सम्मेलन का उद्देश्य साम्राज्यवाद स्थापित करना नहीं, बल्कि समावेशिता को बढ़ावा देना है – डॉ. सच्चिदानंद जोशी

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नई दिल्ली : संस्कृति मंत्रालय के अंतर्गत स्वायत्त संस्थान इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र (आईजीएनसीए) के बृहत्तर भारत एवं क्षेत्र अध्ययन विभाग द्वारा आयोजित दो दिवसीय अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन “भारत और मंगोलिया के बीच सांस्कृतिक अंतःप्रवाह” का समापन गरिमामय समारोह के साथ सम्पन्न हुआ। 18–19 फरवरी को आयोजित इस सम्मेलन में भारत और मंगोलिया के विद्वानों, शोधकर्ताओं, सांस्कृतिक विशेषज्ञों, शिक्षाविदों और नीति-निर्माताओं ने भाग लेकर दोनों देशों के बहुआयामी सांस्कृतिक संबंधों पर व्यापक विचार-विमर्श किया।

समापन सत्र की अध्यक्षता आईजीएनसीए के सदस्य सचिव डॉ. सच्चिदानंद जोशी ने की। उन्होंने सम्मेलन में सहभागिता के लिए सभी अतिथियों और प्रतिभागियों का स्वागत करते हुए कहा कि हम इस संवाद की शुरुआत करना चाहते थे, ताकि भारत और उन देशों के बीच सांस्कृतिक आदान-प्रदान पर चर्चा हो सके, जो ‘बृहत्तर भारत’ की परिधि में आते हैं। इसका उद्देश्य किसी प्रकार का साम्राज्यवाद स्थापित करना नहीं है, बल्कि समावेशिता को बढ़ावा देना है। हम केवल यह जानना चाहते हैं कि भारत की सांस्कृतिक छाप किन-किन देशों में दिखाई देती है और विभिन्न देशों के बीच कौन-कौन से साझा तत्व हैं, जो किसी न किसी रूप में भारत से जुड़े हुए हैं। ऐसा महत्वपूर्ण प्रकल्प तभी सशक्त रूप से आगे बढ़ सकता है, जब इस प्रकार का सम्मेलन आयोजित हो।

जैसा कि इस सम्मेलन में हम सबने बात की, कि मंगोलिया में भारत की गहरी उपस्थिति दिखाई देती है। हम यह भी जानना चाहते थे कि भारत में मंगोलिया कितनी मात्रा में विद्यमान है। दुर्भाग्यवश, हमारी शिक्षा-प्रणाली और अकादमिक आवश्यकताओं के दबाव के कारण हम अपने पड़ोसी देशों पर पर्याप्त ध्यान नहीं दे पाए, जबकि उनके साथ हमारे सांस्कृतिक संबंध रहे हैं। हमारा प्रमुख ध्यान हमेशा पश्चिम और यूरोप-केंद्रित दृष्टिकोण की ओर रहा है। यूरोप और अमेरिका को समझने में हम अधिक रुचि लेते रहे, जबकि अपने पड़ोसी देशों के साथ साझा सांस्कृतिक तत्वों को समझने की ओर अपेक्षित ध्यान नहीं दिया गया। यह एक दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति रही।

‘बृहत्तर भारत’ की मूल भावना यही है कि हम अपने पड़ोसी देशों में उन जड़ों को तलाशें, जिनमें संस्कृति, समाजशास्त्र, दर्शन, मनोविज्ञान और यहां तक कि राजनीति के स्तर पर भी समानताएं मौजूद हैं। इस दृष्टि से यह सम्मेलन अत्यंत महत्वपूर्ण है। जब इस सम्मेलन की अंतिम प्रकाशन सामग्री सामने आएगी, तो वह निश्चित रूप से एक महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक दस्तावेज़ सिद्ध होगी। यह आने वाली पीढ़ियों के लिए भारत-मंगोलिया सम्बंधों के अध्ययन का मार्ग प्रशस्त करेगी।

हम एक ठोस कार्य-योजना भी तैयार करना चाहते हैं, जिससे यह तय हो सके कि इन अध्ययनों को आगे कैसे बढ़ाया जाए, हमारे विभिन्न विश्वविद्यालयों, संस्थानों और महाविद्यालयों में किस प्रकार के शोध किए जाएं, किस प्रकार की कार्यशालाएं और प्रदर्शनी आयोजित की जाएं, और शिलालेखों, पाण्डुलिपियों तथा अन्य दस्तावेज़ों के अध्ययन को किस प्रकार प्रोत्साहित किया जाए। इन सभी पहलुओं को इस सम्मेलन की सिफारिशों के आधार पर आगे बढ़ाया जा सकता है। मैं उम्मीद करता हूं कि इस सम्मेलन के दौरान जो सम्बंध और आपसी जुड़ाव स्थापित हुए हैं, वे आने वाले वर्षों में और अधिक सुदृढ़ होंगे।

आईजीएनसीए की ट्रस्टी और सम्मेलन की संयोजक प्रो. निर्मला शर्मा ने सम्मेलन के समापन उद्बोधन में दो दिवसीय सत्रों के निष्कर्षों को रेखांकित करते हुए कहा कि भारत और मंगोलिया के बीच सांस्कृतिक सम्बंधों का आधार आध्यात्मिक निकटता और ऐतिहासिक संवाद रहा है। उन्होंने पाण्डुलिपि संरक्षण, बौद्ध अध्ययन, सांस्कृतिक अनुसंधान और शैक्षिक आदान-प्रदान के क्षेत्र में संयुक्त परियोजनाओं को आगे बढ़ाने पर बल दिया।

सम्मेलन के दौरान विभिन्न सत्रों में भारत–मंगोलिया के ऐतिहासिक सांस्कृतिक एवं सभ्यतागत सम्बंध, बौद्ध धर्म और आध्यात्मिक परम्पराओं का साझा विरासत, पांडुलिपि एवं ग्रंथ परम्परा का संरक्षण, कला एवं प्रदर्शनकारी परम्पराएं, लोक-संस्कृति, शिक्षा और अकादमिक आदान-प्रदान, सांस्कृतिक कूटनीति तथा समकालीन सहयोग की संभावनाओं जैसे विषयों पर गहन विचार-विमर्श हुआ। विद्वानों ने इस बात पर विशेष बल दिया कि दोनों देशों की साझा सांस्कृतिक और बौद्धिक विरासत को संरक्षित करते हुए युवा पीढ़ी तक पहुंचाना समय की आवश्यकता है।

समापन सत्र में मंगोलिया और अन्य देशों से आए कई प्रतिनिधियों तथा भारत की प्रो. सुनीता द्विवेदी ने भी अपना अनुभव बयां किया। इस अवसर पर, भारत में मंगोलिया के पूर्व राजदूत और भारतीय अध्ययन केंद्र (सीआईएस) के निदेशक प्रो. ओ. न्यामदाव्वा ने भी भारत-मंगोलिया के सम्बंधों पर बात की। कार्यक्रम के अंत में, आईजीएनसीए के बृहत्तर भारत एवं क्षेत्र अध्ययन विभाग के प्रमुख प्रो. धर्म चंद चौबे ने धन्यवाद ज्ञापन प्रस्तुत करते हुए सभी विशिष्ट अतिथियों, वक्ताओं, प्रतिभागियों और आयोजकों के प्रति आभार व्यक्त किया। उन्होंने कहा कि यह सम्मेलन भारत–मंगोलिया सम्बंधों को और अधिक सुदृढ़ बनाने तथा भविष्य में संयुक्त शोध एवं सांस्कृतिक परियोजनाओं के लिए मार्ग प्रशस्त करेगा।

ग़ौरतलब है कि इस सम्मेलन का उद्घाटन 18 फरवरी को केन्द्रीय संस्कृति एवं पर्यटन मंत्री श्री गजेंद्र सिंह शेखावत ने किया था। उन्होंने इस सम्मेलन को केवल अकादमिक अभ्यास भर नहीं, बल्कि साझा आध्यात्मिक और कलात्मक परम्पराओं तथा निरंतर सांस्कृतिक प्रवाह से प्रेरित बताया। उन्होंने भारत और मंगोलिया के बीच ऐतिहासिक आदान–प्रदान के बारे में बताते हुए कहा कि है कि दोनों सभ्यताओं के बीच आध्यात्मिक आदान–प्रदान के साथ–साथ वैज्ञानिक ज्ञान भी प्रवाहित हुआ। मंगोलियाई कंजूर को उन्होंने दोनों देशों के लोगों के बीच एक पवित्र सेतु बताया।

इस प्रकार, यह दो दिवसीय अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन भारत–मंगोलिया के प्राचीन सांस्कृतिक संबंधों को नई ऊर्जा प्रदान कर गया।

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