राजीव मिश्रा
दुनिया में क्या हो रहा है यह समझना है तो पहली शर्त है कि देखें कि मेरी अपनी जिंदगी में क्या हो रहा है?
मैं स्वयं मंडल कमीशन से पहले की पीढ़ी हूँ. लेकिन फर्स्ट ईयर में था तभी मंडल कमीशन आया था. तब मैं बेहद उत्तेजित हुआ था और उस आंदोलन में बढ़ चढ़ कर भाग लिया था. मैं और मेरे बड़े भैया सारे दिन लोगों को इकट्ठा करते थे, दीवारों पर पोस्टर लगाते थे और नारे लिखते थे, पेटीशन लिख कर, साइन करवा कर भेजते थे, जुलूस ऑर्गनाइज करते थे, ट्रेन रोकते थे. जेल जाने जाने की नौबत आ गई थी. दुर्गा पूजा के पंडाल में हमने अपने विरोध प्रदर्शन के लिए स्टॉल लगा दिया और आंदोलन के लिए फंड जुटाने के लिए जूते पॉलिश किए.
उस समय मुझे लगता था कि मंडल कमीशन लग गया तो मेरी दुनिया खत्म हो जाएगी, अनर्थ हो जाएगा, जीवन असम्भव हो जाएगा. और यह बात कुछ हद तक सही भी हुई होती अगर इसके बाद नरसिम्हा राव प्रधानमंत्री नहीं बने होते.
लेकिन मैं अपनी पीढ़ी में अपने भाइयों बहनों, कजिन्स में भी लगभग सबसे छोटा हूँ. मेरे सारे बड़े भाई मंडल कमीशन से पहले के हैं. हमने मंडल के पहले की दुनिया देखी है, जब उस पीढ़ी के ज्यादातर युवाओं का जीवन नौकरी खोजते, एम्प्लॉयमेंट न्यूज पढ़ते, फॉर्म भरते, एग्जाम देते बीत जाता था. सारी नौकरियां सिर्फ सरकारी थीं, और लोग एज निकलने तक एग्जाम देते रहते थे. किसी की बैंक, LIC, रेलवे और एसएससी में नौकरी लगी है तो उसका जीवन धन्य हो जाता था. पूरे देश की सारी एम्प्लॉयमेंट ऑपर्च्युनिटी एक सोलह पन्ने के साप्ताहिक अखबार में सिमटी होती थी. औसत चार छह साल की बेरोजगारी रूल था. बारहवीं के बाद इंजीनियरिंग में एडमिशन तो स्वर्ग का द्वार लगता था.
आज अगली पीढ़ी में मेरे परिवार में सारे बच्चे टेक्निकल कॉलेजों में एडमिशन ले रहे हैं, इंजीनियरिंग, लॉ, अकाउंटेंसी से लेकर क्या क्या नहीं पढ़ रहे. एक भी बच्चा कहीं थोड़े दिन भी बेरोजगार नहीं बैठा है. मैं अपने खानदान में सरकारी नौकरी करने वाला आखिरी और छोड़ने वाला पहला व्यक्ति हूँ. मेरे बाद किसी ने सरकारी नौकरी का फॉर्म तक नहीं भरा.
आज यूजीसी के विवाद को यूजीसी से निकाल कर रिजर्वेशन की ओर मोड़ दिया गया है. इसे यूजीसी तक सीमित रहने दिया जाता तो बात खत्म हो जानी थी. लेकिन लोगों की भावनाएं उसी दिशा में हैं जिस दिशा में मेरी 1990 में थीं. यह भावना भड़काई जा रही है जैसे संसार नष्ट हो जाएगा.. हम बर्बाद हो जाएंगे. समस्या के डिस्प्रोपोर्शनेट प्रतिक्रियाएं दी जा रही हैं. पर्सपेक्टिव ही समाप्त हो गया है.
मेरा अगली पीढ़ी से सिर्फ यह कहना है – अपनी लड़ाइयां सावधानी से चुनो. जैसे तुम रिजर्वेशन को लेकर भावनात्मक हो रहे हो, उधर भी कोई और इसे अपने अस्तित्व का प्रश्न माने बैठा है. लेकिन दुनिया जीरो-सम-गेम नहीं है. एक को मिलेगा तो वह दूसरे से छीन कर ही मिलेगा ऐसा नहीं है.
तुम्हारी समस्या का हल इस रिजर्वेशन से लड़ना नहीं है. तुम्हारी समस्या का हल आर्थिक प्रगति है, कैपिटलिज्म है, प्रोडक्शन है, फ्री मार्केट है. फ्री मार्केट एक अद्भुत अलादीन का चिराग है. यह इतना दे सकता है कि सबको पहले से अधिक मिल जाएगा. तुम अपनी दृष्टि इस अलादीन के चिराग पर केंद्रित करो. तुम फ्री मार्केट को बचाओ. तुम ऐसी सरकार चुनो जो फ्री मार्केट के लिए अधिक उपयुक्त हो. सरकारों से मांगना है तो तुम यह मांगो कि वह मार्केट को फ्री छोड़ दे.
रिजर्वेशन, और विक्टिमहुड नैरेटिव समाजवाद की बीमारियां हैं जहां संसाधन सीमित माने जाते हैं, जहां एक की प्रगति दूसरे के कॉस्ट पर हुई समझी जाती है, जहां असमानता का अर्थ भेदभाव और अन्याय समझा जाता है… इस बीमारी को पिछली पीढ़ी की बीमारी समझ कर इससे बाहर निकलो. रिजर्वेशन और इक्विटी के कीड़े सिर्फ पॉवर और वर्चस्व के रोग हैं. तुम्हारा उद्देश्य पॉवर और वर्चस्व नहीं, प्रॉस्पेरिटी है. और प्रॉस्पेरिटी सबको मिल सकती है. बस, मांगना सही चीज है.



