड़ी हुई दिखाई देती है, इतना ही नहीं देह छोड़ देने के बाद भी मंदिर का अस्तित्व रहता है, स्मृतियों में पुरखों के रूप में, पितर बनकर जीवात्मा अपने अस्तित्व को सदियों तक बनाए रखती है।
जीवन में यही मंदिर जीवन के संघर्षों में सहारा बनते हैं, तो उत्सवों में उल्लास का केंद्र भी। ऐसे ही आध्यात्मिक अनुभवों का चरम रूप है केरल के घने वनों में स्थित सबरीमाला मंदिर, जोकि आज श्रद्धा केंद्र होने के साथ ही इन दिनों देश के बौद्धिक और संवैधानिक विमर्श का भी केंद्र बना हुआ है। उच्चतम न्यायालय में चल रही बहस ने इसे आस्था और अधिकार के संगम पर खड़ा कर दिया है।
प्रश्न बार-बार सहज रूप से उमड़ रहा है, आखिर हिंदू जीवन में मंदिर क्या सिर्फ पूजा का स्थान है? हर बार एक ही उत्तर सामने आ रहा है, इससे भी कहीं अधिक गहरा है ये मंदिर! जीवन का आधार है। यह वह स्थान है जहाँ व्यक्ति अपने भीतर के शोर को शांत कर, चेतना के स्तर पर आत्मा की आवाज सुनता है, इसीलिए ही सनातन परंपरा में जन्म से लेकर मृत्यु तक हर संस्कार मंदिर से जुड़ा है।
मंदिर मानसिक और आध्यात्मिक संतुलन का माध्यम है। इसमें वैज्ञानिकता भी है, आध्यात्म भी, धर्म भी है और विचार भी, श्रद्धा भी है तो भक्ति भी। वस्तुत: वैज्ञानिक दृष्टि कहती है कि मंदिरों की संरचना इस प्रकार की जाती है कि वहाँ ऊर्जा सकारात्मक रहे। घंटियों की ध्वनि, मंत्रोच्चार और धूप-दीप का वातावरण मस्तिष्क को शांति प्रदान करता है। यही कारण है कि मंदिर से लौटते समय व्यक्ति स्वयं को हल्का और संतुलित महसूस करता है।
जिसमें कि मंदिर के साथ जुड़ी श्रद्धा वह अदृश्य शक्ति है जोकि मनुष्य को असंभव को संभव करने की प्रेरणा देती है। भक्ति उस श्रद्धा का सजीव रूप है, जोकि कर्म और भावना में प्रकट होती है। जब एक भक्त मंदिर में माथा टेकता है, तब वह अपने अहंकार को त्यागकर एक उच्चतर शक्ति को स्वीकार कर रहा होता है। यह प्रक्रिया व्यक्ति के भीतर विनम्रता और संतुलन पैदा करती है। यही कारण है कि कठिन परिस्थितियों में भी श्रद्धालु व्यक्ति टूटता नहीं है, वह और अधिक मजबूत होकर उभरता है।
सबरीमाला, तपस्या, अनुशासन और आस्था का संगम है
सबरीमाला मंदिर की परंपरा अन्य मंदिरों से भिन्न है। यहाँ भगवान अय्यप्पा को एक तपस्वी ब्रह्मचारी के रूप में पूजा जाता है, इसीलिए यहाँ आने वाले भक्तों के लिए 41 दिनों का कठोर व्रत, संयम और ब्रह्मचर्य अनिवार्य माना गया है। यह यात्रा संपूर्ण हिन्दू भक्ति परंपरा में धार्मिक अनुष्ठान होने के साथ ही सबसे अधिक जरूरी आत्मानुशासन की परीक्षा है। जंगलों से होकर कठिन मार्ग तय करना, सादा जीवन जीना और सामूहिक भक्ति में शामिल होना, वस्तुत: यह सभी तत्व मिलकर एक ऐसा अनुभव रचते हैं, जिसमें व्यक्ति को संपूर्णता के साथ भीतर से बदल देने का सामर्थ्य होता है।
न्यायालय की बहस: आस्था बनाम समानता
ऐसे में जब उच्चतम न्यायालय ने 2018 में सभी आयु वर्ग की महिलाओं को सबरीमाला में प्रवेश की अनुमति दी, तब यह निर्णय लगा कि एक तरफा हो गया है, समानता के सिद्धांत पर इसे आरूढ़ तो किया गया, किंतु इसके मर्म को शायद गहराई से नहीं समझा गया! परंतु इसके बाद यह प्रश्न उठ खड़ा हुआ कि क्या हर धार्मिक परंपरा को एक ही संवैधानिक मानक से परखा जा सकता है?
अब एक बार फिर इस मंदिर की परंपरा को लेकर न्यायालय में बहस चल रही है, केंद्र सरकार की ओर से तुषार मेहता लगातार अपने तर्क रख रहे हैं, वे बता रहे हैं कि भारत में कई मंदिरों में विशिष्ट परंपराएँ हैं, जो उनकी आस्था का अभिन्न हिस्सा हैं। इस संदर्भ में ब्रह्मा मंदिर पुष्कर, कामाख्या देवी मंदिर और कोट्टनकुलंगारा देवी मंदिर जैसे उदाहरण दिए गए, जहाँ अलग-अलग नियम प्रचलित हैं।
विविधता ही है हिंदू धर्म की सबसे बड़ी शक्ति
हिंदू धर्म किसी एकरूपता का आग्रह नहीं करता। यहाँ हर मंदिर, हर परंपरा और हर पूजा पद्धति का अपना विशिष्ट महत्व (वैशिष्ट्य) है। यही कारण है कि कहीं केवल महिलाएँ पूजा करती हैं, तो कहीं पुरुषों को विशेष वेशभूषा धारण करनी होती है। वस्तुत: यह विविधता यह दर्शाती है कि हिंदू धर्म एक जीवंत परंपरा है, जोकि समय और परिस्थितियों के साथ विकसित होती रही है। यह किसी एक नियम में बंधा हुआ धर्म नहीं, यह तो अनुभव और आस्था का विस्तृत महासागर है।
काश; इस बात को और मंदिर की गहराई एवं उसके संदेश को न्यायालय और उसके बाहर सभी समझें! “सबरीमाला मंदिर” पर विवाद व्यर्थ है, क्योंकि हिंदू धर्म की महानता ही इसी में है कि यह विविधता को स्वीकार करता है, संवाद को महत्व देता है और हर व्यक्ति को अपनी आस्था के अनुसार जीने की स्वतंत्रता देता है। मंदिर से जुड़ी श्रद्धा और भक्ति जीवन को दिशा देने वाले तत्व हैं।
एक भक्त के लिए मंदिर एक अनुभव है। जब वह कठिन यात्रा करके सबरीमाला पहुँचता है, तब उसकी आँखों में सिर्फ अपने आराध्य के दर्शन की इच्छा होने के साथ ही गहरा संतुष्टि का भाव भी होता है। निश्चित ही यह अनुभव शब्दों से परे है; यह वह क्षण है जब मनुष्य स्वयं को ईश्वर के निकट महसूस करता है, उसकी चेतना बोल उठती है, प्रज्ञानं ब्रह्म- “चेतना ही ब्रह्म है।” अहं ब्रह्मास्मि- “मैं ब्रह्म हूँ।” तत्वमसि- “तुम वही हो” (वह तुम हो) और अयमात्मा ब्रह्म- “यह आत्मा ही ब्रह्म है।” ‘शिवोहम शिवोहम’- “मैं शिव हूँ, मैं शिव हूँ।” वस्तुत: यही आस्था की वास्तविक शक्ति है…जो भारत में है, जो भारत से सर्वत्र व्याप्त है…



