सफाचट पत्रकारिता और वसूली का धंधा: एक आलोचनात्मक नजरिया

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संतोष सिंह मंगरूआ
पटना।  पत्रकारिता का मूल उद्देश्य सत्य की खोज और समाज को जागरूक करना है, लेकिन कुछ लोग इसे व्यक्तिगत लाभ और वसूली के साधन के रूप में इस्तेमाल करते हैं। बिहार में ‘लरचट पत्रकारिता’ का एक उदाहरण पटना का वह पत्रकार है, जिसे ‘अज्ञानेश्वर’ कहा जाता है। यह व्यक्ति ज्ञान का दिखावा करते हुए अक्सर विवादास्पद और पक्षपातपूर्ण बयान देता है, जबकि उसकी समझ सीमित ही रहती है।
हाल ही में चर्चा में आया कि भोजपुरी सुपरस्टार पवन सिंह को राज्यसभा भेजने की संभावना पर यह पत्रकार अत्यधिक व्यथित दिखाई दे रहा है। उसकी असल चिंता यह नहीं कि पवन सिंह राज्यसभा जाएँगे, बल्कि यह डर है कि 32 विधायकों वाला राजपूत समाज हरिवंश नारायण सिंह की जगह किसी अन्य राजपूत उम्मीदवार की मांग न उठा ले। इससे उसकी कथित ‘जातीय संतुलन’ की राजनीति प्रभावित हो सकती है।
यह व्यक्ति धन मिलते ही अकड़ने लगता है और ज्ञान का ढोंग रचता है। पहले भी हाजीपुर के मुखिया शिवधारी सिंह की हत्या के मामले में उसने वीर शिवधारी सिंह को ‘आतंकी’ और ब्रह्मेश्वर मुखिया को ‘संत’ बताकर अपनी पक्षधरता दिखाई थी। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या यह पत्रकारिता है या मात्र वसूली और प्रचार का धंधा?
सच्ची पत्रकारिता निष्पक्षता, तथ्यों और नैतिकता पर टिकी होती है। जब यह व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा, जातिवाद या आर्थिक लाभ से ग्रस्त हो जाती है, तो समाज का विश्वास टूटता है। ऐसे ‘लरचट’ तत्वों से सावधान रहना आवश्यक है, ताकि लोकतंत्र की चौथी स्तंभ मजबूत बनी रहे।

(आप अपनी प्रतिक्रिया मेल कर सकते हैं: mediascandelhi@gmail.com)

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