हमारे प्रिय माणक जी भाईसाहब, जो मिश्री-सी मधुरता से स्नेह लुटाते, पाथेय कण का नवीनतम अंक बाँटते, और युवावस्था से हमारे संरक्षक बने, अब हमारे बीच नहीं रहे। उनका सहज, सरल, निर्लिप्त, निस्पृह और निरहंकारी स्वभाव हर किसी को बाँध लेता था। मन व्यथित है, क्योंकि पुरानी पीढ़ी के प्रचारक धीरे-धीरे हमसे दूर हो रहे हैं। माणक जी जैसा वात्सल्य और मार्गदर्शन शायद अब इस जीवन में न मिले।
दो वर्ष पूर्व पाथेय कण कार्यालय में उनके साथ बिताए कुछ घंटे आज भी स्मृति में जीवंत हैं। उत्साह और प्रेम से उन्होंने मेरा स्वागत किया, अल्पाहार और भोजन कराया। पुरानी स्मृतियों, नए कार्यकर्ताओं, प्रचारकों और भावी योजनाओं पर लंबी चर्चा की। मेरे लिए उनकी चिंताएँ, सलाह और आशीर्वाद आज भी हृदय को स्पर्श करते हैं। वह स्थान, जहाँ से साधना, तपस्या और स्थिरप्रज्ञता की प्रेरणा मिलती थी, जहाँ प्रेम और वात्सल्य का प्रवाह आत्मिक आनंद से भर देता था, अब सूना हो गया है।
माणक जी भाईसाहब को भूलना असंभव है। संघ कार्य की नींव में विसर्जित अनाम पुष्प की तरह, वे सतत साधना, मौन तपस्या और आत्म-विसर्जन की साकार मूर्ति बनकर सदा स्मरणीय रहेंगे। उनकी दैदीप्यमान आभा हमें निरंतर प्रेरित करती रहेगी।
कोटि-कोटि नमन, मौन तपस्वी माणक जी भाईसाहब को!