दिल्ली। आज के दौर में विदेश में पढ़ाई और बसना भारतीय मध्यम वर्ग के लिए एक बड़ा सपना बन चुका है। माता-पिता अपनी सारी जमा-पूंजी, कभी-कभी घर-जमीन बेचकर या कर्ज लेकर बच्चों को अमेरिका, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया या यूके जैसे देशों में उच्च शिक्षा के लिए भेजते हैं। उनका मानना होता है कि वहां की शिक्षा, नौकरी के अवसर और जीवन स्तर बेहतर होंगे। बच्चा स्थापित हो जाएगा, परिवार का नाम रोशन करेगा और शायद माता-पिता को भी बाद में अपने पास बुला लेगा। लेकिन वास्तविकता अक्सर इससे बहुत अलग निकलती है। जब बुढ़ापा आता है, तब माता-पिता अकेले रह जाते हैं—न बच्चे उनके साथ, न वे बच्चों के पास जा पाते हैं। इस स्थिति को देखकर उठने वाला सवाल गहरा है: क्या ऐसे माता-पिता खुशनसीब हैं या अभागे?
एक ओर देखें तो ये माता-पिता खुशनसीब कहे जा सकते हैं। उन्होंने अपने बच्चों को दुनिया की सर्वश्रेष्ठ यूनिवर्सिटियों में पढ़ाई का अवसर दिया। बच्चे अच्छी नौकरी कर रहे हैं, उच्च वेतन कमा रहे हैं, बेहतर जीवन जी रहे हैं। समाज में उनका नाम “सफल बच्चों के माता-पिता” के रूप में जाना जाता है। रिश्तेदारों-मित्रों के बीच गर्व की बात होती है कि “हमारा बेटा/बेटी तो अमेरिका में सेटल हो गया है।” यह गर्व और संतुष्टि का भाव कई माता-पिता के लिए जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि बन जाता है। वे सोचते हैं कि उन्होंने अपनी जिम्मेदारी पूरी कर दी—बच्चे को अच्छी जिंदगी दी। वीडियो कॉल पर बच्चे की सफलता की कहानियां सुनकर दिल को सुकून मिलता है। कुछ मामलों में बच्चे आर्थिक मदद भी भेजते हैं, जिससे माता-पिता की जिंदगी आरामदायक हो जाती है।
लेकिन दूसरी ओर यह अभागापन की गहरी छाया है। भारतीय संस्कृति में बुढ़ापे में बच्चों का साथ, उनकी देखभाल और भावनात्मक निकटता को बहुत महत्व दिया जाता है। “बुढ़ापे की लाठी” कहावत इसी भावना से निकली है। जब बच्चा विदेश में बस जाता है, तो माता-पिता को शारीरिक रूप से अकेलापन महसूस होता है। बीमारी के समय कोई साथ देने वाला नहीं, छोटी-छोटी जरूरतों के लिए पड़ोसियों या नौकर पर निर्भरता, और सबसे बड़ा दर्द—भावनात्मक खालीपन। इसे “Empty Nest Syndrome” कहा जाता है, जो खासकर भारतीय माता-पिता में आम है। पंजाब, केरल, दिल्ली जैसे राज्यों में हजारों ऐसे परिवार हैं जहां बच्चे विदेश चले गए और माता-पिता यहां अकेले रह गए। वृद्धावस्था में डिप्रेशन, अकेलापन, स्वास्थ्य समस्याएं बढ़ जाती हैं। कई बार बच्चे व्यस्तता या वीजा-परिवार की जटिलताओं के कारण माता-पिता को अपने पास नहीं बुला पाते। या फिर माता-पिता खुद विदेश की ठंड, अलग संस्कृति और भाषा की वजह से वहां नहीं रह पाते।
यह स्थिति एक तरह का द्वंद्व पैदा करती है। बच्चे की सफलता का मतलब माता-पिता की कुर्बानी। उन्होंने सब कुछ दांव पर लगाया, लेकिन बदले में मिला अकेलापन। क्या सफलता तभी सार्थक है जब वह परिवार को साथ रखे? या सफलता का मतलब सिर्फ व्यक्तिगत उपलब्धि है, भले परिवार टूट जाए? समाज में यह सवाल अब तेजी से उठ रहा है। कुछ लोग कहते हैं कि माता-पिता को पहले से समझ लेना चाहिए था कि विदेश जाने का मतलब स्थायी दूरी है। लेकिन क्या कोई माता-पिता जानबूझकर अपने बुढ़ापे के लिए अकेलापन चुनते हैं? नहीं। वे तो बस बेहतर भविष्य की आशा में यह कदम उठाते हैं।
अंत में, ऐसे माता-पिता न पूरी तरह खुशनसीब हैं, न पूरी तरह अभागे। वे एक ऐसे युग के शिकार हैं जहां वैश्वीकरण और व्यक्तिवाद ने पारिवारिक बंधनों को कमजोर कर दिया है। उनकी चिंता हमें सोचने पर मजबूर करती है—क्या हमारी सफलता की परिभाषा में परिवार की खुशी शामिल है? शायद सच्ची सफलता वही है जो माता-पिता के बुढ़ापे को अकेला न छोड़े। अन्यथा, सफलता के झंडे गाड़ने वाले बच्चे के घर में भी दो खाली कुर्सी और चार आंसुओं भरी आंखें रह जाती हैं।



